नोएडा पुलिस की कार्रवाई पर हाईकोर्ट सख्त, अवैध हिरासत मामले में युवक की तत्काल रिहाई के आदेश ,कहा शर्म आनी चाहिए आपको

Share Now:

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

 

प्रयागराज : नोएडा पुलिस की कार्यप्रणाली पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को कड़ी नाराजगी जताई। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने पुलिस अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा “शर्म आनी चाहिए आपको”

मामला गौतमबुद्ध नगर निवासी दीपक की हिरासत से जुड़ा था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस ने उसे FIR दर्ज होने से पहले ही हिरासत में ले लिया था और बाद में उसी FIR में उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई गई।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक 23 अगस्त 2026 को दो पक्षों के बीच हिंसा की घटना हुई थी। इसी दिन शाम 7:34 बजे दीपक समेत पांच लोगों को BNSS की धारा 126, 135 और 170 के तहत हिरासत में लिया गया। इसके करीब दो घंटे बाद रात 9:39 बजे थाना फेज-2, गौतमबुद्ध नगर में केस क्राइम नंबर 370 के तहत FIR दर्ज की गई।
यानी रिकॉर्ड के मुताबिक दीपक को FIR दर्ज होने से पहले ही पुलिस हिरासत में लिया जा चुका था।

याचिका में यह भी कहा गया कि FIR में कई लोगों के नाम थे, लेकिन दीपक का नाम और उसके खिलाफ कोई विशिष्ट भूमिका दर्ज नहीं थी।
सुनवाई के दौरान धारा 130 BNSS के तहत जारी नोटिस का समय भी सवालों के घेरे में आया। आरोप था कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने यह नोटिस 24 अगस्त को जारी किया, जबकि दीपक को एक दिन पहले ही पुलिस हिरासत में लिया जा चुका था।

पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम पर जवाब देने के लिए ACP को व्यक्तिगत रूप से तलब किया था और धारा 126, 135 और 170 BNSS से संबंधित सभी दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया था। बुधवार को DSP कमलेश कांत, ACP-2 (सेंट्रल नोएडा) कोर्ट में पेश हुए। सुनवाई के दौरान बेंच ने जमानत बांड की प्रक्रिया के दस्तावेजीकरण पर भी सवाल उठाए।

कोर्ट ने पाया कि पुलिस रिकॉर्ड में यह स्पष्ट नहीं था कि आरोपी से जमानत बांड की किसी निश्चित रकम को जमा करने की इच्छा के बारे में पूछा गया था। गिरफ्तारी रिकॉर्ड में भी कोई निश्चित राशि दर्ज नहीं थी। पुलिस की कार्रवाई और दस्तावेजी प्रक्रिया से नाराज कोर्ट ने टिप्पणी की कि “इस राज्य में पुलिस की स्थिति बहुत खराब है। अधिकारियों को लगता है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और बच निकलेंगे”।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी ने गिरफ्तार लोगों को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने के अधिकार की जानकारी नहीं दी थी। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि 24 अगस्त को रिहाई का आदेश होने के बावजूद दीपक को वास्तव में पुलिस की भौतिक हिरासत से बाहर नहीं किया गया और बाद में उसे केस क्राइम नंबर 370 में गिरफ्तार दिखा दिया गया। गिरफ्तारी मेमो की तारीख और हस्ताक्षरों को लेकर भी विसंगतियां बताई गईं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दीपक की याचिका स्वीकार कर ली और उसकी हिरासत को अवैध मानते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

Up Head Line
Author: Up Head Line

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें