Movie On Savarkar : कौन सी दो शख्सियतें ताजिंदगी रहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रेरणास्रोत

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हाइलाइट्स

नेताजी के लिए विवेकानंद पूरी जिंदगी ऐसे गुरु रहे जो उन्हें जिंदगी के रास्तों में राह दिखाते रहे
उनके सियासी गुरु चितरंजन दास थे, जिनके साथ उन्होंने लंबा काम किया, उनकी हर सलाह मानते थे

देश में हिंदुत्व के असली मसीहा कहे जाने वाले विनायक दामोदर सावरकर की नई फिल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ का टीजर रिलीज होते ही इस पर कई तरह विवाद शुरू हो गए हैं. दरअसल फिल्म में उन्हें भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और खुदीराम बोस को प्रेरणा देने वाला बताया गया है. इन तीनों ही क्रांतिकारियों ने जिंदगीभर जो लिखा और कहा, उसमें जिन लोगों की तारीफ की,वो नाम अलग थे. सुभाष बोस ने तो जिंदगी भर हर जगह अपने भाषणों और लेखों में लगातार कहा कि दो लोगों ने उनकी जिंदगी को बदलकर रख दिया, ये दो नाम थे स्वामी विवेकानंद और उनके राजनीतिक गुरु देशबंधु चितरंजन दास.

सुभाष बोस, भगत सिंह और खुदीराम के लेख और भाषण पढ़कर लगता है कि इन महान नायकों ने हमेशा राष्ट्र को ऊपर रखा. सांप्रदायिक शक्तियों की निंदा की. भगत सिंह ने तो बहुत कड़ाई से धर्म के नाम राजनीति करने वालों को अपने लेखों में आड़े हाथों लिया. सुभाष चंद्र बोस ने यही किया. उन्होंने सभी धर्मों को साथ में लेकर आजाद हिंद फौज बनाई और कंधे से कंधा मिलाकर सभी के साथ देश की आजादी के लिए लड़ाई भी लड़ी.

नेताजी ने “द इंडियन स्ट्रगल 1920- 42 में लिखा, ‘दूसरे विश्व युद्ध से पहले मैने जिन्ना व सावरकर से आजादी के लिए संघर्ष की बात की. जिन्ना अंग्रेजों की मदद से पाकिस्तान बनाना चाहते थे. सावरकर सोच रहे थे कि सेना में घुसकर हिंदू कैसे सैनिक ट्रेनिंग लें. मैं नाउम्मीद हो गया. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जीवनभर दो ही लोगों को अपना आदर्श माना. एक थे देशबंधु चितरंजन दास और दूसरे स्वामी विवेकानंद. विवेकानंद ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदलकर रख दिया. हां उसके बाद सार्वजनिक तौर पर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर जिस शख्स की हमेशा तारीफ की तो वो महात्मा गांधी थे, जिससे उनके मतभेद भी जाहिर थे.

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रणदीप हुडा द्वारा अभिनीत फिल्म “स्वातंत्र्य वीर सावरकर” का टीजर 28 मई को जारी हुआ, जिसमें उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और खुदीराम बोस का प्रेरणास्रोत बताया गया है, जिसे लेकर विवाद छिड़ गया है . (randeep hooda/instagram)

इस फिल्म के टीजर आने के बाद इसके एक्टर रणदीप हुड्डा ने अपने ट्वीट में भी ऐसा ही कुछ लिखा, जिसमें वीर सावरकर को सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह को प्रेरणा देने वाला कहा. इस पर बंगाल में तीखी प्रतिक्रिया हो ही रही है. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पड़पोते चंद्र कुमार बोस ने फिल्म मेकर्स और रणदीप हुड्डा के दावे को सिरे से खारिज किया.

उन्होंने कहा, ”नेताजी सुभाषचंद्र बोस केवल दो महान हस्तियों से प्रेरणा लेते थे. एक स्वामी विवेकानंद, जो कि उनके आध्यात्मिक गुरु थे और दूसरे स्वतंत्रता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास थे, जिन्हें नेताजी राजनीतिक सलाहकार मानते थे. इन दोनों के अलावा मुझे नहीं लगता है कि नेताजी किसी से प्रेरणा लेते थे.” चंद्रकुमार ने सावरकर और नेताजी की विचारधारों को भी विपरीत बताया. कहा कि वास्तव में उन्होंने सावरकर का विरोध किया.”

जब नेताजी नाउम्मीद हुए
नेताजी ने लिखा है कि सावरकर और मुहम्मद अली जिन्ना से आप आज़ादी के आंदोलन में किसी तरह की उम्मीद नहीं रख सकते. उन्होंने ये भी कहा कि हिन्दू महासभा से भी कोई आशा नहीं की जा सकती. नेताजी सेकुलर लीडर थे. उन्होंने साम्प्रदायिक लोगों की मुखालफत की. दोनों भाइयों शरद चंद्र बोस और सुभाष चंद्र बोस ने हमेशा फिरकापरस्ती का पूरी तरह से विरोध किया.

अगर रणदीप हुड्डा के ट्वीट की तरह फिल्म में भी कुछ ऐसा अगर फिल्माया गया है तो इसके रिलीज होने पर फिल्म के विवादित होने की पूरी गुंजाइश है. आइए ये जानते हैं कि सुभाष चंद्र बोस ने कैसे विवेकानंद और चितरंजन को अपना प्रेरणास्रोत माना और इसे गाहे बगाहे कहा और लिखा भी.

स्वामी विवेकानंद की किताबें और शिक्षाएं नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए ऐसा रास्ता बनीं, जो उन्हें ताजिंदगी प्रकाश और रास्ता दिखाती रहीं. (news18)

कैसे विवेकानंद आए नेताजी की जिंदगी में
नेताजी सुभाष ने अपनी आत्मकथा एन इंडियन पिलग्रिम – एन अनफिनिस्ड ऑटोबॉयोग्राफी (An Indian Pilgrim: An Unfinished Autobiography) में लिखा, एक दिन वह कटक में उसी दौरान शिफ्ट हुए अपने एक परिचित के घर गए. उन वह अजीब मानसिक झंझावातों से बेचैनी महसूस कर रहे थे. उन परिचित की पुस्तकों की अलमारी पर नजर दौड़ाते हुए नजर अचानक स्वामी विवेकानंद की किताब पर पड़ी. उसके कुछ पन्ने बमुश्किल पलटे ही होंगे कि उन्हें लगा कि वह जिस बात की तलाश कर रहे हैं, वह आखिरकार उन्हें मिल गई है.

फिर विवेकानंद उनके जीवन के नए आदर्श बन गए
वो पुस्तकें उन्होंने पढ़ने के लिए उधार मांगीं. घर पहुंचे. जब तक उन्होंने उसे पूरा पढ़ नहीं लिया, तब तक उठे ही नहीं. उनका पूरा अस्तित्व रोमांचित हो उठा. विवेकानंद को पढऩा रोमांचक और सुखद अनुभव था. विवेकानंद उनके जीवन के नए आदर्श बन गए. फिर लंबे समय तक वह उनकी शिक्षाओं और कामों के बारे में पढ़ते रहे. उन्हें लगने लगा कि विवेकानंद की व्यावहारिक सलाहें और दर्शन ऐसा था, जिसको जीवन का आधार बनाया जा सकता है.

सुभाष ने लिखा, सबसे अच्छी बात ये थी विवेकानंद मानवता की सेवा के साथ मातृभूमि की सेवा की बात करते थे. वह कहते थे कि उपनिषदों का एक ही सार है-सामर्थ्यवादी बनो, अपने आप पर श्रृद्धा रखो, भरोसा करो, जैसा खुद पर प्राचीन काल में नचिकेता ने किया था. विवेकानंद ने साधुओं पर करारा प्रहार करते हुए कहा था-मोक्ष चाहिए तो गीता छोड़ो, जाकर फुटबाल खेलो.

चितरंजन दास भी गांधीजी के साथ पहले असहयोग आंदोलन में कूदे लेकिन चौरीचौरा कांड के बाद गांधीजी के रुख से असंतुष्ट होकर उन्होंने अपनी अलग राह बना ली. (फाइल फोटो)

तब उन्होंने तय किया कि वह विवेकानंद के ही रास्ते पर चलेंगे
जिस समय विवेकानंद सुभाष उनके जीवन में आए, तब वह बमुश्किल 15 साल के थे. उनके भीतर एक क्रांति की शुरुआत हो गई, मानो सबकुछ बदल सा गया. जो प्रश्न उनके मन-मस्तिष्क को मथते रहते थे, उन सभी के संतोषजनक जवाब उन्होंने पा लिए थे. उन्होंने विवेकानंद जी के बताए रास्तों पर चलने का निश्चय कर लिया…

फिर विवेकानंद की किताबों के जरिए ही उनका परिचय उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस से हुआ. उनकी शिक्षाओं का मूल आधार था-काम वासना और सांसारिक वैभव का त्याग. ये दोहरा त्याग ही किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक सेहत का पैमाना था. परमहंस जी द्वारा कही जा रही बातों का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि वो जो कहते थे, उसे खुद अनुभव कर चुके थे. उन रास्तों पर चल चुके थे. वो स्वयं आध्यात्मिक शिखर का छू चुके थे.

जल्द ही सुभाष ने ऐसे मित्रों का समूह तैयार कर लिया जो उन्हीं की तरह विवेकानंद और रामकृष्ण में दिलचस्पी रखता हो. उन्होंने अब उन संस्कृत के श्लोकों को दोहराना बंद कर दिया जो हर हाल में माता-पिता की आज्ञा का पालन करने की सीख देते थे. इसकी बजाए उनकी दिलचस्पी उन श्लोकों में थी, जो सांसारिक बंधनों से मुक्ति सिखाते थे.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने सियासी गुरु चितरंजन दास और नेहरू के साथ (फाइल फोटो)

रामकृष्ण ने जहां उनके लिए सांसारिक चेतना से तगड़े संघर्ष की जमीन तैयार की तो विवेकानंद ने तात्कालिक सामाजिक व्यवस्था के विरोध में ला खड़ा किया. बाद में भी जब वह कभी संकट में खुद को पाते तो विवेकानंद की शिक्षाओं के जरिए उससे निकलने की कोशिश करते. विवेकानंद की शिक्षाओं ने उन्हें आध्यात्म के रास्ते पर चलना सिखाया.

सियासी गुरु थे लंदन से विलायत की पढ़ाई करने वाले चितरंजन
अब बात करते हैं उनके सियासी गुरु और सियासी सलाहकार चित्तरंजन दास (Chittaranjan Das) की. उनसे शायद ही कोई अपरिचित हो. लोग प्यार से उन्हें ‘देशबंधु’ कहकर पुकारते थे. चित्तरंजन दास ने एक वकील, राजनीतिज्ञ और पत्रकार के तौर पर भारत को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराने में जो भूमिका निभाई, उसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता है. यही कारण है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे.

उग्र विचारों और नीतियों के लिए जाना जाता था
चित्तरंजन दास वकालत की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गए. 1892 में भारत लौटे. कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत शुरू कर दी. क्रांतिकारी अरबिंदो घोष मुकदमे के सिलसिले में उनकी ख्याति पूरे देश में फैल गई. दास 1906 तक कांग्रेस में शामिल हुए. दास को उनके उग्र विचारों और नीतियों के लिए जाना जाता था. वैसे गांधीजी के असहयोग आंदोलन में उन्होंने बंगाल में भरपूर सहयोग दिया. गिरफ्तारी हुई.

चितरंजन ने बाद में खुद को गांधी के रास्ते से अलग कर लिया
चितरंजन दास की पत्नी बसंती देवी भी इस दौरान गिरफ्तार हुईं. माना जाता है कि वह असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला थीं. आजादी के नायकों के लिए काफी आदरणीय थीं. सुभाष चंद्र बोस तो उन्हें अपनी मां मानते थे.

1921 में जेल में रहते हुए चितरंजन दास को कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया. लेकिन उन्होंने पद अस्वीकार कर दिया. चौरीचौरा कांड के बाद गांधीजी से असहमत होते हुए उन्होंने स्वराज पार्टी बनाई. वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. जितने अच्छे नेता और वकील, उतने ही अच्छे लेखक भी. सुभाष को जब लगा आजादी की लड़ाई को लेकर गांधीजी की योजनाएं स्पष्ट नहीं हैं तो वह पूरी तरह से चितरंजन दास के जुड़ गए. सुभाष बोस को वह लगातार सलाह और मार्गदर्शन देने का काम करते रहे. उनके निधन पर सुभाष रो पड़े थे. उन्होंने कहा, मैने अपना मार्गदर्शक खो दिया.

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Author: Up Head Line

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