
जुगल कलाल/ डूंगरपुर. आदिवासी समाज हमेशा से ही अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है. उन्हीं परंपरा में से एक है बारात लेकर आए दूल्हे का स्वागत करना. आदिवासी समाज की महिलाए दूल्हे के स्वागत में स्थानीय भाषा वागड़ी गीत गाकर में दूल्हे का स्वागत करती हैं. आदिवासी महिला ने गीतो के ज़रिए दुल्हे से कहती हैं कि उनकी बेटियां का जिंदगी भर साथ देगे और उसकी सारी परेशानियां अपनी समझ उन परेशानियों का हल करोगे. फिर इसके बाद दूल्हा उनके गीतों का जवाब देता है.
दूल्हे के पैर छूती है दुल्हन की मां
आदिवासी अंचल डूंगरपुर में आदिवासी समाज प्रत्येक कार्यक्रम में अपनी अनोखी परंपरा का निर्वहन करते हैं. आदिवासी जोड़े के शादी में दुल्हन के पक्ष की महिला पहले दुल्हे से स्वागत में जीवन भर साथ रहने के कसम खिलवाती हैं. उसके बाद दुल्हे को शादी के मंडप में एंट्री करने देती है. वहीं, दुल्हन की बहनें चावल और तिलक कर दुल्हे का स्वागत करती हैं. बहनों के बाद दुल्हन की बुआ स्वागत करती है. आख़िर में मां दुल्हे की आरती ऊतारती है और दूल्हे के पैर छूते हुए दुल्हे के कान, पैर, सिर और हाथों तिलक लगाती है.
इस परंपरा का निर्वहन होने के बाद दुल्हा के घर के बेटे का दर्जा दिया जाता है. इसके अलावा बाराती बनकर आए लोगों दुल्हे के स्वागत के वक्त दुल्हे के सिर सफ़ेद कपड़े से ढकते हैं. ताकि दुल्हे को कोई बुरी नज़र नही लगे. इस परंपरा को स्थानीय भाषा में तोरण पोकना कहते हैं.
गर्मी के मौसम में ही होती है शादी
आपको जानकार हैरानी होगी आदिवासी समाज में शादियां सिर्फ़ गर्मियों के मौसम में ही होती हैं. इसके पीछे की वजह ऐसा नहीं है कोई शुभ मुहूर्त सर्दियों में नहीं होता. बल्कि सदियों के मौसम में खेतों में फसलें बाई होती है. अगर शादी सर्दी के मौसम में करवाएगे तो फसलें ख़राब हो जाएंगी. इसलिए गर्मी के मौसम आदिवासी समाज में अधिकतर शादियां होती हैं.
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FIRST PUBLISHED : May 24, 2023, 20:47 IST








