रूपश्री नंदा
बालासोर. 2 जून को शाम 7 से 7.10 बजे के बीच ओडिशा के मुख्य सचिव प्रदीप जेना को बालासोर के जिला कलेक्टर दत्तात्रेय पी शिंदे का फोन आया. शिंदे ने कहा, ‘सर, एक ट्रेन पटरी से उतर गई है और मैं घटनास्थल पर जा रहा हूं.’ जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें कुछ मदद चाहिए तो शिंदे ने मना कर दिया. हालांकि, यह महसूस करते हुए कि भले ही एक मालगाड़ी पटरी से उतरी हो, ODRAF और अग्निशमन सेवा टीमों की आवश्यकता होगी, मुख्य सचिव ने जिले की दो टीमों को घटनास्थल पर पहुंचने के लिए कहा. यहां लूप लाइन में खड़ी मालगाड़ी से टक्कर के बाद कोरोमंडल एक्सप्रेस के डिब्बे बगल की पटरी पर गिर गए थे, जिसे हावड़ा सुपरफास्ट एक्सप्रेस ने टक्कर मार दी.
इसके एक-दो मिनट के भीतर ही मुख्य सचिव को बालासोर जिला कलेक्टर का दूसरा फोन आया – ‘सर, मैंने सुना है कि यह एक ट्रेन दुर्घटना है’. अगले ही मिनट, उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय से फोन आया, जिसमें रेल हादसे की खबर दी गई.
जब पता चली हादसे की भयावहता
जेना बताते हैं, ‘मैंने उनसे कहा, हां मुझे इसके बारे में पता है और मैंने ODRAF और अग्निशमन दल को भेजा है और एक बार कलेक्टर के वहां पहुंचने के बाद, उन्हें पता चल जाएगा कि और क्या चाहिए. अगर कोई जरूरत होती है तो मैं राज्य स्तर पर तैयारी कर रहा हूं.’ उन्होंने फिर वरिष्ठ अधिकारियों को फोन मिलाते हुए घटना की अतिरिक्त जानकारी के लिए ओडिशा समाचार चैनल लगा लिया. उन्होंने News18 को बताया, ‘जब हमने 7.15 बजे के आसपास पहला दृश्य देखा, तभी हमें साफ हुआ कि ये एक बड़ी आपदा है.’

इस त्रासदी की गंभीरता को भांपते हुए राज्य सरकार के 9 वरिष्ठ अधिकारियों को 45 मिनट के भीतर बालासोर भेजा गया, जिनमें एसीएस सत्यब्रत साहू, उद्योग सचिव हेमंद शर्मा, डीजी फायर सर्विसेज सुधांशु सारंगी, परिवहन आयुक्त अमिताभ ठाकुर और डीजी जीआरपी भी शामिल थे.
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‘आप जहां कहीं भी हों, आप सबसे पहले घटनास्थन पर पहुंचे. अपने सामान की चिंता न करें, हम उसकी व्यवस्था कर लेंगे. पुरी और कटक के अधिकारी, भुवनेश्वर न आएं, बाईपास लें और वहां जाएं’- ये अधिकारियों को इमरजेंसी ऑर्डर थे और फिर अगले चार दिनों तक ये 9 अधिकारी बालासोर में राहत और बचाव अभियान की रीढ़ बने रहे.
सीएम नवीन पटनायक ने पूछा एक्शन प्लान
उधर कंट्रोल रूम में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने मुख्य सचिव और अन्य अधिकारियों से आपदा से निपटने की उनकी योजना के बारे में पूछा. पटनायक ने साफ शब्दों में कहा- ‘जो भी जरूरी हो वह करें. पैसे, या बजट योजनाओं, कार्यक्रमों की सीमाओं की चिंता न करें. किसी भी ऐसी चीज के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से पैसा निकाल लें, जिसका इंतजाम राज्य के कार्यक्रमों से नहीं किया जा सकता है.’
इस बैठक में मुख्यमंत्री ने लोगों की जान बचाने, घायलों को इलाज मुहैया करने, वहां फंसे लोगों को खाना-पानी और त्रासदी से प्रभावित लोगों के प्रति हमदर्दी भरा रवैया अपनाने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने फैसलों की समीक्षा की और अपने अधिकारियों के पीछे मजबूती से खड़े रहे.
इससे पहले ओडिशा आपदा प्रबंधन विभाग में विशेष राहत आयुक्त और प्रबंध निदेशक रहते हुए पिछले साढ़े तीन वर्षों के दौरान आए सात चक्रवातों में राहत और बचाव कार्य संभाल चुके जेना कहते हैं, ‘यह बहुत बड़ी बात थी… मुख्यमंत्री वस्तुतः सारी आजादी दे रहे थे. ऐसी कोई सीमा नहीं है जो आपके काम में बाधा बने.’
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किसी भी त्रासदी में ‘जीरो कैजुअल्टी’ पर नवीन पटनायक का जोर राज्य की प्रशासनिक मशीनरी में जड़ जमा चुका है और किसी हादसे में कुछ लोग भले हताहत हों, लेकिन अधिकारियों ने जीरो कैजुअल्टी के लक्ष्य के साथ ही काम किया. इस मिशन पर विकास आयुक्त अनु गर्ग के साथ 8-10 अन्य वरिष्ठ अधिकारी भुवनेश्वर स्थित नियंत्रण कक्ष में डटे थे.
‘जीवित बचे लोगों को आधी रात में बाहर निकाला गया’
ओडिशा की स्वास्थ्य सचिव शालिनी पंडित लगातार ही फोन करके जिले में एंबुलेंस जुटा रही थीं, घटनास्थल के पास स्थित अस्पतालों को मरीजों के लिए तैयार रहने को अलर्ट कर रही थीं, और बारीपदा तथा कटक के मेडिकल कॉलेजों से बात कर रही थीं, ताकि वहां अतिरिक्त डॉक्टरों को भेजा जा सके.
3 घंटे के अंदर उन्होंने 250 से अधिक एम्बुलेंस, SCB मेडिकल कॉलेज के 50 डॉक्टरों, बारीपदा मेडिकल कॉलेज के 30-40 डॉक्टरों और केंद्रपाड़ा और पड़ोसी जाजपुर के कुछ डॉक्टरों को घटनास्थल पर जुटा लिया था. इसके अलावा बगल के भद्रक और जाजपुर के कलेक्टरों को बालासोर में ग्राउंड जीरो पर ‘जितनी संभव हो उतनी एंबुलेंस भेजने’ के लिए कहा गया.

जब लगभग 40 एंबुलेंस बालासोर पहुंची, तो शिंदे ने कैबिनेट सचिव को एक संदेश भेजा: ‘शायद हमें और भी एम्बुलेंस की जरूरत पड़ सकती है’. जेना तब अतिरिक्त एंबुलेंस के पहुंचने से पहले बसों का इंतजाम करने में जुट गए. उन्होंने परिवहन आयुक्त अमिताभ ठाकुर से बात की, जिन्होंने फिर चार जिलों – बालासोर, भद्रक, जाजपुर और बारीपदा के आरटीओ से ‘कम से कम 40 बसें भेजने’ के लिए कहा. जेना बताते हैं, ‘इस भयानक ट्रेन दुर्घटना के 2 घंटे के भीतर, 40 एंबुलेंस, 40 बसें और 80 डॉक्टर जिले में पहुंच गए थे.’
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भुवनेश्वर से सबसे पहले डीजी फायर सर्विसेज सुधांशु सारंगी और उसके बाद एसीएस सत्यब्रत साहू और प्रमुख सचिव उद्योग हेमंत शर्मा वहां पहुंचे. तब तक, अग्निशमन विभाग की 15 टीमें और दो ODRAF टीमें पहले ही पहुंच चुकी थीं, जिसमें से पहली टीम 45 मिनट के भीतर पहुंच गई थी और आधी रात तक बचाव कर्मियों की संख्या 400 लोगों तक पहुंच गई.
घटनास्थल पर डटे रहे 9 अधिकारी
घटनास्थल पर मौजूद 9 अधिकारी – सत्यब्रत साहू एसआरसी; हेमंत शर्मा, प्रधान सचिव, उद्योग; बलवंत सिंह, एमडी, ओडिशा खनन निगम; अरविंद अग्रवाल, निदेशक, महिला एवं बाल विकास; आईडीसीओ के एमडी भूपिंदर सिंह पुनिया; सुधांशु सारंगी; दयाल गंगवार, अतिरिक्त डीजी रेलवे; अमिताभ ठाकुर; और हिमांशु कुमार, पूर्वी रेंज आईजी, ने बालासोर जिला कलेक्टर और एसपी के साथ ‘इंसीडेंट कमांड सिस्टम’ के सिद्धांत पर काम किया.
अधिकारियों ने आपातकालीन स्थिति में जिम्मेदारियों का बंटवारा किया, जैसे कि राहत का प्रभारी कौन होगा, घायलों की जिम्मेदारी किसकी होगी और शवों को कौन संभालेगा. यहां प्राथमिकता स्पष्ट थी – पहले चरण में, उन यात्रियों को निकालें जो अभी भी जीवित हैं और उन्हें अस्पतालों में ले जाएं. और जो मृत हैं कि उनके शवों को ट्रैक पर रख दें ताकि दूसरे टीमें उसे संभाले. पहले 45 मिनट तक शिंदे, स्थानीय एसपी और बहानागा के लोगों के साथ मिलकर स्थानीय प्रशासन ने स्थिति को संभाला. स्थानीय लोगों ने बड़ी संख्या में अपने घरेलू सामानों के वहां पहुंचे थे और रेल डिब्बों के शीशे तोड़कर, घायलों को अस्पताल ले जाने में मदद करने के साथ ही रक्तदान करके घायलों को बचाने में बड़ी मदद की.

सारंगी बताते हैं, ‘वहां घना अंधेरा था. पहला काम पूरे इलाके में रोशनी करना था. हमने रोशनी के लिए 53 लाइट टावर और जनरेटर लगाए ताकि बचाव कार्य हो सके. दूसरा काम घायलों को निकालने का था. दरअसल, स्थानीय जनता और अधिकारियों के पहुंचने के साथ ही घायलों को निकालने का काम शुरू हो गया था. हमारी ताकत बढ़ती चली गई. नई टीमों के आने के साथ, हमने इसमें योगदान देना शुरू किया.’
घायलों की जिंदा बचाने की जद्दोजहद
जीवित बचे लगभग 1,200 लोगों को सोरो, बालासोर, बासुदेवपुर, भद्रक, बहानगा और जाजपुर के अस्पतालों में भेजा गया, जिनमें से ज्यादा गंभीर लोगों को जिले के मेडिकल कॉलेज और कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भेजा गया. यहां गंभीर मरीजों के लिए एंबुलेंस का इस्तेमाल किया गया, वहीं मामूली चोटों वालों के लिए बसों का इस्तेमाल किया गया.
कुछ लोगों की गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें तुरंत खून चढ़ाया गया या ऑपरेशन टेबल पर ले जाया गया. जेना ने बताया कि चक्रवात और कोरोना महामारी के दौरान नियमित अभ्यास का नतीजा था, क्योंकि महामारी के बीच चक्रवात ने अस्पतालों को डेढ़ घंटे के भीतर तैयार करने में सक्षम बनाया.
सीएम पटनायक ने पीएम मोदी से मांगी एक मदद
इस दौरान 39-40 डिग्री तक बढ़ते तापमान के साथ चिलचिलाती गर्मी में शवों को सुरक्षित रखना एक और बड़ी चुनौती थी, जो लगभग असंभव साबित हो रही थी. अस्थायी मुर्दाघर में टनों बर्फ रखने से भी शवों के क्षय को रोकने में मदद नहीं मिली.
3 जून की दोपहर जब पीएम मोदी घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्होंने जमीन पर मौजूद अधिकारियों से उनकी समस्याओं के बारे में पूछा. इस बीच वहां सुबह से ही मौजूद सीएम पटनायक ने पीएम मोदी को सूचित किया कि शवों को संरक्षित करने में मदद की जरूरत है.

इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और कैबिनेट सचिव से बात की. उसके बाद, कैबिनेट सचिव, स्वास्थ्य सचिव और यहां तक कि केंद्रीय गृह सचिव की ओर से फोन कॉल की झड़ी लग गई और फिर शवों को एम्स में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया, जो तब तक केवल 12 शवों को रख सकता था. केंद्र की तरफ से शवों को भुवनेश्वर ले जाने के लिए चांदीपुर में मौजूद एक हेलीकॉप्टर का उपयोग करने की पेशकश की गई, लेकिन उस पर चर्चा के बाद उसे छोड़ दिया गया. इसी तरह खास इस काम के लिए भेजी गई ट्रेन के इस्तेमाल का विकल्प भी छोड़ दिया गया. इन दोनों विकल्पों का मतलब लोडिंग और अनलोडिंग में काफी वक्त लगना था.
एम्स में बनाया गया खास शवगृह
अंत में 180 शवों के लिए 95 एंबुलेंस की व्यवस्था की गई. हर एक एंबुलेंस में दो शव रखे गए और फिर एक ग्रीन कॉरिडोर बनाकर बालासोर के अस्थायी मुर्दाघरों और अस्पतालों से सभी को भुवनेश्वर एम्स ले जाया गया. वहीं केंद्र सरकार ने एम्स में 150 बिस्तरों वाले विशेष शवगृह को बनाने के लिए वायु सेना के एक विशेष विमान के जरिये 1000 लीटर फॉर्मलडिहाइड के साथ 17 पेशेवरों को भेजा.
सदी के इस सबसे भीषण रेल हादसे के बाद प्रत्येक जीवित और मृत व्यक्ति की मदद के लिए सरकारी मशीनरी का हर पहिया दृढ़ता के साथ चुपचाप अपना काम करता रहा और मृतकों की तस्वीरें जारी करने जैसे कई मुश्किल फैसले लेता रहा.
यहां मृतकों और घायलों के परिजनों के लिए अनुग्रह राशि की घोषणा से लेकर फंसे हुए यात्रियों के लिए मुफ्त परिवहन की व्यवस्था, पहचान के बाद शवों को मुफ्त परिवहन, मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बनाना, हेल्प डेस्क स्थापित करना और फंसे हुए लोगों को भोजन उपलब्ध कराना- हाल के दिनों में भारत की सबसे भीषण रेल दुर्घटना से उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए पूरा सरकारी अमला उठ खड़ा हुआ.
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Tags: Odisha Train Accident, Train accident
FIRST PUBLISHED : June 07, 2023, 17:33 IST








