सस्टेनेबल इज एटेनेबल फेस्ट: भारत में जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर समाधान और सहयोग बढ़ाने के लिए Tata Power और Network18 की पहल

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हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जब जलवायु परिवर्तन और इसकी चुनौतियों पर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है. भारत हरित ऊर्जा इस्तेमाल को बढ़ाना हो या फिर उत्सर्जन. इस दिशा में एक नेतृत्वकर्ता की भूमिका में है. इस तथ्य के रोचक पहलू के बारे में जानें: भारत में सिर्फ सरकार ही ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने का काम नहीं कर रही है, बल्कि यहां का कारोबार जगत भी इसके लिए सक्रिय है. जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वाले देशों में भी भारत अग्रणी है. ऐसे में कारोबार जगत सस्टेनेबिलिटी को अपने कारोबारी मानदंडों और रणनीति में प्रमुख स्थान देता है. ऐसे कारोबार जो समय की चुनौतियों पर खरा उतरते हुए लंबे समय तक चलते रहना चाहते हैं, उनके लिए सस्टेनेबिलिटी बहुत ज़रूरी है.

Tata Group के लिए यह सोच नई नहीं है, बल्कि हमारे आदर्शों में यह शामिल है. ग्रुप के संस्थापक जमशेदजी टाटा से ही हमारे समूह को सस्टेनेबिलिटी को अपनाने के आदर्श और मूल्य मिले हैं. Tata Power के लिए हर भारतीय तक स्वच्छ, पर्याप्त मात्रा में और सस्ती दरों पर ऊर्जा उपलब्ध कराना एक मिशन है. हमारे लिए सुखद बात यह भी है कि Tata Power अपने इस उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है और इसके लिए हमने एक व्यवस्था तंत्र भी बनाया है. हम ऐसे लोगों तक पहुंच रहे हैं, जो भारत की जरूरतों के मुताबिक किफायती दरों पर टिकाऊ तकनीक और सिस्टम बनाने में सक्षम हैं.

इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, Tata Power ने News18 Network के साथ मिलकर एक पहल शुरू की है. ‘सस्टेनेबल इज एटेनेबल’ कैंपेन लॉन्च किया है. इस अभियान का उद्देश्य हरित और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना है. साथ ही, आम भारतीयों के बीच इसे लोकप्रिय और लाइफ़स्टाइल का हिस्सा बनाना भी हमारा लक्ष्य है. Tata Power और News18 Network ने इस पहल के तहत, छोटी-छोटी चीजों के प्रति जागरुकता बढ़ाना है, ताकि समाज में बड़े बदलाव हो सकें. एक आम नागरिक आसानी से इन बदलावों को अपनाकर जलवायु परिवर्तन की इस लड़ाई में बेहतरीन योगदान दे सकते हैं.

पिछले 10 महीनों की बात करें, तो कैंपने ने रिन्यूएबल एनर्जी के इस्तेमाल (सौर, पवन, हाइब्रिड) के तरीकों को लेकर जागरूक बनाया है. लोगों ने बड़ी संख्या में सस्ती और और विश्वसनीय तरीके से रिन्यूएबल एनर्जी को घर, दफ्तरों, अपने काम की जगहों पर अपनाने में रुचि दिखाई है. इसके तहत, घर और काम की जगह पर स्मार्ट लाइट लगाने, घर की छत पर सौर ऊर्जा, घर में आसानी से लगाए जा सकने वाले ऑटोमेशन सिस्टम, इलेक्ट्रिक वाहन के इस्तेमाल जैसी चीजें लोकप्रिय हो रही हैं और इसे अपनाने के लिए जागरुकता भी बढ़ी है.

17 मई को नई दिल्ली में आयोजित सस्टेनेबल इज एटेनेबल (एसआईए) फेस्ट ने हमारे इस अभियान को नई ऊंचाई दी है. इस समारोह में केंद्रीय मंत्रियों, राज्य स्तर के बड़े अफसर, राजदूतों, मशहूर हस्तियों और दूसरे क्षेत्रों के चर्चित शख्सियतों ने हिस्सा लिया. जलवायु परिवर्तन और सस्टेनेबिलिटी के लगभग सभी पहलुओं पर बेहतर तरीके से संवाद किया गया. इस समारोह का उद्देश्य एक ऐसा मंच तैयार करना था, जहां नए विचारों, चुनौतियों और समाधानों पर विचार किया जा सके.

एक सस्टेनेबल दुनिया: स्वच्छ ऊर्जा को हर नागरिक तक पहुंचाने के लिए रणनीति
यह आयोजन इज़रायल, डेनमार्क, उरुग्वे रिपब्लिक के राजदूतों और भारत में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुखों के बीच, मौजूदा दौर में दुनिया में सस्टेनेबल को कैसे आगे ले जाया जा सके, इस पर चर्चा के साथ शुरू हुई. इस चर्चा को CNN-News18 के मैनेजिंग एडिटर जैका जैकब ने मॉडरेट किया.

भारत में इजरायल के राजदूत नाओर गिलोन दोनों देशों के बीच चल रही रिन्यूएबल एनर्जी के कई प्रोजेक्ट के बारे में चर्चा की. खास तौर पर उन्होंने ऊर्जा संरक्षित करने के तरीकों जैसे कि जेवी को एल्युमिनियम एयर बैटरी में संरक्षित करने के बारे में बताया. भारत में एल्यूमीनियम का पर्याप्त भंडार है और यह जलवायु परिवर्तन की दिशा में एक गेम चेंजर साबित हो सकता है. उरुग्वे रिपब्लिक के राजदूत अल्बर्टो ए. गुआनी ने उरुग्वे में जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संरक्षण की दिशा में हुई उल्लेखनीय उपलब्धियों पर चर्चा की. उन्होंने बताया कि उरुग्वे अपनी ऊर्जा की 98% जरूरतों को रिन्यूएबल एनर्जी के ज़रिए पूरा कर लेता है. एक वक्त ऐसा था जब उरुग्वे को अपनी जरूरत की पूरी ऊर्जा जीवाश्म ईंधन के रूप में आयात करनी पड़ती थी. आज न सिर्फ इस क्षेत्र में देश आत्मनिर्भर हो चुका है, बल्कि ग्रीन हाइ़्रोजन के तौर पर अतिरिक्त ऊर्जा के भंडारण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है.

भारत में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख उगो एस्टुटो ने यूरोपीय संघ के उत्सर्जन लक्ष्यों के बारे में बात की. उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को देखते हुए ऊर्जा सप्लाई के लिए किसी एक तरीके पर निर्भरता खत्म करनी होगी. तरीके में विविधता लाना ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद तरीकों में विविधता के अभाव से होने वाली मुश्किलों और ब्लैकमेलिंग को पूरी दुनिया ने देखा है. उन्होंने कहा कि भारत के जलवायु और ऊर्जा परिवर्तन के साझेदारी अभियान भविष्य के लिए बड़ा कदम साबित होंगे. साथ ही, भारत में इस दिशा में इस्तेमाल होने वली तकनीकी क्षमता विकास पर भी सकारात्मक टिप्पणी की. उन्होंने भारत की क्षमता पर यकीन जताते हुए कहा कि यूरोप और भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक ज़रूरतों को भी भारत की तकनीक दक्षता पूरा करने में सक्षम साबित होगी. भारत में डेनमार्क के राजदूत फ़्री स्वेन ने भी कहा कि भारत इस दिशा में बेहतर तकनीकी क्षमता वह भी किफ़ायती दरों पर विकसित करने में सक्षम है. उन्होंने यह भी कहा कि भारत की ओर से तैयार होने वाली तकनीक सबके लिए मददगार साबित होगी.

2030 के लिए लक्ष्य- द बिग रिन्यूएबल एनर्जी चैलेंज
दूसरे पैनल में बातचीत भारत की रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़ी बड़ी चुनौतियों और 2030 के लिए तय लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ने पर आधारित थी. इसमें CNBC TV18 के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख परीक्षित लूथरा ने UNIDO के रेने वैन बर्केल केसाथ बात की. CEEW के सीईओ और जलवायु विशेषज्ञ अरुणाभ घोष, MoRTH सचिव अनुराग जैन और Tata Power Renewable Energy के सीईओ आशीष खन्ना ने हिस्सा लिया. पैनल ने भारत में ऊर्जा स्त्रोतों के परिवर्तन और इससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की.

यह चर्चा मुख्य रूप से कई मुद्दों पर रही. इलेक्ट्रॉनिक मोबिलिटी के लिए एक नियामक संस्था या फ्रेमवर्क तैयार करना, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और तेजी से लोकप्रिय हो रही ग्रीन टेक्नोल़़ॉजी की लागत को कम करने में सार्वजनिक संस्था और भारत के स्टार्टअप कैसे अपनी भूमिका निभा सकते हैं, इन सभी पहलू पर बातचीत हुई. बातचीत में सबने इस बात पर जोर दिया कि भारत हरित ऊर्जा की दिशा में बिना किसी रुकावट के बढ़, इसे संभव बनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

अरुणाभ घोष ने खास तौर पर यह समझाया कि पहले बाज़ार के विस्तार के लिए ज़्यादा से ज़्यादा सप्लाई पर ज़ोर था. उन्होंने कहा कि अब रणनीति में बदलाव करते हुए मांग बढ़ाने की दिशा में काम करना होगा. इसके लिए प्राइवेट सेक्टर को भी बड़ी भूमिका निभानी होगी. आशीष खन्ना ने बीटूबी (कारोबार से कारोबार) ऊर्जा बाज़ार को विकसित करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है. उन्होंने कहा कि छत पर सौर उर्जा संयत्र लगाने से लेकर, सोलर पंप और सोलर माइक्रोग्रिड्स इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे बिजली उत्पादन भी बढ़ेगा. छोटे कारोबारियों और आम लोगों के बीच हरित ऊर्जा या ग्रीन एनर्जी इस्तेमाल करने को लेकर जागरुकता आएगी.

अनुराग जैन ने भी इस विषय पर बोलते हुए कहा कि उन्हें भविष्य के लिहाज से काफी अच्छी संभावना दिख रही है. जैन ने इस बात पर जोर दिया कि सैर ऊर्जा की लागत में पहले से काफी कमी आई है. 2010 की तुलना में सौर ऊर्जा अब बेहद सस्ती दरों पर उपलब्ध है और बिजली के पारंपरिक तरीकों की तुलना में किफायती भी है. रेने वैन बर्केल ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि ऊर्जा उत्पादन के साथ उसे सही तरीके से इस्तेमाल करना भी ज़रूरी है. हरित ऊर्जा किफायती है, लेकिन इसका फायदा तभी है जब इसे सोच-समझकर इस्तेमाल किया जाए.

सस्टेनेबिलिटी के साथ भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना
पावर और न्यू एंड न्यू रिन्यूएब एनर्जी मंत्री, आरके सिंह और CNBC TV18 के प्रबंध संपादक शिरीन भान के बीच भी काफ़ी अच्छी चर्चा हुई. पिछले एक दशक में भारत ने बिजली क्षमता का किस तरह से विस्तार किया है और हरित ऊर्जा में आए बड़े बदलावों और प्रगति पर जीवंत चर्चा हुई. श्री सिंह ने इस चर्चा में पूरे उत्साह (और गर्व!) से हिस्सा लिया. उन्होंने बताया कि भारत इस वक्त लू और गर्मी की चपेट में है. ऐसे हालात में बिजली की मांग (इस साल के लिए अनुमानित तौर पर 230 GW है) काफ़ी बढ़ जाती है. हालांकि, भारत इस मांग को आसानी से पूरा करने में सक्षम है. सिंह ने बताया कि ऐसा इसलिए मुमकिन हो सका है, क्योंकि 2014 के बाद से भारत ने ऊर्जा क्षेत्र में 184000 मेगावाट क्षमता की वृद्धि की है. साथ ही. यह दुनिया में कहीं भी होने वाली सबसे बड़ी क्षमता विस्तार है.

इस चर्चा में केंद्रीय मंत्री ने बताया कि COP 21 NDC (सीओपी 21 एनडीसी) के क्षेत्र में भारत ने समय से पहले ही लक्ष्य पूरा कर लिया है. साल 2015 में भारत का संकल्प था कि 2030 तक ग़ैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हम 40% बिजली उत्पादन कर पा रहे हैं. अच्छी बात यह है कि हम पहले ही 42.8% तक पहुंच गए हैं. यह उपलब्धि हमने समय से नौ साल पहले हासिल की है. केंद्रीय मंत्री ने आशा जताई कि उत्सर्जन में कमी लाने की अपनी प्रतिबद्धता को भी भारत पूरा करने में सफल होगा. श्री सिंह इस उपलब्धि का श्रेय भारत में रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश को प्रोत्साहन देने की नीतियों को देते हैं. उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में निवेश अब पहले की तरह जोखिम भरा नहीं है और बेहतर रिटर्न भी मिल रहे हैं. साथ ही, उनका कहना है कि काम करने के तरीके में पारदर्शिता और स्पष्ट प्रक्रियाओं के पालन की एक संस्कृति विकसित हुई है. उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने एक ऐसा व्यवस्था तंत्र विकसित किया है, जहां किसी भी बड़ी योजना के पूरा होने के लिए सरकार से मिलने वाले पैसे पर निर्भरता नहीं रही है. इसके बजाय, सरकार नीलामी में बोलियों को लगाने पर ज़ोर देती हैं, जहां शानदार प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है. इसमें सोलर मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी के लिए लगाई जाने वाली बोली भी शामिल है.

हरित हाइड्रोजन मिशन की बात करें, तो केंद्रीय मंत्री सिंह का मानना है कि इस दिशा में भारत अब नेतृत्वकर्ता के तौर पर उभर चुका है. उन्होंने उम्मीद जताई कि 5 मिलियन टन के उत्पादन लक्ष्य को आसानी से हासिल कर लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि इस दिशा में वैश्विक समुदाय भी भारत को नेतृत्वकर्ता के तौर पर देख रहा है. इसका प्रमाण यूरोप में उठाए जा रहे संरक्षणात्मक कदम हैं. उन्होंने कहा कि हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में भारत न सिर्फ उत्पादन बल्कि कम लागत के आधार पर भी अग्रणी है.

सतत विकास को हासिल करना: आर्थिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है भारत का हरित ऊर्जा इस्तेमाल की ओर बढ़ना
टावा पावर के सीईओ और एमडी डॉक्टर प्रवीर सिन्हा ने अपने विचारोत्तेजकर भाषण में इस बात पर जोर दिया कि अब बिना देर किए हरित ऊर्जा को लेकर ठोस कार्रवाई किए जाने की जरूरत है. उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा को लेकर भारत की अबतक की उपलब्धियों पर गर्व जताया. साथ ही, वह हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के लिए आगे आने वाली उपलब्धियों को लेकर भी आशान्वित दिखे.

“पिछले 70 सालों में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत में कई गुना बढ़ोतरी हुई है, लेकिन लेकिन हम अभी भी वैश्विक औसत का एक-तिहाई हैं. भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा है. इसे देखते हुए भारत की बिजली की जरूरतों में भारी बदलाव आएगा. ऐसे में हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि कैसे हम इस अतिरिक्त मांग को रिन्यूएबल स्रोतों से पूरा करें. इसके साथ ही साथ हमारे लिए यह भी जरूरी है कि अपने सतत विकास के क्रम में हम उपभोक्ता (कंज्यूमर) से उत्पादक (प्रोज्यूमर्स) होने की प्रक्रिया में बढ़ें, जहां हम में से हर कोई बिजली उत्पादन करने, इसका इस्तेमाल करने और समाज को इसका फायदा देने में सक्षम बन सके.”

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ऐसे भविष्य के लिए बेहतर होती जा रही तकनीक की भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका होगी. जैसे बेहतर केमिस्ट्री बैट्री स्टोरेज में सुधार लाएगी, थर्मल स्टोरेज के नए आइडिया सामने आएंगे या रिन्यूएबल स्रोतों से बिजली उत्पादन की बेहतर क्षमता हासिल होगी.

उन्होंने हरित ऊर्जा ट्रांजिशन से हमारी अर्थव्यवस्था को होने वाले कई फायदों के बारे में भी बताया. चाहे वो धरती को नुकसान पहुंचाए बिना औद्योगिक विकास की तेज रफ्तार हासिल करने की बात हो या फिर हरित कार्यबल के रूप में बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन होना. डॉ. सिन्हा के कैलकुलेशन के मुताबिक इस क्षेत्र में अगले 10 सालों में 10 लाख रोजगार सृजन करने की क्षमता है. टाटा पावर भी कई कौशल विकास संस्थानों के साथ मिलकर इसपर काम कर रहा है.

सतत निर्माण से समृद्ध होता है वातावरण: प्रकृति के लिए सही है ये समाधान
भारतीय शहर तेजी से बढ़ रहे हैं. यहां तक कि छोटे शहर भी गर्मी के असर से जूझ रहे हैं. ऐसे में क्लाइमेट से जुड़े खतरों को कम करने की किसी भी प्रक्रिया में आर्किटेक्चर को भी अनिवार्य रूप से शामिल करने की जरूरत है. इसी क्रम में एक्सप्लोरेशन आर्किटेक्चर लिमिटेड (exploration architecture limited) के फाउंडर और रीजेनरेटिव डिजाइन और बायोमिमेटिक आर्किटेक्चर के क्षेत्र में वैश्विक रूप से पहचान बनाने वाले माइकल पावलिन ने CNN-News18 के स्पेशल प्रोजेक्ट्स एडिटर आनंद नरसिम्हन से बात की. उन्होंने भारत में चल रहे अपने ऐसे प्रोजेक्ट्स को लेकर चर्चा की, जो भविष्य में आर्किटेचर को लेकर हमारी सोच में बदलाव के वाहक बन सकते हैं.

पावलिन ने इस बातचीत में जोर दिया कि हमें सस्टिनेबल आर्किटेक्चर से आगे बढ़ने की जरूरत है. सस्टिनेबल आर्किटेक्चर नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लक्ष्य पर काम करता है, जबकि रेस्टोरेटिव आर्किटेक्चर का लक्ष्य होता है कि कैसे सकारात्मक असर डालें. उन्होंने एक उदाहरण से समझाया कि शहरों की प्लानिंग कैसे तैयार होती है- हमें सबसे पहले यह समझना होता है कि उस हिस्से का ईकोसिस्टम किस तरह से काम करेगा: यह कितना कार्बन पचाएगा, यहां वन्य जीवन को लेकर कितनी संभावनाएं बनेंगी, यहां ऑक्सीजन का कितना उत्सर्जन होगा, यहां कितना पानी फिल्टर होगा, यहां कितनी खाद्य साम्रग्रियों का उत्पादन होगा और ऐसा ही बहुत कुछ. उनके मुताबिक किसी नई प्लांड सिटी के लिए ऐसे लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए.

उन्होंने बताया कि प्रकृति की तरह काम करने पर हम एक ऐसी व्यवस्था तैयार कर लेते हैं, जहां एक सिस्टम का आउटपुट दूसरे की जरूरतें पूरी करता है. अगर हम प्राकृतिक सिस्टम का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो हमें खतरनाक और जहरीले कचरे से भी नहीं जूझना पड़ेगा.

अपनी जड़ों की ओर लौटना और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाना
माइकल पावलिन की तरह ही केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने भी प्रकृति में ही समाधान ढूंढने की वकालत की है. अपने भाषण में भूपेंद्र यादव ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याओं के संदर्भ में जैवविविधता पर ध्यान केंद्रित करने पर काफी जोर दिया.उन्होंने माना कि आज हम पर्यावरण की जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं उनकी मुख्य वजह मानव केंद्रित उन्नति और विकास के मॉडल हैं. संक्षेप में कहें तो इंसानी जरूरतों को हर किसी के ऊपर प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति.

उन्होंने वहां मौजूद लोगों को “प्रकृति रक्षिते रक्षितः” के प्राचीन भारतीय सिद्धांत की याद दिलाई. प्रकृति हमारी रक्षा तभी करती है जब हम अपने चारों ओर फैले जीवन के सभी रूपों की रक्षा और उनका पोषण करते हैं. यह हमें अपने परिवेश पर प्रभुत्व की बजाय उसके संग सामंजस्य और सहवास का दृष्टिकोण देता है. उन्हें देश को संदेश दिया कि हमें पर्यावरण के प्रति जागरूक रखने वाली और उस हिसाब से सोचने वाली अपनी परंपरा की तरफ ही बढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा, “हम जो परिवर्तन लाना चाहते हैं वे अकेले नहीं होंगे, और सिर्फ़ सरकार या किसी एक से ये नहीं हो सकता- जलवायु परिवर्तन से हम सामूहिक रूप से, पूरी सरकार, पूरे समाज को साथ लाकर लड़ सकते हैं और खुद को वापस बेहतर स्थिति में ला सकते हैं.”

क्लाइमेट कम्युनिकेशन को और बेहतर बनाना: बात को और आगे कैसे बढ़ाएं
अंतिम पैनल चर्चा में आनंद नरसिम्हन ने अभिनेता राहुल बोस, ग्रैमी पुरस्कार विजेता संगीत निर्माता, और पर्यावरणविद रिकी केज, और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और UNDP, Youth Climate Champion, प्रजक्ता कोली के साथ बात की. इनसे उन तरीकों को लेकर बात की गई, जिनकी मदद से जलवायु से जुड़े एक्शन और सूचनाएं आम लोगों तक बेहतर तरीके से पहुंच पाएं.

राहुल बोस ने महिलाओं पर जलवायु परिवर्तन के अनदेखे असर को लेकर लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की. उन्होंने गांवों से बाहर निकलने पर खराब पोषण और वेश्यावृत्ति तक से जूझती महिलाओं की समस्याओं को उठाया. उन्होंने कहा कि क्लाइमेट माइग्रेशन भविष्य की नहीं, बल्कि आज की समस्या बन गई है. उन्होंने वहां मौजूद लोगों को पानी बचाने के एक ऐसे छोटे से कदम के बारे में भी बताया, जिसे हर कोई आजमा सकता है. उन्होंने मौजूद लोगों से ही बात कर बताया कि अगर यह कदम उठाया जाए तो सिर्फ दिल्ली में रोजाना 3,75,000 लीटर पानी बचाया जा सकता है.

एक तरफ राहुल ने आसान और त्वरित रूप से किए जाने वाले उपायों की बात की, तो प्रजक्ता ने इस बात पर जोर दिया कि इस संबंध में हमें अपनी बात ऐसे समझानी हैं, जिससे वे खतरनाक न दिखें. उन्होंने बताया कि युवाओं को आंकड़ों की बजाय कहानियों की मदद से आसानी से जोड़ा जा सकेगा. रिकी केज भी इस दृष्टिकोण से सहमत दिखे. उन्होंने बताया कि किसी चीज के बारे में बातचीत करने का उनका अपना तरीका भी वैसा ही होता है, जो प्यार से भरा हो. उन्होंने इसे ‘डेविड एटनबरो दृष्टिकोण’ ‘David Attenborough approach’ कहा, जो इस बात को मानता है कि प्रकृति से हमारा प्रेम ही इसे बचाए रखने की सबसे बड़ी प्रेरणा के रूप में काम करता है.

हर किसी के लिए सततता को सहज (Sustainable Attainable) बनाना
जैसा भूपेंद्र यादव ने कहा, पर्यावरण को बचाना किसी एक संगठन या एक सरकार या एक देश के अकेले का काम नहीं है. ऐसे में भौगोलिक और सांस्कृतिक दूरी को पाटने के साथ-साथ विचारों और सीख को साझा करने की जरूरत है. Sustainable is Attainable Fest ऐसी ही जगह, जिसे इस तरह की बातचीत, विचारों को साझा करने और नए सहयोगों की शुरुआत के लिए एक प्लेटफॉर्म के रूप में तैयार किया गया है.

जैसा कि डॉ. प्रवीर सिन्हा ने ठीक कहा कि, “हम अपने बच्चों, आने वाली पीढ़ी के एहसानमंद हैं. यह ऊर्जा परिवर्तन हमारे लिए एक जिम्मेदारी और कर्तव्य है. यह परिवर्तन केवल और केवल तभी होगा जब हम इसकी जिम्मेदारी लेंगे. सिर्फ इसलिए नहीं कि सरकार हमसे पूछ रही है या कोई ऐसे करने को कह रहा है, बल्कि हमें मिलकर बदलाव लाने की जरूरत है. अगर हम एक ज्यादा हरी-भरी, स्वस्थ और सततता से भरी दुनिया की विरासत सौंपते हैं, तो हम में से हर कोई इस बदलाव का वाहक और इसका चैंपियन होगा.”

इतिहास में हमें सही पक्ष में देखा जाए इसके लिए करने को बहुत कुछ है. जहां तक जलवायु परिवर्तन का सवाल है, तो हम आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं. अच्छी खबर यह है कि आज प्रौद्योगिकियां मौजूद हैं. राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है. कल धरती मौजूद रहे, इसके लिए तमाम संगठन ऐसे परिवर्तन के लिए भी तैयार हैं, जो महंगे हैं. बड़े परिवर्तन की आहट हैं.

ऐसे में आप भला पीछे कैसे रह सकते हैं? व्यक्तिगत प्रयासों में ताकत होती है कि वे जनांदोलन का रूप ले लेते हैं. हमें अपने प्रयासों में नाटकीयता लाने या वीर बनने की जरूरत नहीं. यह भी जरूरी नहीं कि ये प्रयास महंगे या जटिल हों. अगर आपको प्रेरणा की जरूरत है, या अगर आप यह जानना चाहते हैं कि समाधान क्या हैं और क्या कदम उठाए जा सकते हैं, तो Sustainable is Attainable का रुख करें. आप यहां पूरा वीडियो भी देख सकते हैं और इसे लोगों संग साझा भी कर सकते हैं.

Tags: Climate, Climate Change, Network18, Tata

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Author: Up Head Line

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