अपने लोगों की स्मृतियों को बचाना आवश्यक कार्य है क्योंकि इससे न केवल हम अपनी परंपरा को सुरक्षित रख पाते हैं बल्कि हमें आगे सही रास्ता खोजने में भी मदद मिलती है. राजनेता जहां जनता से शक्ति लेते हैं वहीं लेखक जनता को शक्ति प्रदान करते हैं. ये कहना है हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. असगर वजाहत का.
उदयपुर में आलम शाह खान की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में असगर वजाहत ने कहा कि आलम शाह खान की कहानियां खुले अंत वाली होती हैं जो पाठकों को मजबूत बनाती हैं. खान की प्रतिनिधि कहानियां अपने खास अंदाज के कारण अविस्मरणीय हैं.
राजस्थान साहित्य अकादमी तथा आलम शाह खान यादगार समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में असगर वजाहत सहाब ने आलम शाह खान पर केंद्रित एक वेबसाइट का लोकार्पण भी किया.
कार्यक्रम में चर्चित व्यंग्यकार फारुक आफरीदी ने कहा कि आलम शाह खान समाज के गरीब, पिछड़े, मजदूर और महिला वर्ग की चिंताओं और तकलीफों के चितेरे कथाकार थे. डॉक्टर खान ने मानव अधिकारों के हनन को लेकर अपनी कहानियां लिखीं और मजलूम, बेजूबान और हाशिये के समाज के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाया.
लेखक प्रबोध कुमार गोविल ने कहा कि आलम शाह खान का नाम उनके लिए आकर्षण था. आलम शाह साहब की कई कहानियां पढ़ीं. उनकी कहानियों पर मजबूत पकड़ थी, उनके साहित्य पर लम्बे समय पर चर्चा होती रहेगी. प्रबोध कुमार गोविल ने कहा कि आंचलिक-जीवन पर आलम शाह की गहरी पकड़ एक धरोहर है.
वरिष्ठ साहित्यकार गोविंद माथुर ने कहा कि राजस्थान के लेखकों में आलमशाह की चर्चा अधिक नहीं हुई है. आलमशाह खान सर्वहारा वर्ग की कहानियां लिखते थे, उनकी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए हमें कोशिश करनी चाहिए और साहित्य अकादमी तथा अन्य संस्थाओं को भी आगे आना चाहिए.
जाने-माने लेखक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि आलम शाह खान की आज भी जरूरत है. उनका कबीराना अंदाज गजब का था, वे स्पष्टवादी एवं निर्भीकता के प्रतीक थे. उनके चरित्र में दोहरापन नहीं था, वे विद्रोही प्रवृति के लेखक थे. कबीर की तरह विद्रोही प्रवृति के थे. उनकी कहानियां मनोरंजन के लिए नहीं थीं. जीवन के अस्तित्व का संघर्ष उनकी कहानियों में झलकता था.
ऊर्दू अफसानानिगार डॉ. सरवत खान ने कहा कि शाह की कहानियां आने वाली पीढ़ियां पढ़ेंगी और हमेशा प्रासांगिक रहेंगी. किशन दाधिच ने कहा कि शाह पर संस्मरणों की किताब आनी चाहिए. वे खुद्दारी के सिपाहसलार थे. उनकी भाषा अपने समय और परिवेश की भाषा है. समय के दुख को निकटता से देखते थे. उनकी कहानियों में समाज का दुख झलकता था.

कार्यक्रम में वरिष्ठ आलोचक प्रो. माधव हाड़ा ने वंश भास्कर और वचनिकाओं पर लिखी उनकी शोध-आलोचना की चर्चा की. प्रोफेसर हाड़ा ने कहा कि पुराने साहित्य में खान साहब की रुचि गति अद्भुत और अनुकरणीय थी.
युवा आलोचक पल्लव ने समांतर कहानी आंदोलन की चर्चा करते हुए उसमें खान की कहानियों की विशिष्टता को रेखांकित किया.
इसी कार्यक्रम में एक अन्य सत्र की अध्यक्षता राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. दुलाराम सहारण ने की. उन्होंने कहा कि अकादमी राजस्थान के पुरोधाओं के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित करेगी. उन्होंने घोषणा की कि राजस्थान साहित्य अकादमी अगले वर्ष प्रोफेसर आलम शाह खान के सम्मान में दो दिवसीय आयोजन करेगी.
भारतीय लोक कला मंडल के निदेशक डॉक्टर लईक हुसैन ने आलम शाह खान की चर्चित कहानी ‘मौत का मज़हब’ की प्रस्तुति के विविध पक्षों की चर्चा की. उन्होंने कहा कि आलम शाह की चर्चित कहानियों में जिन मानवीय मूल्यों का चित्रण है उन्हें जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक है.
युवा रंगकर्मी सुनील टाक में प्रोफेसर आलम शाह खान की कहानियों के नाट्य रूपांतरण एवं लघु फिल्म निर्माण की संभावनाओं की चर्चा की. कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर हेमेंद्र चंडालिया ने किया. कार्यक्रम के अंत में डॉ. तबस्सुम खान और समिति अध्यक्ष आबिद अदीब ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
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FIRST PUBLISHED : May 18, 2023, 18:19 IST








