
सात मई अठारह सौ इकसठ. ठहरकर देखें तो यह एक ऐसी ऋषि आत्मा के अवतार का महान मुहूर्त है जिसने भारत भूमि की संस्कृति को स्वाधीन स्वर्ग में जगाने का उद्घोष किया. रबींद्रनाथ टैगोर… कोलकाता की जोरसंको हवेली में पहली किलकारी भरने वाले ठाकुरों के इस वंशज के विराट व्यक्तित्व की विलक्षणता हतप्रभ कर देती है.
प्रेम, करूणा और प्रकृति की घनी छायाओं से गुजरते हुए टैगोर का चिंतन मनुष्यता के आदर्श पर विश्राम लेता है. इस यात्रा में वे साहित्य के साथ संगीत, नृत्य, नाटक, चित्रकला और सृजन की सभा विधाओं को साथ लेकर चले. उनकी देशना इन्हीं मार्मिक अनुभवों से निर्मित हुई. वे हमें एक भावयोगी की तरह दिखाई देते हैं. शिक्षा और कला को लेकर उनके प्रयोगों की जीवंत पाठशाला को दुनिया ने शांति निकेतन के रूप में देखा. वे मानते थे कि हमारा कोई भी सांस्कृतिक चिंतन प्रकृति और प्रेम के बिना अधूरा है क्योंकि पूरी मनुष्यता की बुनियाद इसी पर टिकी है. आज जब उपभोक्तावादी संस्कृति ही ग्लोबलाइजेशन का विश्वदर्शन है और आत्मनिर्वासन के अंधेरे में धकेल दिए जाने को दुनिया अभिशप्त है तब अपनी आत्मा को बचा लेने के लिए कराहती कलाओं के पक्ष में रबींद्रनाथ अदम्य साहस की कुंजी देते हैं- “एकला चलो रे.”
टैगोर की याद महज इसलिए नहीं कि उनके जनम का महीना इस अंतराल या आवृत्ति में है, आग्रह में यह विचार भी कि भारत की महान आदिम सांस्कृतिक विरासत का गहन मनन करने और उसकी मूल्यगत सच्चाइयों का उजाला बिखेरने वाली इस विभूति के अवदान को हमारा समय भी ठीक से जानें, समझें और अमल करे.
किसी ने सच ही कहा है कि सच्चे ज्ञानी को वाक् (यानी सिर्फ वचनों में) नहीं बल्कि आचरण में देखना चाहिए. वास्तविक आध्यात्मिक परंपरा में ज्ञान ही आचरण है. टैगोर ने बहुत पहले ही जैसे इस सत्य को जान लिया था इसलिए वे प्रयोग में उतरे. वे इस मर्म को भली-भांति समझ चुके थे कि कला ही ज्ञान की प्रयोगशाला है. इसलिए टैगोर के पूरे सांस्कृतिक चिंतन में हमें ललित कलाएं गले मिलती दिखाई देती हैं. तमाम बंधनों से परे मुक्ति की आकांक्षा के गीत गाते हुए वे मानवीय गरिमा का मनोहारी छंद रचते हैं- “आनंद धारा बहे रे जग में.” जीवन के तलछट में यह जो आनंद की अभीप्सा है यह संकीर्णता की सांकलों को खोलकर ही पूरी की जा सकती है.
टैगोर विश्व कला केंद्र की सांस्कृतिक पत्रिका ‘रंग संवाद’ ने हाल ही संपादित अंक में गुरूदेव के जीवन और सृजन पर केंद्रित महत्वपूर्ण आलेख प्रकाशित किए हैं. संस्कृतिकर्मी अशोक जमनानी अपने शहर का राग लापते हुए एक रिपोर्ताज में टैगोर की बड़ी ही गूढ़ पंक्ति उद्घृत करते हैं- “उत्सव आमार जाति, आनंंद आमार गोत्र”. कितना हार्दिक और सारभूत कथन है. अजीब निराशा, हताशा, बेचैनी और बुझापन जीवन की मुस्कानों को लील रहा है तब रबींद्रनाथ के इस उद्घोष को बार-बार सुना जाना चाहिए. जिस महादेश का परिचय ही उत्सव और आनंंद है वहां अवसाद से मुक्ति का मार्ग भी यही है. टैगोर इस मंत्र को लेकर देश-देशातंर गए. शिक्षा, संस्कृति और संगीत की परस्परता को उद्घाटित करता एक मूल्यवान आलेख इस अंक में कवि-अनुवादक उत्पल बैनर्जी ने साझा किया है. इस आलेख को मूल बांग्ला में टैगोर ने लिखा था.
संगीत को जीवन के लिए आवश्यक बताते हुए रबींद्रनाथ कहते हैं कि सहज, नैसर्गिक और अनायास जो एक जीवन पद्धति हमें परंपरा (से मिली है उस मूल्य प्रदाता परंपरा से प्रथम सिद्धांतों को हम ठीक से पहचाने. मूल ज्ञान तो मन और आत्मा से जुड़ा है. अज्ञेय द्वारा संपादित पुस्तक ‘भारतीय कला दृष्टि’ में यह उल्लेख है कि कला मनीषी रायकृष्णदास ने जब 1920 में काशी में भारतीय कला भवन की स्थापना की तो रबींद्रनाथ टैगोर उनके मुख्य सलाहकार थे. लोकार्पण समारोह में बतौर टैगोर उप सभापति उपस्थित हुए थे. जातीय स्मृतियों के इस संग्रहालय में टैगोर जीवन, प्रकृति और संस्कृति के अंतर्संबंधों को ही देखना चाहते थे.
दुर्भाग्य से टैगोर के चिंतन और सृजन को भारत ने बहुत सतही देखा-जाना है. खेद है कि खुद टैगोर की सरजमीं बंगाल ने भी इस कर्मयोगी के कहे-रचे और जिये का न तो विस्तार किया और न ही कोई गंभीर पहल. वहां की सरकार और समुदाय में नजर आती है. रबींद्र संगीत के प्रचार को लेकर कलाकारों ने जरूर बहुत ही आसक्त होकर व्यक्तिगत निष्ठा से काम किया है. लेकिन टैगोर के नाटक और उनकी कहानियों को लेकर प्रयोग बहुत ही सीमित दिखाई देते हैं. इस बात की फिक्र प्रख्यात रंगकर्मी उषा गांगुली ने कई बार की. इसमें कोई शक नहीं कि टैगोर के नाटकों में गूढ़ दार्शनिकता है. उनकी आध्यात्मिक चेतना के तल को छूना-निर्देशक और अभिनेताओं के लिए आसन नहीं. लेकिन बांग्ला से अन्य जुबानों में उनके सहज भाष्य की और रचनात्मक अनुवाद तथा व्याख्या का भी कोई सतत अभियान दिखाई नहीं देता. बस, देश राष्ट्रगान के रचयिता के बतौर उनका महिमा मंडन करते रहने में ही कृतज्ञता के अहोभाव से भरा रहा या अंग्रेज़ी में अनुवादित उनकी ‘गीतांजली’ को नोबल से नवाजे जाने का यशोगान पीढियों को गर्व से भरता रहा.
चित्रकार-कलागुरू अशोक भौमिक ने एक लंबा वक्तव्य टैगोर की चित्रकला पर दिया था. भौमिक इस चिंता से भरे दिखाई देते हैं कि रबींद्रनाथ के चित्रों को इस देश ने जिज्ञासा से भरकर देखा ही नहीं. वे समकालीन कला चिंतकों, कला के रहनुमाओं और कलाकारों पर भी इन उपेक्षा के लिए कटाक्ष करते हैं. शब्दों की दुनिया के कोलाहल से चलकर चित्र जैसी खामोश कला में खो जाने के इस सफ़र पर खुद टैगोर की टिप्पणी कितनी मर्मस्पर्शी हैं- “जीवन संध्या की प्रेयसी है मेरे लिए चित्रकला. मेरे चित्र, रेखाओं के माध्यम से की गई मेरी पद्य रचना है”. हालांकि पेशेवर चित्रकार बनने की चाह कभी भी टैगोर की नहीं रही. न ही पेरिस की किसी प्रदर्शनी में जाना उनका अभीष्ट रहा. उनकी प्रतिभा संस्कार और संवेदना में जो रहा वह उनके सृजन में चला आया.
गांधीजी ने टैगोर की सांस्कृतिक मेधा पर मुग्ध होकर उन्हें ‘गुरूदेव’ का संबोधन दिया और टैगोर ने स्वाधीनता के वरेण्य शिल्पी को ‘महात्मा’ कहकर पुकारा.
इस समय जब भारत का नेतृत्व जड़ों से जुडने की गुहार कर रहा है. आत्मनिर्भरता और पारंपरिक कौशल के साथ भारत की गुरुता के लौटने का स्वप्न अंगड़ाई ले रहा है तब गुरुदेव के गीत की गुंजार दूर तक सुनाई देती है-
जब गान सुनाऊं अपना
तुम उससे ताल बिठाना
हाथों के कंकन अपने
उस सुर में जरा बिठाना
सरिता के छल-छल जल में
ज्यों झर-झर झरती वर्षा
तुम वैसे उन्हें बजाना
बुझ गए दीप बुझने दो
तुम अपना हाथ बढ़ाना.
प्रणति…








