
आज पर्यावरण दिवस है. उजड़ते जंगल, सूखती नदियां और नंगे होते पहाड़ों के लिए मातम-पूर्सी का दिन है. कुछ लोग एक पौधे के चारों तरफ खड़े होकर फोटो खिंचवाएंगे और कुछ कंकरीट के बढ़ते जंगल, प्लास्टिक के प्रयोग, एसी-फ्रीज आदि के इस्तेमाल को पर्यावण के लिए दोषी मानकार अपनी-अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री कर लेंगे और फिर मस्त हो जाएंगे अपनी-अपनी दुनिया में.
पर्यावरण को लेकर साहित्य जगत में भी खूब हलचल रहती है. हमारे कवि, कथाकार समय-समय पर अपनी लेखनी के माध्यम से पेड़-पौधे, जंगल आदि को केंद्र में रखकर रचनाएं लिखकर समाज को जागरुक करने का काम करते रहे हैं. कवियों ने कुदरत के आकूत दोहन पर लोगों का न केवल ध्यान केंद्रित किया है, बल्कि आने वाले खतरों को लेकर भी सजग किया है. लेखकों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों के बदलते व्यवहार और संवेदनहीनता पर भी प्रहार किया है.
विकास की दौड़ का सबसे बड़ा खामियाजा हमारे जल, जंगल और जमीन को चुकाना पड़ रहा है. सड़क बनानी हो या फिर कोई कॉलोनी बसानी हो, लाखों की संख्या में पेड़ काटे जाते हैं. और फिर हम दुहाई देते हैं कि पर्यावरण लगातार दूषित होता जा रहा है. झारखंड में चौड़ी सड़क के लिए कटे पेड़ों को देखते हुए चर्चित लेखिका जसिंता केरकेट्टा द्रवित हो उठती हैं. कटते पेड़ों की पीड़ा को वह खुद पर हो रहे अत्याचार की तरह महसूस करती हैं. जसिंता केरकेट्टा लिखती हैं- उससे मेरा संबंध क्या था?
वह आम का पेड़
ठीक यहीं था, सड़क किनारे
जहां से मुझे हर दिन
बस पकड़नी होती,
बस जब तक पहुंचती नहीं
वह मुझे तंग करता
पहले मेरी ओर एक आम फेंकता
मैं खुश होकर जैसे ही दांत गड़ाती
‘ये तो थोड़े खट्टे हैं’ गुस्से में बोलती
वह हँसता :
तुम बस में सोती रहती हो न!
यह नींद भगाने के लिए था,
अच्छा अब मीठे आम गिराता हूं
सच्ची में!
और तब तक बस आ जाती।
उस दिन बस पकड़ने सड़क पर पहुंची
वह गायब था।
सालों से मेरा ठीक यही इंतजार करता
वह आम का पेड़
कहां जा सकता है भला?
दूसरे दिन अखर में पढ़ी
उसके मारे जाने की खबर।
मैं उस दिन खूब रोई
जैसे मारा गया हो कोई घर का अपना
मैं उस दिन सोई नहीं रात भर
कैसे काट दिया गया वह यही सोचकर।
दूसरे दिन दौड़ी उधर
सोचा उसकी गंध समेट ले आऊंगी
अपने आंगन में रोप दूंगी
उसकी गंध बढ़ेगी
तब मैं उसकी गंध लेकर
घर से निकलूंगी
लौटूंगी जब उसकी गंध को
आँगन में खड़ी पाऊंगी।
मगर मेरे सपने टूट गए
धूल का बवंडर जब हँसने लगा मुझ पर
देखा, मेरे आम के पेड़ की गंध
धूल के बवंडर से लड़ रही थी
बिल्कुल गुत्थमगुत्था।
मैं भागी थाने की ओर
यह रपट लिखवाने कि
मेरे साथी की हत्या हुई है,
थाना ठहाके लगाकर हँसने लगा
डंडा दिखाता हुआ बोला
पहले तू बता
तेरा उसके साथ संबध क्या था?
मैं आज तक दर-दर भटक रही हूं
यही बताने के लिए
कि उसके साथ मेरा संबंध क्या था
मगर वहां कोई नहीं अब
गायब हो चुका है सब
अब सिर्फ़ दूर-दूर तक धूल उड़ाती
चौड़ी सपाट सड़कें भर हैं…।
जसिंता केरकेट्टा का नाता जंगल है. उनकी रचनाओं में जल-जंगल-जमीन रची-बसी हैं. एक आदिवासी के लिए एक-एक पेड़-पौधे की कीमत क्या होती है, उनकी इस कविता ‘परवाह’ से अंदाजा लगाया जा सकता है-
मां
एक बोझा लकड़ी के लिए
क्यों दिन भर जंगल छानती,
पहाड़ लांघती,
देर शाम घर लौटती हो?
मां कहती है:
जंगल छानती,
पहाड़ लांघती,
दिन भर भटकती हूं
सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए।
कहीं काट न दूं कोई ज़िंदा पेड़!
—
प्रसिद्ध दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ‘पेड़’ के माध्यम से स्वार्थी होते इनसान पर करारा व्यंग्य किया है. वे कहते हैं पेड़ हो या इनसान उनका महत्व तभी तक है जब वह किसी के काम आ रहा है. अगर वह किसी के काम का नहीं है तो उसका जीवन व्यर्थ है, वह महत्वहीन है-
पेड़
तुम पेड़ उसी वक़्त तक
पेड़ हो,
जब तक ये हरे पत्ते
हिल रहे हैं
तुम्हारी टहनियों पर।
पेड़,
तुम्हारा हरापन उसी वक़्त तक है
जब तक ये पत्ते सही सलामत हैं
तुम्हारी टहनियों पर।
पेड़,
तुम उसी वक़्त तक पेड़ हो,
जब तक ये पत्ते
तुम्हारे साथ हैं।
पत्ते झरते ही
पेड़ नहीं ठूँठ कहलाओगे
जीते जी मर जाओगे!
—
प्रसिद्ध कवि कुंवर नारायण घर के आंगन में लगे पेड़ को घर का बुजुर्ग और रखवाला बताते हैं. पेड़ घर-द्वार की पहचान हुआ करते थे. लेकिन बढ़ते परिवार और सिकुड़ते आंगन में सबसे पहले गाज गिरी तो पेड़ पर गिरी.
अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था—
वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष
जो हमेशा मिलता था घर के दरवाजे पर तैनात।
पुराने चमड़े का बना उसका शरीर
वही सख़्त जान
झुर्रियोंदार खुरदुरा तना मैला-कुचैला,
राइफल-सी एक सूखी डाल,
एक पगड़ी फूल पत्तीदार,
पाँवों में फटा-पुराना जूता
चरमराता लेकिन अक्खड़ बल-बूता
धूप में बारिश में
गर्मी में सर्दी में
हमेशा चौकन्ना
अपनी ख़ाकी वर्दी में
दूर से ही ललकारता, “कौन?”
मैं जवाब देता, “दोस्त!”
और पल भर को बैठ जाता
उसकी ठंडी छाँव में
दरअसल, शुरू से ही था हमारे अंदेशों में
कहीं एक जानी दुश्मन
कि घर को बचाना है लुटेरों से
शहर को बचाना है नादिरों से
देश को बचाना है देश के दुश्मनों से
बचाना है—
नदियों को नाला हो जाने से
हवा को धुआं हो जाने से
खाने को ज़हर हो जाने से:
बचाना है—जंगल को मरुस्थल हो जाने से,
बचाना है—मनुष्य को जंगल हो जाने से।
—
पूर्व प्रधानमंत्री और कवि अटल बिहारी वाजपेयी ने इनसानों में आगे बढ़ने और ऊंचा उठने की होड़ को ऊंचे-ऊंचे और विशाल पर्वतों के माध्यम से प्रदर्शित किया है. उन्होंने ‘ऊंचे पहाड़’ कविता के माध्यम से लोगों को संयम में रहने का संदेश दिया है-
ऊंचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो कफ़न की तरह सफेद
और मौत की तरह ठंडी होती है
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊंचाई,
जिसका परस,
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊंचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिए आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किंतु कोई गौरैया,
वहां नीड़ नहीं बना सकती,
न कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छांव में पल भर पलक ही झपका सकता है।
सच्चाई यह है कि
केवल ऊंचाई ही काफी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊंचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊंचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।
जरूरी यह है कि
ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ-सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं,
ऊंचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊंचे कि आसमान छू लें,
नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें,
किंतु इतने ऊंचे भी नहीं,
कि पांव तले दूब ही न जमे,
कोई कांटा न चुभे,
कोई कली न खिले।
न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊंचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।
मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
—
चर्चित कवि केदारनाथ सिंह अपनी रचनाओं में पेड़ के महत्व के बारे में कहते हैं कि नीम की एक छोटी-सी टहनी किसी के लिए दातुन हो सकती है तो किसी के लिए तपती धूप से बचने के लिए छाया का सुकून.
खेत जग पड़े थे
पत्तों से फूट रही थी चैत के शुरू की
हल्की-हल्की लाली
सोचा, मौसम बढ़िया है
चलो तोड़ लाएं नीम के दो-चार
हरे-हरे छरके
मैं तो उन्हें भूल चुका था
पर मेरे दाँतों को वे अब भी
बहुत याद आते थे
फिर चल दिया अकेला
सुपरिचित मेड़ों और पगडंडियों को
लाँघता-फलाँगता हुआ
पहुंचा गांव के उस ऊँचे सिवान पर
जहां खड़ा था न जाने कितने बरसों से
वह घना-पुराना नीम का पेड़
रुका,
कुछ देर उसे ध्यान से देखा
फिर झुकाई एक डाल
खींच ली एक छोटी-सी हरी छरहरी
काँपती हुई टहनी ह
बस तोड़ने को ही था
कि अचानक दृष्टि पड़ी नीचे—
अरे, यह कौन?
नीमतले बैठा है
आंख मूंदे मौन!
पड़ गया सोच में
दतुअन तोड़ूं कि न तोड़ूं
पकड़े रहूं कि छोड़ दूं वह टहनी
जो मेरे हाथ में थी!
अंत में
न जाने क्या आया जी में
कि मैंने एक अजब-सी पीड़ा से
उस तरफ देखा
जिधर बैठा था वह आदमी
और छोड़ दी नीम की झुकी हुई टहनी
फिर लौट आया
रास्ते भर खुद से लड़ता और खुद को समझता हुआ
कि यदि कहीं तोड़ ही लेता
कुछ हरी कच्ची उमगती हुई शाखें
तो उसका क्या होता
जो उन्हीं के नीचे बैठा था
उन्हीं के जादू में
बंद किए आँखें!
—
प्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना वृक्ष के महत्व को लेकर कहते हैं पेड़ इनसान के सुख-दुख का साथ होता है. जन्म से लेकर मृत्यु तक एक पेड़ आदमी के साथ हमेशा जुड़ा रहता है. नरेश सक्सेना कहते हैं कि अगर हमारे कृत्यों अगर एक पड़े भी बचा रहता है तो यह एक बड़ा काम होगा-
अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ
एक वृक्ष जाएगा
अपनी गौरैयों-गिलहरियों से बिछुड़कर
साथ जाएगा एक वृक्ष
अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले
‘कितनी लकड़ी लगेगी’
शमशान की टाल वाला पूछेगा
गरीब से गरीब भी सात मन तो लेता ही है
लिखता हूं अंतिम इच्छाओं में
कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार
ताकि मेरे बाद
एक बेटे और एक बेटी के साथ
एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।
—
आज के मशहूर लेखक गीत चतुर्वेदी तो पेड़ में ही पूरा संसार देखते हैं. वे कहते हैं एक पौधा प्रतीक है विशालता का और लघुता का. पेड़ संदेश देता है इनसान को इनसान बने रहने का-
यह नीम का पौधा है
जिसे झुक कर
और झुक कर देखो
तो नीम का पेड़ लगेगा
और झुको, थोड़ा और
मिट्टी की देह बन जाओ
तुम इसकी छांह महसूस कर सकोगे
इसे एक छोटी बच्ची ने पानी दे-देकर सींचा है
इसकी हरी पत्तियों में वह कड़ुआहट है जो
ज़ुबान को मीठे का महत्त्व समझाती है
जिन लोगों को ऊंचाई से डर लगता है
वे आएं और इसकी लघुता से साहस पाएं।
—
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FIRST PUBLISHED : June 05, 2023, 12:56 IST








