
बहुसंख्यक भारतीय समाज की बात करें तो साइकल बच्चों का सबसे पसंदीदा खिलौना है. छोटे बच्चे हैं तो टॉय साइकल घर में जरूर होगी. थोड़े बड़े होने पर अमूमन हर मध्यवर्गीय बच्चे की ख्वाहिश होती है कि उसके पास एक साइकल जरूर हो. तीन पहिए की टॉय साइकल तो आसानी से चल जाती है. दो पहिए वाली साइकल को बैलेंस करना थोड़ा मुश्किल होता है, सो वो इसे चलाकर अपने बड़े होने की घोषणा करना चाहता है- ‘देखो अब मैं बड़ा हो गया हूं, बिना गिरे दो पहिए वाली साइकल चला सकता हूं.’
बेशक वक्त बदल गया है आधुनिक और तेज रफ्तार हो गया है, साइकल की जगह मोपेड, स्कूटर और मोटर साइकल ने ले ली है. लेकिन इसे क्या कहेंगे कि दो पहिया वाहनों की दुनिया में अपनी पैठ जमा चुकीं तीव्र गति वाली नई वाहनों से पिछड़ने के बावजूद डेढ़-दो सौ बरस बीतने पर भी साइकल 2018 में अपनी महत्ता का परचम फैलाती है.
दुनिया को मजबूर करती है एक ‘दिवस’ मेरा भी मनाया जाए. सो संयुक्त राष्ट्र महासभा निर्णय लेती है कि वर्ष 2018 से 3 जून ‘विश्व साइकल दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा. कछुआ और खरगोश की कहानी फिर सही साबित होती है. रफ्तार में भले ही नहीं, लेकिन महत्ता जताने की रेस में तो कछुए ने जीत हासिल कर ही ली है.
आपको कोरोना के दौर का लॉकडाउन याद है? तो ये भी याद होगा कि इस दौरान आवागमन के सार्वजनिक साधन चलना बंद हो गए थे. लोग घरों को जाने के लिए लंबी यात्रा पर पैदल निकल पड़े थे. ऐसे में जिनके पास साइकल थी, उनका सफर अपेक्षाकृत कितना आसान हुआ होगा, अनुमान लगाया जा सकता है. ईंधन वाले दो पहिया-चार पहिया वाहन मालिकों की बात अलग है.
कोरोना काल और साइकल की बात करें तो, ज्योति की बात जरूरी होगी. ज्योति अपने बीमार पिता मोहन पासवान को साइकल पर बिठाकर गुरूग्राम से बिहार के दरभंगा पहुंच गई थी. 1200 किलोमीटर की यह दुर्गम यात्रा उसने महज़ आठ दिन में पूरी कर ली थी. यानि ज्योति ने प्रतिदिन औसतन 150 किलोमीटर साइकल चलाई. 150 किलोमीटर हर रोज, लगातार आठ दिन तक साइकल चलाना आसान नहीं होता, ऊपर से ज्योति ने साइकल पर अपने पिता को बैठाया हुआ था. थोड़ा बहुत सामान भी था. यानि लगभग 100 क्विंटल का वजन लेकर उसने पैडल मारे. उस वक्त उसकी उम्र कितनी थी, महज़ 15 बरस. इस बच्ची के जज़्बे को हजार सलाम.
दो पहिए का साधारण बुनावट वाला ये वाहन, काम बहुत बहुत बड़े-बड़े करता है. सस्ता, सुलभ और किफायती तो है ही, कोई नखरे नहीं हैं इसके. किसी तरह का ईंधन-पेट्रोल नहीं चाहिए इसे, बैटरी-वैटरी की भी ज़रूरत नहीं. बस खरीदो और चलाओ. ये गरीबी से लड़ने का पावरफुल और भरोसेमंद हथियार है. बहुत सारे लोग इसके सहारे रोजगार कर परिवार का पेट पाल रहे हैं.
सबसे बड़ी बात ये है कि साइकल पर्यावरण को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाती. कोई जहरीली हवा, फिज़ाओं में नहीं छोड़ती. उल्टे जल और उर्जा संरक्षण में मदद भी करती है. स्वास्थ्य और फिटनेस के लिए यह बहुत उपयोगी है. मोटापा कम करती है, मांसपेसियों को मजबूत बनाती है और हार्ट को हेल्दी रखती है. इतने सारे कामों के साथ आनंद और मनोरंजन भी करती है.
भारत का पहला रॉकेट 21 नवंबर 1963 को केरल के थुंबा से छोड़ा गया था. इसका साइकल से गहरा रिलेशन है. इस पहले रॉकेट के हिस्सों को, टुकड़ों को, साइकल पर ढोकर ही लांचिंग पैड तक पहुंचाया गया था. ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि अमेरिका से खरीदे गए इस रॉकेट को लांच करने के लिए उस समय देश के पास सीमित संसाधन थे.
साइकल से जुड़ी हाल ही की एक खबर है. पंद्रह वर्षीय चानू सिलचर (असम) के पास एक गांव चुराचांदपुर में रहती है. दसवीं क्लास में पढ़ती है. घर से स्कूल की दूरी यूं तो महज आठ किलोमीटर है, लेकिन राह में जमी कीचड़ इस दूरी को दुर्लभ और कठिन बना देती है. आवागमन के सार्वजनिक साधन हैं नहीं. सो गरीब घर की बेटी चानू को दो घंटे रोज साइकल चलाकर स्कूल जाने-आने के लिए तगड़ी मशक्कत करनी पड़ती है. लेकिन जीवटता देखिए कोचिंग और तमाम सुविधाओं में पल-बढ़ रहे शहरी बच्चों से मुकाबला करती है और दसवीं की बोर्ड परीक्षा में पूरे राज्य में चौथे स्थान पर आाती है. इसे भी सलाम. और साइकल को भी.
साइकल की बात चल रही है तो तमिलनाडु के रंगा राव की कंपनी ‘साइकल प्योर अगरबत्ती’ की बात भी करते चलें. कंपनी का कारोबार 7000 करोड़ का है, जिसके ब्रांड एम्बेसडर्स में अमिताभ बच्चन और सौरभ गांगुली शामिल हैं. बेहद गरीबी से उठकर और स्कूली दिनों में बिस्किट बेचकर इतनी बड़ी कंपनी खड़ी करने वाले रंगाराव ने खुद अगरबत्ती के बंडल साइकल पर रखकर बेचा है. कहते हैं, उन्होंने यह नाम इसलिए चुना क्योंकि ये एक बहुत ही कॉमन नाम है.
1839 में आधुनिक साइकल का अविष्कार होने से पहले यह अस्तित्व में तो थी, लेकिन इस पर बैठकर जमीन पर पांव पीछे की ओर धकेलकर इसे आगे की तरफ बढ़ाया जाता था. स्कॉटलैण्ड के लोहार मैकमिलन ने इसके पहिए को पैरों से चला सकें, ऐसी व्यवस्था की. इसके अविष्कार को लेकर बहुत सारे दावे हैं, ऐसे ही एक दावे के अनुसार 1763 में फ्रांस के पियरे लैलमेंट ने इसकी खोज की थी.
यह भी पढ़ने को मिलता है कि जर्मन के बैरन फॉन डेविस ने 1817 में दुनिया को साइकल की पहली रूपरेखा दी. 1872 में इसे अमेरिका, फ्रांस और इंग्लैंड के यंत्र निर्माताओं ने आकर्षक रूप में पेश किया. भारत में 1890 में अंग्रेज पहली बार भारत में साइकल लेकर आए. फिल्म निर्माताओं को भी इस द्विचक्र वाहिनी ने खासा आकर्षित किया. इसे लेकर बॉलीवुड और हॉलीवुड दोनों जगह फिल्में बनीं. एक फिल्म का जि़क्र करते चलें जो पूरी तरह साइकल रेस पर केन्द्रित थी और सुपर-डुपर हिट भी. गीत-संगीत से भरपूर ये मसाला फिल्म थी. नासिर हुसैन की आमिर अभिनीत यह फिल्म थी- ‘जो जीता वही सिकंदर’.
ठीक है, ये तो सामान्य जानकारी ,है लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि इसी ‘साइकल’ नाम की मशीन ने भारतीय फिल्म जगत को एक बहुत बड़ा और प्रतिष्ठित फिल्मकार दिया है. फिल्मकार, जिसने न सिर्फ दुनिया को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया बल्कि देश का नाम दुनिया के फिल्मी नक्शे पर सुनहरे अक्षरों में लिखवाया भी. वो नाम है- सत्यजीत रे. सत्यजीत रे को फिल्म बनाने का ज़ुनून जिस फिल्म को देखकर चढ़ा और जिसे देखकर बाहर निकलते वक्त उन्होंने फिल्म बनाना तय कर लिया था, उसका नाम था ‘ द बाइसिकल थीफ’. यह इतालवी निर्देशक विटोरियो डी सिका द्वारा निर्देशित फिल्म थी, जिसका मूल नाम था ‘लादी डि बिसिकलेट’. यह एक गरीब पिता की कहानी है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद रोम में अपनी चोरी गई साइकल की खोज करता है, जिसके बिना वह अपनी नौकरी खो देगा और उसका परिवार सड़क पर आ जाएगा.
किसी ने खूब कहा है ‘जि़ंदगी और साइकल दोनों एक जैसी हैं, दोनों को अपना बैलेंस बनाए रखने के लिए चलते रहना पड़ता है.’ जाते-जाते ये भी सुन लीजिए ‘साइकल भी जानती थी हमारी मोहब्बत की राहें, चेन भी अक्सर उसी के मोहल्ले में उतरती थी…’








