समय की आवाज़ : आधुनिक शिक्षा और विचारधारा के ज़बरदस्त विरोधी अकबर इलाहाबादी की चुनिंदा गज़लें

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आसान नहीं होता हर बात को सीधे तौर पर कह देना, इसलिए अकबर इलाहाबी ने अपनी गज़लों और शेरों में व्यंग्य का सहारा लिया. वे अपने शेरों में अपने आप पर भी हंसते हैं और समाज की उस हर चीज़ पर व्यंग्य के माध्यम से गहरी चोट करते हैं जो उन्हें अपनी सभ्यता की विरोधी लगी. वे उर्दू के हास्य-व्यंग्य साहित्य में बहुत ऊंचा स्थान रखते हैं. अंग्रेज़ी विचारधारा और शिक्षा का विरोधी होने बावजूद 1898 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘ख़ान बहादुर’ के खिताब से नवाज़ा था. अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने रोज़ी-रोटी के लिए बहुत मेहनत की, काफी लंबे समय तक मन का काम नहीं मिलने पर बहुत कुछ करते रहे और आगे चलकर जज हुए, लेकिन धीरे-धीरे आंखों की रोशनी कम होने की वजह से उन्हें जल्दी रिटायरमेंट लेना पड़ा.

गौरतलब है, कि मशहूर ग़ज़ल “हंगामा है क्यों बरपा…” अकबर इलाहाबादी द्वारा ही लिखी गई है, जिसे विश्व प्रसिद्ध गायक गुलाम अली ने अपनी आवाज़ दी. उनकी लोकप्रिय पंक्तियां “तुम इक गोरख धंदा हो…” को कव्वाली के रूप में नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने भी गाया. अकबर के कई शेर 2015 में आई फिल्म मसान में भी शामिल किए गए. उनकी ग़ज़लें सिर्फ शराब और प्रेमिका तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके समय के सामाजिक और राजनीतिक माहौल के कई विवरण पेश करती हैं. वह हर चीज़ पर एक अलग, हास्यपूर्ण और मजेदार दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं. प्रेम, राजनीति, धर्म और समाज, इन सभी विषयों को अकबर सरल तरीके से हास्य के ताने-बाने के साथ प्रस्तुत करते हैं. उनकी कविता विशेष रूप से उस समय के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश के परिवर्तन को दर्शाती है. राजनीतिक प्रांगण ब्रिटिश सरकार की अंग्रेजी भूमिका के साथ बदल रहा था, साथ ही सामाजिक पहलुओं में भी बड़े बदलाव हो रहे थे, रीति-रिवाज, जीवन, शिक्षा और रोजगार के तरीके बदल रहे थे… इन सभी पहलुओं को अकबर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया, जो उनके समय की सामाजिक स्थिति को पारदर्शीं तरीके से समझाती हैं.

प्रेम के बारे में भी अकबर इलाहाबादी ने उस तरह नहीं लिखा, जिस तरह उनके समय के बाकी कवि और शायर लिख रहे थे, बल्कि उनकी प्रेमपूर्ण गज़लें भी उस समय के विभिन्न सामाजिक पहलुओं को ध्यान में रखकर लिखी गईं थीं. ब्रिटिश हुकूमत के दौर में क्या बड़े बदलाव हुए और वो समय कैसा था? यदि उसे समझना है तो अकबर की गज़लें मददगार साबित हो सकती हैं. उन्होंने अपने समय के जीवन के लगभग हर पहलू में हो रहे महत्वपूर्ण परिवर्तनों को बेहद करीब से देखा, जो उनकी ग़ज़लों में साफ तौर पर देखने को मिलता है.

आइए पढ़ते हैं अकबर इलाहाबादी की कुछ चुनिंदा गज़लें, जो आज भी लोगों के बीच ख़ासा लोकप्रिय हैं-

1)
अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए
अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए
अख़बार में तो नाम मिरा छाप दीजिए

देखो जिसे वो पाइनियर ऑफ़िस में है डटा
बहर-ए-ख़ुदा मुझे भी कहीं छाप दीजिए

चश्म-ए-जहां से हालत-ए-असली छुपी नहीं
अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए

दा’वा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को
तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ को तो नाप दीजिए

सुनते नहीं हैं शैख़ नई रौशनी की बात
इंजन की उन के कान में अब भाप दीजिए

इस बुत के दर पे ग़ैर से ‘अकबर’ ने कह दिया
ज़र ही मैं देने लाया हूं जान आप दीजिए

2)
हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है

ना-तजरबा-कारी से वाइ’ज़ की ये हैं बातें
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है

उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना
मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है

ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा
मेहमान-ए-नज़र इस दम इक बर्क़-ए-तजल्ली है

वां दिल में कि सदमे दो यां जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर सांस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है

सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है

ता’लीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना
बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है

सच कहते हैं शैख़ ‘अकबर’ है ताअत-ए-हक़ लाज़िम
हां तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है

3)
दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीदार नहीं हूं

ज़िंदा हूं मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी
हर-चंद कि हूं होश में हुश्यार नहीं हूं

इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊंगा बे-लौस
साया हूं फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूं

अफ़्सुर्दा हूं इबरत से दवा की नहीं हाजत
ग़म का मुझे ये ज़ोफ़ है बीमार नहीं हूं

वो गुल हूं ख़िज़ां ने जिसे बर्बाद किया है
उलझूं किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूं

या रब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से
मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूं

गो दावा-ए-तक़्वा नहीं दरगाह-ए-ख़ुदा में
बुत जिस से हों ख़ुश ऐसा गुनहगार नहीं हूं

अफ़्सुर्दगी ओ ज़ोफ़ की कुछ हद नहीं ‘अकबर’
काफ़िर के मुक़ाबिल में भी दीं-दार नहीं हूं

4)
दिल मिरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला
दिल मिरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला
बुत के बंदे मिले अल्लाह का बंदा न मिला

बज़्म-ए-यारां से फिरी बाद-ए-बहारी मायूस
एक सर भी उसे आमादा-ए-सौदा न मिला

गुल के ख़्वाहां तो नज़र आए बहुत इत्र-फ़रोश
तालिब-ए-ज़मज़मा-ए-बुलबुल-ए-शैदा न मिला

वाह क्या राह दिखाई है हमें मुर्शिद ने
कर दिया काबे को गुम और कलीसा न मिला

रंग चेहरे का तो कॉलेज ने भी रक्खा क़ाइम
रंग-ए-बातिन में मगर बाप से बेटा न मिला

सय्यद उट्ठे जो गज़ट ले के तो लाखों लाए
शैख़ क़ुरआन दिखाते फिरे पैसा न मिला

होशयारों में तो इक इक से सिवा हैं ‘अकबर’
मुझ को दीवानों में लेकिन कोई तुझ सा न मिला

5)
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना

ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है
मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना

बलाएं लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं
ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देना

ख़ुदा की याद में महवियत-ए-दिल बादशाही है
मगर आसां नहीं है सारी दुनिया को भुला देना

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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