
उर्दू साहित्य की सर्वाधिक विवादास्पद और सर्वप्रमुख लेखिका इस्मत चुग़ताई को ‘इस्मत आपा’ के नाम से भी जाना जाता है. अपने लेखने के माध्यम से इस्मत ने महिलाओं के सवालों को नए सिरे से उठाया. उन्होंने निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबक़े की दबी-कुचली, सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया. इस्मत की पहली कहानी ‘गेन्दा’ का प्रकाशन 1949 में उस दौर की उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका ‘साक़ी’ में हुआ और पहला उपन्यास ‘ज़िद्दी’ 1941 में प्रकाशित हुआ. इस्मत ने अनेक चलचित्रों की पटकथा लिखी और जुगनू में अभिनय भी किया. उत्तर प्रदेश के एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में जन्मी इस्मत ऐसे माहौल में पली-बढ़ीं, जिसने उनके भीतर ज्ञान और आत्म-अभिव्यक्ति की तीव्र इच्छा पैदा की. अपने प्रगतिशील विचारों वाले माता-पिता से प्रोत्साहित होकर, उन्होंने सामाजिक अपेक्षाओं को बौना साबित कर दिया. खुद को साहित्य में अच्छे से स्थापित किया और कहानियों के माध्यम से सच कहने का साहस कभी थकने नहीं दिया.
कहानी को कैसे कहना है और अंत तक पाठक को कैसे बांधे रखना ये काम इस्मत को बहुत अच्छी तरह से आता था. मासूमियत से कड़वे सच को ज़ाहिर कर देने का हुनर था उनके पास. ऐसी ही एक मासूम कहानी है ‘मीठे जूते’. ये कहानी इस्मत की मार्मिक रचनाओं में से एक है. कहानी भाई-बहन के रिश्तों की अजीबोगरीब दुनिया में ले जाती है, जहां वे किस तरह एक-दूसरे को मूर्ख बनाते हैं और ‘बड़ों के सामने मुकर जाते हैं’, जो खीझ पैदा करता है. कहानी मानवीय रिश्तों और भ्रम के इर्द-गिर्द घूमती है. ‘मीठे जूते’ एक ऐसी अनूठी कहानी है, जो विचारशीलता के साथ-साथ मानवीय दिल की गहराईयों को भी छूती है.
पढ़ें इस्मत चुग़ताई की लघुकथा ‘मीठे जूते’-
“ये भाई बहनों को अजीब-अजीब तरीक़े से बेवक़ूफ़ बनाते हैं. भाई के हाथों निको बनने वाली बहन की रूदाद.
नन्हे भाई बिल्कुल नन्हे नहीं बल्कि सबसे ज़्यादा क़द-आवर और सिवाए आपा के सबसे बड़े हैं. नन्हे भाई आए दिन नित नए तरीक़ों से हम लोगों को उल्लू बनाया करते थे. एक दिन कहने लगे, “चमड़ा खाओगी?”
हमने कहा, “नहीं, थू! हम तो चमड़ा नहीं खाते.”
“मत खाओ!” ये कह कर चमड़े का एक टुकड़ा मुंह में रख लिया और मज़े-मज़े से खाने लगे.
अब तो हम बड़े चकराए. डरते-डरते ज़रा सा चमड़ा लेकर हमने ज़बान लगा. अरे वाह, क्या मज़ेदार चमड़ा था, खट्टा-मीठा. हमने पूछा “कहां से लाए नन्हे भाई?”
उन्होंने बताया, “हमारा जूता पुराना हो गया था, वही काट डाला.”
झट हमने अपना जूता चखने की कोशिश की. आख़ थू! तौबा, मारे सड़ांद के नाक उड़ गई.
“अरे बेवक़ूफ़ ये क्या कर रही हो? तुम्हारे जूते का चमड़ा अच्छा नहीं है और ये है बड़ा गंदा. आपा की जो नई गुरगाबी है ना, इसे काटो तो अंदर से मीठा-मीठा चमड़ा निकलेगा.” नन्हे भाई ने हमें राय दी.
और बस उस दिन से हमने गुरगाबी को गुलाब जामुन समझ कर ताड़ना शुरू कर दिया. देखते ही मुंह में पानी भर आता.
ईद का दिन था…
आपा अपनी हसीन और मह-जबीन गुरगाबी पहने, पांयचे फड़काती, सिवय्यां बांट रही थीं. आपा ज़ुहर की नमाज़ पढ़ने जूं-ही खड़ी हुईं, नन्हे मियां ने हमें इशारा किया.
“अब मौक़ा है, आपा नीयत तोड़ नहीं सकेंगी.”
“मगर काटें काहे से?” हमने पूछा…
“आपा की संदूक़ची से सलमा सितारा काटने की क़ैंची निकाल लाओ.”
हमने जूँ-ही गुरगाबी का भूरा मुलाइम चमड़ा काट कर अपने मुँह में रखा, हमारे सर पर झट चप्पलें पड़ीं. पहले तो आपा ने हमारी अच्छी तरह कुंदी की, फिर पूछा “ये क्या कर रही है?”
“खा रहे हैं.” हमने निहायत मिस्कीन सूरत बना कर बताया…
ये कहना था सारा घर हमारे पीछे हाथ धो कर पड़ गया. हमारी तिक्का-बोटी हो रही थी कि अब्बा मियां आ गए. मजिस्ट्रेट थे, फ़ौरन मुक़द्दमा मय मुजरिमा और मक़्तूल गुरगाबी के रोती पीटती आपा ने पेश किया. अब्बा मियां हैरान रह गए. उधर नन्हे भाई मारे हंसी के क़लाबाज़ियां खा रहे थे. अब्बा मियां निहायत ग़मगीं आवाज़ में बोले, “सच बताओ, जूता खा रही थी?”
“हां.” हमने रोते हुए इक़्बाल-ए-जुर्म किया.
“क्यों?”
“मीठा होता है.”
“जूता मीठा होता है?”
“हां.” हम फिर रेंके…
“ये क्या बक रही है बेगम?” उन्होंने फ़िक्रमंद हो कर अम्मां की तरफ़ देखा.
अम्मां मुंह बिसूर कर कहने लगीं. “या ख़ुदा एक तो लड़की ज़ात, दूसरे जूते खाने का चसका पड़ गया तो कौन क़बूलेगा.”
हमने लाख समझाने की कोशिश की कि भई चमड़ा सच में बहुत मीठा होता है. नन्हे भाई ने हमें एक दिन खिलाया था, मगर कौन सुनता था.
“झूठी है.” नन्हे भाई साफ़ मुकर गए.
बहुत दिनों तक ये मुअम्मा किसी की समझ में न आया. ख़ुद हमारी अक़्ल गुम थी कि नन्हे भाई के जूते का चमड़ा कैसा था जो इतना लज़ीज़ था.
और फिर एक दिन ख़ाला बी दूसरे शहर से आईं. बक़चिया खोल कर उन्होंने पत्तों में लिपटा चमड़ा निकाला और सबको बांटा. सबने मज़े-मज़े से खाया. हम कभी उन्हें देखते, कभी चमड़े के टुकड़े को. तब हमें मा’लूम हुआ कि जिसे हम चमड़ा समझते थे, वो आम का गूदा था. किसी ज़ालिम ने आम के गूदे को सुखा कर और लाल चमड़े की शक्ल की ये ना-हंजार मिठाई बना कर हमें जूते खिलवाए…“
इस्मत चुग़ताई की कहानी ‘मीठे जूते’ यहीं पर खत्म हो जाती है. कहानी पढ़ने में तो बहुत सामान्य सी लगती है, लेकिन खत्म होते ही एक अजीब तरह की खामोशी छोड़ जाती है. आप देर तक इसके सच को सोचते हैं, जिसमें नन्हें भाईयों का अव्वल दर्जे तक चालाक होना समझ आता है. और इस बात को आप कहानी खत्म होने से पहले बिल्कुल नहीं समझ पाते कि अंत में आखिर होगा क्या, ये कैसी कहानी हुई, लेकिन इस्मत को जो कहना था उन्होंने इस छोटी सी कहानी के माध्यम से भी कह दिया.
इस्मत के साहित्य में वर्जित विषयों की खोज मिलती है. पितृसत्ता को चुनौती देने के साथ-साथ उनकी कहानियां सामाजिक मानदंडों से बहुत ऊपर ले जाकर खड़ा कर देती है. उनकी सभी कहानियां रिश्तों की जटिलता का सामना करती हैं. अपनी कहानियों में इस्मत ने दमनकारी सामाजिक संरचनाओं को खत्म करने और महिलाओं के जीवन के अनुभवों पर प्रकाश डालने की बेहद ही मासूम कोशिश की है. उनकी कहानियां मध्यवर्ग के जीवन को चित्रित करती हुई, अस्तित्व की जटिलताओं में विरोधाभास की खोज करती हैं, ‘मीठे जूते’ जैसी छोटी कहानी भी उनकी उस कोशिश का हिस्सा है.
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FIRST PUBLISHED : May 18, 2023, 18:50 IST








