वो घर भी कोई घर है, जहां बच्चियां न हों : बशीर बद्र

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मन का हाल शब्दों में बयान करना हो, तो बशीर बद्र की गज़लें सबसे पहले ज़ेहन में आकर बैठ जाती हैं. जिसने भी इन्हें पढ़ा इनका मुरीद हो गया. बशीर बद्र को पूरी तरह से ग़ज़ल का शायर माना जाता है. उन्होंने खुद भी लिखा है, “मैं ग़ज़ल का आदमी हूं. गज़ल से मेरा जनम-जनम का साथ है. गज़ल का फ़न मेरा फ़न है. मेरा तजुर्बा गज़ल का तजुर्बा है. मैं कौन हूं? मेरी तारीख़ हिन्दुस्तान की तारीख़ के आसपास है.” कई साल पहले साहित्य अकादमी दिल्ली के एक अवॉर्ड फंक्शन में बशीर साहब ने कहा था, “गज़ल में खुद को तलाश करना एक साधना है, जिसे ‘एक्सरसाइज़’ और ‘प्रिपरेशन’ कहना चाहिए. हमारे इस अमल में गज़ल के कई करोड़ सुनने और पढ़ने वाले अमली तौर पर शरीक होते हैं. गज़ल का सच्चा शेर लम्हा लम्हा ‘ग्रो’ करता है.”

‘सैयद मोहम्मद बशीर’ जिनका तख़ल्लुस ‘बद्र’ है और इसी से बनता ‘बशीर बद्र’, जिस नाम से हम इस महान गज़लकार को पहचानते हैं. बशीर साहब ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. और पी.एच.डी की और गज़लों की रिवायत को नया आयाम दिया. वे जब सात साल के थे, तभी से शेरो-शायरी करने लगे थे. 15 फरवरी 1935 को जन्में बशीर बद्र को 1999 में पद्मश्री और उर्दू के साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया. उनकी रचनाएं अंग्रेजी, फ्रेंच सहित कई भाषाओं में अनूदित हुई हैं.

बशीर बद्र ने दुनिया के दो दर्जन से ज्यादा मुल्कों के मुशायरे में शिरकत की. करोड़ों लोगों की जनभावनाओं से जुड़ी गज़लें लिखने वाले बशीर बद्र को आम आदमी का गजलकार कहा जाता है. आप भी पढ़ें उनकी दो मशहूर गज़लें, जिन्हें मुशायरों में जब-जब पढ़ा गया ये लोगों के दिल में उतर गए-

1)
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों

वो शाख़ है न फूल, अगर तितलियां न हों
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों

पलकों से आंसुओं की महक आनी चाहिए
ख़ाली है आसमान अगर बदलियां न हों

दुश्मन को भी ख़ुदा कभी ऐसा मकां न दे
ताज़ा हवा की जिसमें कहीं खिड़कियां न हों

मै पूछता हूं मेरी गली में वो आए क्यों
जिस डाकिए के पास तेरी चिट्ठियां न हों

2)
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में

और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन सांप रखता है उस के आशियाने में

दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी
कितनी देर लगती है उस को भूल जाने में

ज़िंदगी की आम बातों को सहजता, सरलता और सलीके से ग़ज़लों में कहना मशहूर शायर बशीर बद्र की ख़ासियत है. बशीर साहब का शेर हमारे देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कभी पाक के पीएम भुट्टों के सामने पढ़ा था, जिसे भारतीय संसद में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दुहराया- ‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजायश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों.’ इनके शेरों का स्वाद ज़बान से उतरने का नाम ही नहीं लेता. वैसे देखा जाए, तो बशीर बद्र की गज़लें न होतीं तो हम सबके प्रिय जगजीत सिंह की गायकी में भी कुछ कमी रह जाती. बशीर बद्र का हमारे समय में होना हमारे लिए सौभाग्य की बात है.

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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