हाइलाइट्स
नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर एक्ट में बच्चों को एक संस्था तब पालती है जब लगता है कि पेरेंट्स सही तरीके से पाल नहीं सकते
नॉर्वे में भारतीयों सहित अप्रवासी पेरेंट्स को अक्सर इस तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ता है
कुछ समय पहले बॉलीवुड ने एक चर्चित फिल्म आई थी, जो लगातार चर्चाओं में है. ये फिल्म है मिसेज चटर्जी बनाम नार्वे. ये दरअसल एक सच्ची घटना पर बनी फिल्म है, जो स्तब्ध कर देती है. झकझोरती है नार्वे में एक कानून है, जिसमें सही लालन पालन नहीं होने पर बच्चों को पेरेंट्स से ले लिया जाता है. उन्हें फिर सरकार की चाइल्स सर्विस खुद पालती है. पेरेंट्स के लिए अपना बच्चा दोबारा हासिल करना नामुमकिन हो जाता है. कई भारतीय पेरेंट्स नार्वे में इस कानून के शिकार हो चुके हैं. हालांकि नार्वे का कहना है कि बच्चों को बेहतरीन परवरिश देने के लिए ये बेहतरीन कानून है.
पेरेंट्स से लिए गए बच्चों को फिर नार्वे की विवादास्पद चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज यानि बार्नवरनेट पालती है. जिस पर बच्चों के साथ दुर्व्यवहार, खराब पालन-पोषण और घटिया खाने के आरोप ही नहीं लग चुके बल्कि उसे अदालत तक घसीटा जा चुका है. वैसे नार्वे का दावा है कि उसका सिस्टम इस मामले में बहुत अच्छे तरीके से काम करता है.
इस फिल्म में रानी मुखर्जी मुख्य अभिनेत्री हैं. फिल्म नार्वे में रह रही एक भारतीय महिला की कहानी पर आधारित है, जिसने अपने बच्चों की कस्टडी के लिए नॉर्वे सरकार से लड़ाई लड़ी. ये मामला करीब 02 सालों तक चला. उस दौरान वो महिला तोड़ देने वाली मानसिक स्थितियों से गुजरी. वैसे नार्वे में रहने वाले कई अप्रवासी परिवारों ने भी संस्था चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज बार्नवरनेट पर बिना उचित औचित्य के उनके बच्चों को ले जाने का आरोप लगाया है.
असल जीवन में इस हालत से गुजरने वाली सागरिका चक्रवर्ती ने “द जर्नी ऑफ ए मदर” नाम से किताब लिखी, जिस पर ये फिल्म बनी.
रानी मुखर्जी की फिल्म मिसेज चटर्जी इन दिनों लगातार चर्चा में है. फिल्म बखूबी नार्वे के उस चाइल्ड केयर सिस्टम को स्याह पक्ष को सामने लाती है, जिसमें पेरेंट्स से तब बच्चे ले लिये जाते हैं जब ये माना जाता है कि वो बच्चों के लालन पालन के योग्य नहीं हैं. अक्सर ऐसा करने वाली नॉर्वे की सरकारी संस्था पर मनमानी के आरोप भी लगते रहे हैं (न्यूज18)
सवाल – नॉर्वे की विवादास्पद चाइल्ड वेलफेयर सर्विसेज बार्नवरनेट क्या है?
– नॉर्वे की विवादास्पद बाल कल्याण सेवा (CWS) अक्सर पिछले कुछ सालों में सुर्खियों में रहती आई है. ऑक्सफोर्ड एकेडमिक के अनुसार, नॉर्वे में चाइल्ड वेलफेयर सिस्टम डेनमार्क, फिनलैंड और स्वीडन की तरह ही है.
नॉर्वे सरकार की वेबसाइट कहती है, “बाल कल्याण सेवाओं का मुख्य काम ये तय करना है कि बच्चों और युवाओं को ऐसी परिस्थितियों में नहीं रहना चाहिए, जो उनके स्वास्थ्य और विकास को नुकसान पहुंचा सकते हैं, अगर किसी परिवार में ऐसी कोई स्थिति है तो जरूरत पड़ने पर बच्चों को मदद दी जाएगी और बड़े होने तक उन्हें सुरक्षित स्थितियों में रखा जाएगा.
सवाल – बार्नवरनेट हर साल कितने बच्चों को पेरेंट्स से अलग कर खुद पालता है?
– संडे गार्जियन लाइव के अनुसार, बार्नवरनेट हर साल लगभग 1,500 बच्चों को उनके माता-पिता से दूर ले जाता है. कई बार इसकी गंभीर या सही वजह भी नहीं होती. शिकायत मिलने पर इस संस्था के लोग वहां पहुंचते हैं और परिवार से बच्चों को साथ ले जाते हैं. आमतौर पर ये शिकायतें पड़ोसियों, परिचितों या बच्चों द्वारा की जाती हैं. कई बार गुमनाम सूचना पर भी इस संस्था के लोग आते हैं और बच्चों को साथ ले जाते हैं. ये जानना भी नहीं चाहते कि असल में क्या हुआ.
सवाल – नार्वे का कानून बच्चों के किस तरह के हालात को उनकी सही परवरिश नहीं मानता?
– नार्वेजियन कानून थप्पड़ और पिटाई सहित बच्चों की शारीरिक दंड के सभी रूपों पर प्रतिबंध लगाता है
– पेरेंट्स बच्चों को हाथ से नहीं खिला सकते
– उन्हें साथ ही बेड पर सुला नहीं सकते
– उन्हें डांट नहीं सकते
– उनके प्रति लापरवाही नहीं दिखा सकते
– बच्चों के सामने पेरेंट्स आपस में लड़ नहीं सकते और ना ही हिंसा या खराब व्यवहार कर सकते हैं.
– बच्चों से अभद्र व्यवहार नहीं किया जा सकता और ना ही अपशब्द बोले जा सकते हैं
सवाल – नार्वे में आमतौर पर एशियाई पेरेंट्स इसकी लपेटे में क्यों आ जाते हैं?
– एशियाई कल्चर में बच्चों को बिल्कुल अलग तरीके से पाला जाता है. उन्हें डांटना और दंड के तौर पर पिटाई कर देना सामान्य बात है. नार्वे की संस्था बार्नवरनेट सभी एशियाइयों के प्रति ये पूर्वाग्रह रखता है कि वो लोग बच्चों को सही तरीके से नहीं पालते, लिहाजा कोई भी शिकायत पर उनके बच्चे घर से ले जाए जाते हैं. बाद में बच्चों को वापस पाने के लिए पेरेंट्स को कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है.
सवाल – क्या ये संस्था एक परिवार के बच्चों को साथ में ही रखती है और उनका उचित लालन पालन करती है?
– आमतौर पर बार्नवरनेट एक ही परिवार से अगर दो या तीन बच्चों को लेकर सुधार गृह या बच्चा गृह ले जा रहा है तो वो सभी को अलग अलग केंद्रों में भेज देता है. हालांकि नार्वे सरकार इस संस्था को बहुत मोटा बजट देती है और माना जाता है कि वहां बच्चों को खुशहाल बचपन देने की सभी सुविधाएं रहती हैं, जिसमें खानपान, शिक्षा से लेकर खेलकूद और पूर्ण विकास की सुविधाएं मौजूद रहती हैं.
सवाल – जब बार्नवरनेट परिवार में आकर बच्चों को ले जाता है तो क्या प्रतिक्रिया होती है?
– पेरेंट्स की ओर से ज्यादातर मामलों में उग्र प्रतिक्रिया होती है, तब ऐसा करने वाले पेरेंट्स को मानसिक तौर पर डिस्टर्ब करार भी दे दिया जाता है. उग्र मामलों में उनके खिलाफ केस भी दर्ज होता है. वैसे नार्वे की इस संस्था बार्नवरनेट की कार्यपद्धति की आलोचना करने वाले कम नहीं हैं. यहां तक कि यूरोपीय यूनियन भी उनके कामकाज पर प्रतिकूल टिप्पणियां कर चुका है. पूर्व चेक राष्ट्रपति मिलोस ज़मैन ने नार्वेजियन सामाजिक कार्यकर्ताओं पर नाजियों की तरह काम करने का आरोप लगाया था.
बार्नवरनेट यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में एक दर्जन से अधिक बाल कल्याण मामलों में हार का सामना कर चुका है. बीबीसी के अनुसार, वर्ष 2018 में नॉर्वे के बच्चों के मंत्री को वकीलों, मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक कार्य विशेषज्ञों सहित 170 प्रमुख लोगों ने एक पत्र लिखा.
उन्होंने इस पत्र में बार्नेवरनेट को एक “दुष्क्रियात्मक संगठन कहा, जिसके निर्णय और काम करने का तरीका गलतियों से भरा हुआ है. हालांकि बार्नवरनेट का दावा है कि अधिकांश मामलों में यह बच्चों को नहीं हटाता. इसके उलट वह परिवार को जोड़े रखने का काम करता है. वह ऐसा तभी करता है जब उसे लगता है कि माता-पिता बच्चों का “पालन-पोषण करने योग्य नहीं हैं.
सवाल – इस फिल्म की नार्वे में क्या प्रतिक्रिया हुई?
– नॉर्वे के भारत स्थित राजदूत ने फिल्म की आलोचना की. भारत में नॉर्वे के राजदूत हैंस जैकब फ्राइडेनलुंड ने कहा कि फिल्म गलत तरीके से नॉर्वे के सिस्टम को दिखाती है. फिल्म में “तथ्यात्मक गड़बड़ियां हैं और कहानी में काल्पनिकता का पुट ज्यादा है. उन्होंने कहा कि नॉर्वे एक लोकतांत्रिक, बहुसांस्कृतिक समाज है. नॉर्वेजियन चाइल्ड वेलफेयर एक्ट नॉर्वे में सभी बच्चों पर लागू होता है, चाहे उनकी जातीय पृष्ठभूमि या राष्ट्रीयता कुछ भी हो.
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FIRST PUBLISHED : May 19, 2023, 16:19 IST








