तजेंद्र सिंह लूथरा की चर्चित कविताएं- ‘बिखर जाये सारा अमृत, अब नहीं कोई भटकन’

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वरिष्ठ कवि और आईपीएस अधिकारी तजेन्द्र सिंह लूथरा का कविता संग्रह ‘एक नया ईश्वर’ वाणी प्रकाशन से छपकर आया है. इस संग्रह की भूमिका प्रख्यात गीतकार गुलज़ार साहब ने लिखी है. वे लिखते हैं- “मैं कुछ बेतकल्लुफ होने लगा हूं, तजेंद्र की कविताएं पढ़कर. हालांकि पुलिस में उसका ओहदा जानकर मुझे सैल्यूट करना चाहिए था. अब पुलिसिया कहकर गले लगाने को जी करता है, क्या खूब शायर है.”

गुलज़ार लिखते हैं- “तजेंद्र एक प्रोगेसिव शायर हैं और जानते हैं कि किसी भी सोसायटी की तरक्की, प्रगति, प्रश्न बिना, सवाल बगैर नहीं होती. लेकिन कभी-कभी वो ऐसा प्रश्न कर बैठते हैं, जिसका उत्तर आसान नहीं. उनकी नज्में पढ़ने से ज्यादा महसूस करने वाली नज्में हैं.” तो आप भी पढ़ें तजेंद्र सिंह लूथरा की चुनिंदा नज्में. ये सभी वाणी प्रकाशन से आए उनके कविता संग्रह ‘एक नया ईश्वर’ से ली गई हैं-

एक बूंद

बिखर जाये सारा अमृत
अब नहीं कोई भटकन
खो जाये सारा आकाश
अब नहीं उधेड़-बुन

तुम्हें मुबारक चार जीवन
आधे, अधूरे, अनिश्चित
मेरे लिए काफी है
एक कतरा संचित
एक बूंद निश्चित।
—

एक मादक स्त्री

वो सुंदर कम थी
कम मादक भी
पर नादान बहुत
और निश्छल भी थी।

ढेर-सा अपनापन लिए
समेट लेती थी मुझे
जैसे मां अपनी छाती में।

कभी बनकर बच्ची
बैठ जाती थी गोद में
करती थी खिलवाड़
मेरी नाक-मूंछ खींचकर।

और कभी होकर स्त्री
भर देती थी उत्तेजना से
फिर धीरे से बदल देती थी
सारा पतन प्रेम में
और चुपके से सारी वासना विश्वास में।

फिर कभी गहरे दोस्त जैसी,
गहरी नजरों से,
सहला देती थी पीठ।

कभी खला नहीं उसका
कम मादक होना।
—

लुहार का डर

इस तलवार में
ने तेज धार है न चमक
लोथड़ा-सा ही है लोहे का
मैंने कभी बनायी ही नहीं थी तलवार
मेरी तो सारी उम्र बीत गयी
हल और कुदाल बनाने में।

तलवारे अब तक
सोने की ही बनती रहीं
और उन्हें बनाने की इजाज़त भी
केवल स्वर्णकारों को ही थी
तेज चमके, तेज चले
गरीब का गला भी काटे
और सबूत भी न छोड़े
हां, तलवारें देखी तो मैंने बहुत थीं
पर मुझे मालूम न था
कि मेरी भट्ठी का कोयला भी
अवैध ही सही
लेकिन कुंती-पुत्र जन सकता है।

लोहे के इस लोथड़े में
खुद ही, एकलव्य जैसी तड़प थी
और मुझे, द्रोणाचार्य बनना मंजूर न था।

बड़ी मेहनत से बनायी
एक काली, बेशक्ल और कुंद चीज
जिसे मैंने एक म्यान में डाल दिया
और बड़े-बड़े योद्धाओं के
कमरबंद ढीले हो गये।

मैं निकला हूं इससे
पराजय का गला काटने
पर डरता हूं
कहीं ये भी
गरीब का ही गला न काटे
और सबूत भी न छोड़े।
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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