संगीत को ग्रहण करने के कई तरीके हो सकते हैं. जब कोई स्वर आपके पास पहुँचता है, आपकी स्मृति तुरंत जागृत हो जाती है. आप उसे अतीत में सुने संगीत के जरिये परिचित नाम देना चाहते हैं. उसे पहचान लेने पर राहत मिलती है, मानो आपने किसी अजनबी के चेहरे से नकाब उतार दिया. दूसरा, संगीत तो पहचाना हुआ है, आप उसे संज्ञा नहीं दे पा रहे. सुना है, लेकिन नाम नहीं याद आ रहा. आप छटपटाते हैं, उँगलियाँ झटकते हैं, लेकिन नहीं.
तीसरा, इस धुन को तो नहीं सुना लेकिन यह जिस सरगम, स्वर-संस्थान से उपजी है, उसकी तमाम अन्य ध्वनियों से आपका परिचय है. चौथा, संगीत एकदम अजनबी है – धुन परायी, वाद्य-यंत्र अनजाना. ऐसे किसी भी स्वर की स्मृति आपके भीतर दर्ज नहीं है.
संगीत का एडवेंचर – और अगर आप संगीत को मनुष्य की आत्मा का एक अनिवार्य तत्व मानते हैं, तो आपका आन्तरिक एडवेंचर – शायद इसी बिंदु से आरंभ होता है.
किसी शहर को आप उन ध्वनियों से पहचान सकते हैं, जिनके जरिये वह आपसे संवाद करता है, आपको अपने भीतर उतरने का, आन्तरिक तलाश का स्पेस देता है.
प्राग के ओल्ड टाउन स्क्वायर का पहला स्वर है व्लादिमीर पिंटा. बुजुर्ग पिंटा साहब काफ़्का हाउस के सामने सुबह दोनों हाथों में वाकिंग स्टिक थामे आ जाते हैं. एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं. उनके पास सैक्सोफोन है, ट्रम्पेट और ट्रोमबॉन भी. वे देर शाम तक पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के साथ अपनी खुद की रचनाएँ बजाते हैं.
वे मेरी बालकनी के ठीक नीचे बैठते हैं. उनके आते ही मैं बालकनी का दरवाजा और हॉल की खिड़कियाँ खोल देता हूँ. मेरा पूरा घर मद्धिम संगीत की लय में नृत्यरत हो जाता है. अक्सर उस समय मैं लाइब्रेरी के लिये निकल रहा होता हूँ – लेकिन जानबूझकर तैयार होने में देर कर देता हूँ. उन्हें सुने बगैर घर से नहीं निकलना चाहता.
राह चलते लोग अक्सर उनके समीप ठहर जाते हैं. कई बार वे नृत्य की धुनें भी बजाते हैं, और तब लड़कियाँ उनके इर्द-गिर्द घेरा बना लेती हैं. नृत्य करती हैं, बुजुर्ग को फ्लाइंग किस देती हैं. वे निर्लिप्त अपने संगीत में खोये रहते हैं.
पिंटा साहब शर्ट- ट्राउजर के ऊपर मैचिंग कोट पहनते हैं, साथ में फेडोरा हैट. चूँकि वे तंतु-यंत्रों यानी गिटार और वायलिन के बजाय श्वास वाले यंत्र बजाते हैं, इन यंत्रों की धातु दिन भर उनके मुख में समाई रहती है. वे अपनी सांस से इन्हें नियंत्रित करते हैं. मुझे ऐसे यंत्रों का थोड़ा अनुभव है. कुछ देर बाद आपके जबड़े और गाल दुखने लगते हैं. साँस अलग चढ़ती है. लेकिन पिंटा साहब बहुत देर तक बजाते हैं. वे बीच में पानी, कॉफ़ी इत्यादि शायद लेते होंगे, लेकिन मैंने उन्हें इतने दिनों में संगीत के बीच ब्रेक लेकर कभी कुछ लेते नहीं देखा.
देर शाम अक्सर उनकी पत्नी डानियेल उन्हें लेने आ जाती हैं. कंधों तक झूलते सुनहरे बाल, सुंदर-सा टॉप, कोट, घुटनों तक आती स्कर्ट और हील वाली सेंडिल. उन्हें निहारती रहती हैं. वे बताती हैं कि पिंटा साहब संगीत की क्लास भी लेते हैं. लेकिन इसके अलावा वे एक काम और भी करते हैं – विपत्ति में फंसे बच्चों की मदद. उनके पास जाते हैं, उनसे बातें करते हैं.
इस सितम्बर पिंटा साहब नब्बे के हो जायेंगे.
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अंग्रेजी में एक खूबसूरत शब्द है – busking. इसका अर्थ है सार्वजनिक स्थलों पर गीत-संगीत के प्रदर्शन के जरिये जीविकोपार्जन. यूरोप के कई शहरों में आपको लोग सड़कों पर वाद्य-यंत्र बजाते दिख जायेंगे. इस पेशे को व्यापक सामाजिक स्वीकृति और समर्थन मिला हुआ है. नागरिक सुनिश्चित करते हैं कि इनकी कला का उचित सम्मान हो. वे इनके सामने रखे डिब्बे में पैसे डालते हैं. कुछ घंटों का कला-प्रदर्शन आपकी दैनिक आजीविका को संभव कर देता है.
मैंने यह भी गौर किया कि प्राग के बस्कर्स अमूमन शास्त्रीय संगीत बजाते हैं. ओल्ड टाउन की किसी गली में आप विवाल्डी के फोर सीजंस के साथ प्रवेश करते हैं, मोज़ार्ट के साथ बाहर निकलते हैं, और पल भर बाद वाग्नर की छाया तले आ जाते हैं. प्राग की हवा महान संगीतकारों के अद्भुत मिलन की साक्षी बनती है. आपको पता नहीं चलता कि आपकी इन्द्रियों ने कौन-सा संगीत ग्रहण किया है. इसे आप स्वर का परकाया प्रवेश, या स्वर-सम्भोग कह सकते हैं.
कहीं आपको स्थानीय लोक संगीत पर मध्ययुगीन परिधान पहने एक मण्डली नृत्य करते हुए दिखेगी, और कहीं दो प्रेमी एक साथ. लड़की वायलिन पर है, लड़का सैक्सोफोन पर – दोनों नाइन्थ सिम्फनी बजा रहे हैं. एक दिन मैंने पिता-पुत्री को भी देखा. चारेक साल की बच्ची पिता के संगीत पर झूम रही थी. ऐसी कितनी बेटियाँ होंगीं जिन्हें यह सुख नसीब होगा कि पिता गिटार बजा रहा है, और वे नृत्य कर रही हैं.
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एक अन्य ध्वनि भी मैं इन दिनों सुनता हूँ. जब यहाँ आया था, किसी परिचित भाषा का स्वर सुनाई नहीं देता था. चेक मुझे आती नहीं, अंग्रेजी यहाँ बहुत कम लोग बोलते हैं. पिछले दिनों टूरिस्ट सीजन शुरू हो गया. ढेर सारे भारतीय इन दिनों घूमने आये हुए हैं. अक्सर सड़कों पर हिंदी समेत विभिन्न भारतीय भाषाओं के शब्द सुनने को मिल जाते हैं. कोई परिवार हड़बड़ी में लाल बत्ती पार करते वक्त सतर्क होने को कह रहा है. कोई दंपत्ति व्लतावा के किनारे कासल की तस्वीर ले रहा है. मैं ठिठक जाता हूँ कि उनके शब्दों को देर तक सुन सकूँ. एक अजनबी देश में अपनी परिचित ध्वनियों को सुन पाना, सेकेंड भर को ही सही, कितनी बड़ी राहत है.
(गद्य की विभिन्न विधाओं में लिख रहे लेखक-पत्रकार आशुतोष भारद्वाज इन दिनों प्राग के काफ़्का हाउस में राइटर-इन-रेजिडेंस हैं)








