आंदोलनजीवी’ शब्द NSA के दस्तावेज में आया कहां से? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सत्यम वर्मा की हिरासत पर फैसला रखा सुरक्षित

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प्रयागराज : पत्रकार सत्यम वर्मा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने 7 और 8 अक्टूबर को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा।

सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणी ने मामले को खासा महत्वपूर्ण बना दिया। जस्टिस अतुल श्रीधरन ने NSA हिरासत के आधार में इस्तेमाल किए गए ‘आंदोलनजीवी शब्द को लेकर सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि आखिर यह शब्द आया कहां से और यह एक आधिकारिक NSA हिरासत दस्तावेज का हिस्सा कैसे बन गया?

कोर्ट के इस सवाल का सीधा संबंध हिरासत के कानूनी आधार से है। NSA जैसे कठोर कानून के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के लिए उसके खिलाफ ठोस सामग्री और तथ्य होना जरूरी है। ऐसे में किसी व्यक्ति के लिए राजनीतिक या विचारात्मक विशेषण के तौर पर इस्तेमाल किए गए शब्द को हिरासत के आधार में शामिल करने को लेकर अदालत ने सवाल खड़ा किया है।

सत्यम वर्मा को 12 मई 2026 को गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने NSA की धारा 3(2) सहपठित धारा 3(3) के तहत हिरासत में लेने का आदेश दिया था। यह कार्रवाई अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए वर्कर्स प्रोटेस्ट में उनकी कथित भूमिका को लेकर की गई थी।

सत्यम वर्मा ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर हिरासत आदेश, राज्य सरकार की मंजूरी और बाद में हिरासत की पुष्टि को चुनौती दी है। याचिका में दावा किया गया है कि जिन घटनाओं और FIR को हिरासत का आधार बनाया गया, उनमें सत्यम वर्मा नामजद नहीं थे।

याचिका के मुताबिक, CCTV फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड से पता चलता है कि घटना के समय वर्मा करीब 500 किलोमीटर दूर लखनऊ में थे। उनका दावा है कि उसी दिन दोपहर करीब 2:14 बजे उन्हें लखनऊ के हसनगंज पुलिस ने हिरासत में लिया था।

सत्यम वर्मा ने अपनी याचिका में अपनी राजनीतिक विचारधारा, Revolutionary Workers Party of India (RWPI) से कथित संबंध तथा अनुवादक और प्रकाशक के रूप में किए जा रहे काम को आपराधिक गतिविधियों से जोड़ने पर भी आपत्ति जताई है।

याचिका में यह आरोप भी लगाया गया है कि राज्य सरकार का 20 मई 2026 का अनुमोदन आदेश उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया। वर्मा का कहना है कि इससे संविधान के अनुच्छेद 22(5) के तहत प्रभावी प्रतिवेदन देने का उनका अधिकार प्रभावित हुआ। उन्होंने यह भी दावा किया कि 21 मई को दिया गया उनका वैधानिक प्रतिवेदन एडवाइजरी बोर्ड के सामने नहीं रखा गया।

फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में फैसला सुरक्षित रखा है। अदालत ने अभी यह तय नहीं किया है कि सत्यम वर्मा की NSA हिरासत वैध है या उसे रद्द किया जाएगा।

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी नोएडा वर्कर्स प्रोटेस्ट से जुड़े एक अन्य NSA मामले में हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी की हिरासत रद्द की थी। हालांकि, उस फैसले के कुछ हिस्सों पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।

Up Head Line
Author: Up Head Line

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