Currency Note Material: हम सभी को अपनी जेब, वॉलेट और घर में करेंसी नोट रखना अच्छा लगता है. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि भारतीय नोट किस चीज से बने होते हैं? अगर आपको लगता है कि ये नोट कागज से बने होते हैं तो आप गलत हैं. दरअसल, करेंसी नोट्स जिस पेपर पर तैयार होते हैं, वो कॉटन से बनता है. यह कागज इतना मजबूत होता है कि नए नोट को दोनों सिरों से खींचकर अगर आप फाड़ना चाहें तो नहीं फटेगा. भारतीय रिजर्व बैंक नोट तैयार करने के लिए कॉटन से बने पेपर और खास स्याही का इस्तेमाल करता है.
भारतीय करंसी नोट में इस्तेमाल होने वाला पेपर में से कुछ का उत्पादन महाराष्ट्र की करेंसी नोट प्रेस और बाकी का प्रोडक्शन मध्य प्रदेश के होशंगाबाद पेपर मिल में होता है. कुछ पेपर आयात भी किया जाता है. करेंसी नोट की प्रिंटिंग के लिए ये खास पेपर दुनियाभर में सिर्फ चार कंपनियां बनाती हैं. साफ है कि करेंसी नोट बनाने में कागज का बिलकुल इस्तेमाल नहीं किया जाता है, बल्कि ये कपास से बनता है. वहीं, नोट छापने के लिए ऑफसेट स्याही मध्य प्रदेश के देवास की बैंकनोट प्रेस में बनती है. नोट पर उभरी हुई छपाई की स्याही सिक्कम में स्विस फर्म की यूनिट एसआईसीपीए में बनाई जाती है.
क्या है करेंसी नोट वाला कॉटन पेपर
कॉटन पेपर को रैग पेपर या रैग स्टॉक पेपर के नाम से भी जाना जाता है. कॉटन पेपर को प्रोसेसिंग के बाद कपास के बीजों से चिपक जाने वाले महीन फाइबर या इस्तेमाल किए गए कपड़े से मिलने वाले कपास को प्राथमिक सामग्री के रूप में उपयोग करके बनाया जाता है. बता दें कि 19वीं शताब्दी के मध्य से पहले तक सूती कागज उत्पादित कागज का मुख्य रूप था. 19वीं शताब्दी के दौरान मुख्य कागज सामग्री के रूप में सूती कागज की जगह लुगदी कागज ने ले ली. हालांकि, लुगदी कागज का उत्पादन सस्ता था. लेकिन, इसकी गुणवत्ता काफी कम थी और ये लंबे समय नहीं चलता था. फिर 20वीं शताब्दी में लुगदी-कागज की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ. सूती कागज ज्यादा टिकाऊ साबित हुआ. नजीतजन अहम दस्तावेज अक्सर सूती कागज पर प्रिंट किए जाने लगे. कॉटन पेपर कई ग्रेड में बनाया जा सकता है.

नोट बनाने के लिए कॉटन का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि कॉटन अधिक टिकाऊ होता है. इसकी लाइफ ज्यादा होती है और यह जल्दी कटता-फटता या गीला नहीं होता है. इससे नोट की लाइफ साइकल भी बढ़ जाती है. (Canva)
कैसे बनाता हैं नोट का कॉटन पेपर
कपास की ब्लीचिंग और धुलाई करने के बाद उसकी लुगदी बनाई जाती है. इसका असली फॉर्मूला सीक्रेट है. इसके बाद सिलेंडर मोल्ड पेपर मशीन उस लुगदी को कागज की लंबी शीट में बदलती है. इसी दौरान कॉटन पेपर में वॉटरमार्क जैसे कई सिक्योरिटी फीचर डाल दिए जाते हैं. करेंसी नोट की जालसाजी और नकली नोटों पर लगाम लगाने के लिए ये सिक्योरिटी फीचर डाले जाते हैं. इसी वजह से समय-समय पर भारतीय करेंसी नोटों में बदलाव भी किए जाते हैं. इन सिक्योरिटी फीचर से ही असली और नकली नोट की पहचान की जाती है. देश में नोट जारी का करने का अधिकार सिर्फ आरबीआई के पास है. कानूनी दस्तावेजों की प्रिंटिंग में इस्तेमाल होने वाले पेपर में 25 फीसदी कपास होता है. कॉटन पेपर कॉपी पेपर के मुकाबले बेहतर प्रिंटआउट देता है, क्योंकि यह स्याही या टोनर को ज्यादा आसानी से सोख सकता है.
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नोट का सिक्योरिटी थ्रेड किससे बनता है
कॉटन पेपर को आमतौर पर 25, 50 या 100 फीसदी कॉटन के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है. आमतौर पर कॉटन पेपर को लाइट और वॉटरमार्क के ठीक नीचे एक नंबर को देखकर चेक किया जा सकता है. शत प्रतिशत कॉटन पेपर में थोड़ी मात्रा में एसिड हो सकता है. अभिलेखीय दस्तावेजों में उपयोग से पहले इसका परीक्षण या प्रमाणित किया जाना अनिवार्य होता है. सेकंड-कट कॉटन लिंटर्स की सामान्य औसत फाइबर लंबाई 1.45 माइक्रोन होती है. इसमें शॉर्ट सॉफ्टवुड पल्प की खूबियां होती हैं. नोट को सुरक्षित बनाने के लिए एक ऐसा सिस्टम विकसित किया, जिसमें मेटल की जगह प्लास्टिक स्ट्रिप का इस्तेमाल किया जाता है. कई देशों की सरकारों से जुड़े केंद्रीय बैंकों ने 1990 में नोट में सुरक्षा कोड के तौर पर प्लास्टिक थ्रेड का इस्तेमाल किया. साथ ही थ्रेड पर भी कुछ छपे शब्दों का इस्तेमाल शुरू हुआ, जिसकी नकल अब तक नहीं हो पाई.
कॉटन पेपर पर ही क्यों छापते हैं नोट
कागज के नोट की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती. ये गीला होने पर आसानी से फट सकता है. लिहाजा, आरबीआई नोट बनाने के लिए कॉटन पेपर का इस्तेमाल करता है. कागज के नोट की तुलना में कॉटन पेपर के नोट बहुत ज्यादा मजबूत होते हैं. भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर के कई देशों में नोट बनाने के लिए कॉटन पेपर का ही इस्तेमाल किया जाता है. बता दें कि कपास के रेशे में लेनिन नाम का फाइबर होता है. जब नोट बनाया जाता है तो कपास के अलावा एडहिसिव सॉल्यूशन और गैटलिन का इस्तेमाल भी किया जाता है. इससे करेंसी नोट की उम्र लंबी हो जाती है. यही नहीं, कॉटन पेपर के इस्तेमाल की वजह से ही करेंसी नोट के बंडल्स का वजन कम होता है.
करेंसी नोट को कॉटन पेपर पर छापने से एक तो उसकी उम्र लंबी हो जाती है, दूसरा उसके बंडल का वजन भी काफी कम हो जाता है.
कैसे छापे जाते हैं करेंसी नोट
विदेश या होशंगाबाद से आई कॉटन पेपर शीट एक खास मशीन सायमंटन में डाली जाती है. इसके बाद इंटाब्यू मशीन से इसे कलर किया जाता है. इसके बाद शीट पर नोट छप जाते हैं. बता दें कि एक शीट पर 32 से 48 नोट छापे जाते हैं. शीट पर छपे नोटों पर नंबर डाले जाते हैं. फिर शीट से नोटों को काट लिया जाता है. इसके बाद अच्छे और खराब नोट को अलग कर लिया जाता है. फिर अच्छे करेंसी नोटों को पैक किया जाता है. पैकिंग के बाद बंडलों को विशेष सुरक्षा में भारतीय रिजर्व बैंक तक पहुंचाया जाता है. रिजर्व बैंक के देशभर में 18 इश्यू ऑफिस हैं. छपे नोट सबसे पहले इन ऑफिस में पहुंचते हैं. यहां से उन्हें कमर्शियल बैंक की शाखाओं को भेजा जाता है, जहां से देश के आम नागरिकों के हाथों में पहुंचते हैं.
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किस चीज पर छापे जाते हैं डॉलर
भारत ही नहीं, अमेरिका समेत कई दूसरे देशों में भी करेंसी नोट की छपाई के लिए कॉटन पेपर का ही इस्तेमाल किया जाता है. ब्यूरो ऑफ एनग्रेविंग एंड प्रिंटिंग के मुताबिक, अमेरिका के करेंसी नोट में 25 फीसदी लिनन और 75 फीसदी कॉटन का इस्तेमाल होता है. ब्यूरो के लिए पेपर मैसाच्युसेट्स की केन करेंसी डाल्टन बनात है. दुनियाभर में अधिकृत एजेंसियों के अलावा अगर कोई दूसरी कंपनी या फर्म करेंसी कॉटन पेपर बनाती है तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जाती है.
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FIRST PUBLISHED : May 31, 2023, 16:25 IST








