कमजोर दिल वाले इब्ने इंशा की यह कविता ना पढ़ें, बहुत मार्मिक है गरीबी और लाचारी की व्यथा

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इब्न-ए-इंशा या इब्ने इंशा पाकिस्तान के मशहूर कवि, पत्रकार, लेखक और व्यंग्यकार थे. लेकिन ज्यादातर लोग उन्हें शायर के रूप में ही जानते हैं. इब्ने इंशा छोटे-छोटे जुमलों में बड़ी से बड़ी और गहरी बात कह जाने का हुनर रखते थे. इब्ने इंशा का असली नाम शेर मोहम्मद खान था. साहित्य की दुनिया में वे असल के शेर थे, जिनके सामने अच्छे-अच्छे शायर और व्यंग्यकार पानी भरते नजर आते थे. उनकी शायरी में ऐसा जादू था कि जो भी सुनता दीवाना हो जाता.

जगजीत सिंह साब द्वारा गायी इब्ने इंशा की गज़ल “कल चौहदवीं का रात थी शब भर रचा चर्चा तेरा” लोगों की जुबान पर है. इब्ने इंशा साब घूमने-फिरने के बहुत बड़े शौकीन थे. अपने इस शौक को उन्होंने कलमबद्ध भी किया. उनके लिखे सफरनामे ‘इब्ने बतूता के ताकूब में’, ‘दुनिया गोल है’ और ‘नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर’ बेहद मशहूर हुए हैं. इब्ने इंशा की रचनाओं में दीवानगी है, फकीरी है, नसीहत है तो दर्शन भी. शोषण, गरीब और लाचारी पर भी उन्होंने खुलकर कलम चलाई.

इब्ने इंशा अपनी नज़्मों के माध्यम से जहां दबे-कुचले, मज़लूम की पीड़ा, उनका दर्द सामने रखा तो सभ्य कहे जाने वाले समाज पर भी तीखा कटाक्ष किया. शायर प्रेमिका को देखकर प्रेम की कविता लिखते हैं, लेकिन इब्ने इंशा ने एक भूखे बच्चे को देखकर भूख, गरीबी और लाचारी पर कविता लिखी. उनकी एक नज्म बहुत ही मशहूर हुई है ‘यह बच्चा किसका बच्चा है’. इसमें इब्ने साब ने एक ऐसे बच्चे का खाका खींचा है जो भूख-प्यास और गरीबी से त्रस्त है. इसे पढ़ते हुए एक भावुक व्यक्ति कांप उठता है. यह नज्म जहां बेबस और लाचारी को बयां करती है वहीं एक बेहतरीन नसीहत भी है-
1.
यह बच्चा कैसा बच्चा है

यह बच्चा काला-काला-सा
यह काला-सा, मटियाला-सा
यह बच्चा भूखा-भूखा-सा
यह बच्चा सूखा-सूखा-सा
यह बच्चा किसका बच्चा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है
जो रेत पर तन्हा बैठा है
ना इसके पेट में रोटी है
ना इसके तन पर कपड़ा है
ना इसके सर पर टोपी है
ना इसके पैर में जूता है
ना इसके पास खिलौना है
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है कोई झूला है
ना इसकी जेब में धेला है
ना इसके हाथ में पैसा है
ना इसके अम्मी-अब्बू हैं
ना इसकी आपा-खाला है
यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है

2.
यह सहरा कैसा सहरा है
ना इस सहरा में बादल है
ना इस सहरा में बरखा है
ना इस सहरा में बाली है
ना इस सहरा में खोशा है
ना इस सहरा में सब्ज़ा है
ना इस सहरा में साया है
(खोशा- अनाज)

यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का सहरा है

3.
यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है
यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किसकी दुनिया है

4.
इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है
कहीं बादल घिर-घिर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं
कहीं महफ़िल है, कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे
यह रेशम है, यह दीबा है
कहीं गल्ले के अम्बार लगे
सब गेहूं धान मुहैय्या है
कहीं दौलत के सन्दूक भरे
हां ताम्बा, सोना, रूपया है
तुम जो मांगो सो हाज़िर है
तुम जो चाहो सो मिलता है
इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सपना है?
वो किस धरती के टुकड़े हैं?
यह किस दुनिया का हिस्सा है?

5.
हम जिस आदम के बेटे हैं
यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
वह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बन्दे हैं
सब बन्दों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फर्क़ नहीं
इस धरती पर हक़ सबका है

6.
यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जो यहां बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
{क्या मुश्किल है, हो सकता है)
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
(हां दूध यहां बहुतेरा है)
इस बच्चे का कोई तन ढाँके
(क्या कपड़ों का यहां तोड़ा है?)
इस बच्चे को कोई गोद में ले
(इन्सान जो अब तक ज़िन्दा है)
फिर देखिए कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है

7.
इस जग में सब कुछ रब का है
जो रब का है, वह सबका है
सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं
हर चीज़ में सबका साझा है
जो बढ़ता है, जो उगता है
वह दाना है, या मेवा है
जो कपड़ा है, जो कम्बल है
जो चांदी है, जो सोना है
वह सारा है इस बच्चे का
जो तेरा है, जो मेरा है

यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा सबका बच्चा है।

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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