हाइलाइट्स
तालिबान ने मौलवी अब्दुल कबीर को अफगानिस्तान का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया है.
मौलवी अब्दुल कबीर ने अमेरिका साथ दोहा समझौते में बड़ी भूमिका निभाई थी.
तालिबान में मौलवी कबीर का कद पिछले कुछ समय से तेजी से बढ़ रहा है.
मध्य एशिया में होने वाली कोई भी घटना भारत को प्रभावित कर सकती है. इसलिए वहां पर होने वाली हर घटना पर भारतीय राजनयिकों और कूटनीतिक विशेषज्ञों की निगाहें जमी रहती हैं. आजकल अफगानिस्तान और तालिबान पर भी भारत की पैनी नजर है क्योंकि अफगानिस्तान मध्य एशिया और पाकिस्तान के मामलों को बहुत प्रभावित करता है इसलिए वहां की छोटी बड़ी घटना पर नजर रखना जरूरी है. अफगानिस्तान में तालिबान का शासन होने से यह और भी जरूरी हो गया है जिसके आंतकी पाकिस्तान की मदद से कश्मीर में समस्या पैदा करते रहे हैं. हाल ही में तालिबान के सुप्रीम लीडर हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने मौलवी अब्दुल कबीर को अफगानिस्तान का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया है.
अब दूरियां नहीं हैं तालिबान से
भारत ने एक समय तालिबान से संबंध तोड़ रखे थे. तालिबान को भारत का प्राकृतिक शत्रु के तौर पर देखा जाता था. थी. लेकिन जब से अमेरिका ने 20 साल बाद अफगानिस्तान छोड़ा और तालिबान को काबुल पर कब्जा करने दिया तब हालात बहुत अलग हो गए और भारत ने तालिबान से दूरी बनाने की जगह उससे बातचीत की प्रक्रिया में शामिल करने का विकल्प अपनाया.
नई नियुक्त पर विचार करने की जरूरत
तालिबान के साथ भारत सक्रियता के साथ द्विपक्षीय संबंध बनाने के प्रयास करने में लगा है. ऐसे में कुछ समय के लिए तालिबान में नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति भारत के लिए नए हालात को समझने और विश्लेषण करने के जरूरत पर बल देता है. भले ही मौलवी अब्दुल कबीर की नियुक्ति अस्थाई ही क्यों ना हो.
कार्यवाहक ही क्यों
अफगानिस्तान के वर्तमान प्रधानमंत्री मुहम्मद हसन अखुंद की सेहत अच्छी नहीं है इसलिए मौलान कबीर को लाया गया है और वे अखुंद के ठीक होने तक पद पर बने रहेंगे जो 2021 से तालिबान के सत्ता में वापस आने के साथ ही अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री रहे हैं, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके दिल की सेहत ठीक नहीं है.
फिलहाल प्रधानमंत्री रहे मौलाना मोहम्मद हसन अखुंद की तबियत खराब होने की वजह से मौलाना कबीर कार्यवाहक के तौर पर काम करेंगे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
अमेरिका के साथ बातचीत में बड़ी भूमिका
मौलवी अब्दुल कबीर अफगानिस्तान के पूर्वी पाकतिका प्रांत की जादरान जनजाति के सदस्य हैं. वे तालिबान शासित नानगरहार प्रांत के 1996 से लेकर 2001 तक गवर्नर रह चुके हैं. लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा अमेरिका के साथ कतर समझौते के लिए हुई बातचीत में अहम भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है.
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सबसे बड़ी उपलब्धि
कहा जाता है कि मौलाना कबीर की ही वजह से दोहा डील संभव हो सकी जिसकी वजह से अमेरिका और तालिबान अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की निकासी पर सहमत हुए थे और वहां शांति के लिए खाका तैयार किया जा सका था. इसी समझौते में अफगानिस्तान के अंदर बातचीत के जरिए राजनैतिक समाधान निकालने के काम करने पर भी सहमति हुई थी.

दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते के लिए हुई बातचीत में मौलाना कबीर का बड़ा योगदान था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
तालिबान में मौलाना कबीर का रुतबा कायम
लेकिन अमेरिकी सेना के जाने के फौरन बाद ही अफगानिस्तान ने तेजी से पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया. दोहा समझौते के दौरान तय की गई योजना के अनुसार कुछ नहीं हो सका और तालिबान ने महिलाओं पर पाबंदियां जारी रखीं. लेकिन इन सब के बाद भी मौलवी कबीर का तालिबान में रुतबा और महत्व कम नहीं हो जाता है.
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इससे पहले भी मौलवी कबीर ने 2021 के बाद तालिबान के लिए कई जिम्मेदारियों को निभाया है. शुरुआत में उन्हें अखुंद के आर्थिक उप सहयोगी के रूप में चुना गया और फिर तालिबान के प्रधानमंत्रै के राजनैतिक डिप्यूटी बन गए. उनका चयन दर्शाता है कि किस तरहसे उनका तालिबान में कद बढ़ रहा है. भारत के लिए फिलहाल यह कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं है. लेकिन भारत का विदेश मंत्रालय अभी सांस्कृतिक स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम के आयोजन से अफगानिस्तान और तालिबान से बातचीत कर रहा है. इसमें मौलाना कबीर इसमें भारत के लिए अधिक सहयोग कर सकते हैं
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Tags: Afghanistan, Asia, India, Research, Taliban, World
FIRST PUBLISHED : May 18, 2023, 13:01 IST








