हाइलाइट्स
परमाणु बम की जरूरत को होमी जहांगीर भाभा ने आजादी से पहले ही जान लिया था.
इसकी तैयारी आजादी के बाद से ही होने लगी थी, और अंतरराष्ट्रीय अनुभवों ने इसे दिशा दी.
1971 में अमेरिका का बर्ताव था जिसने इंदिरा गांधी को परमाणु परीक्षण करने के लिए प्रेरित किया
परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के भी भारत को वैश्विक राजनीति में वह स्थान प्राप्त नहीं हुआ है जो होना चाहिए. 49 साल पहले 18 मई 1974 को भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण पोखरण, राजस्थान में किया था. भारत ने उस समय ऐलान कर दुनिया से कहा था कि यह परीक्षण उसने शांतिपूर्ण उपयोग के लिए है यानि वह इस परीक्षण के बाद हथियार नहीं बनाएगा. लेकिन इसका मकसद दुनिया को अपनी परमाणु क्षमता दिखाना भी था. लेकिन आखिर किस बात ने भारत को परमाणु परीक्षण के लिए प्रेरित किया यह एक अहम सवाल है जिसका हम पोखरण 1 की वर्षगांठ पर जवाब तलाशेंगे.
आजादी से पहले ही हो गई थी शुरुआत
वैसे तो इस कार्यक्रम की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के समय से पनपने लगी थीं जब भारत ने 144 में अपना खुद का परमाणु कार्यक्रम शुरू किया था. होमी जहांगीर भाबा ने इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना इसी साल की थी और उनके साथ भौतिकविद राज रमन्ना ने परमाणु हथियार तकनीकी शोध में बहत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और अंततः उन्हीं के पर्यवेक्षण में इस परीक्षण को अंजाम दिया गया था.
पंडित नेहरू के कार्यकाल में
आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने डॉ भाभा को परमाणु संयंत्र कार्यक्रम के लिए हरी झंडी दे दी, लेकिन वे हमेशा इस बात पर जोर देते रहे कि भारत परमाणु शक्ति का उपयोग शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही करेगा. हालाकि पंडित नेहरू ने अमेरिका और कनाडा से कुछ शर्तों पर परमाणु ऊर्जा के लिए सहयोग लिया, उनके ही शासनकाल में भारत में परमाणु शोध भी जारी रहे और भारत अपने परमाणु क्षमताओं को बढ़ाने का काम भी करता रहा.
आत्मनिर्भरता की जरूरत का अहसास
पश्चिमी देशों खास तौर पर अमेरिका से भारत (और पंडित नेहरू) को कभी वजह सहयोग नहीं मिला जिसकी वे अपेक्षा कर रहे थे. यही वजह थी. 1962 आते आते उन्होंने डॉ भाभा को परमाणु ऊर्जा संयत्र के लिए जरूरी तकनीक का विकास करने के लिए हरी झंडी दे दी जो वास्तव में परमाणु बम बनाने के लिए जरूरी तकनीक भी थी.
जिस तरह से 1971 के भारत पाक युद्ध में अमेरिका ने भारत का विरोध किया था. उससे भारत को परमाणु परीक्षण करने की ज्यादा जरूरत महसूस हुई. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
विदेश सहयोग कम विरोध ज्यादा
तभी पंडित जी भारत चीन युद्ध में उलझ गए और बताया जाता है कि डॉ भाभा कहा करते थे कि वे केवल एक ही साल में परमाणु बम तैयार कर सकते थे. चीन के हमले पर भारत ने सोवियत संघ से मदद की अपेक्षा की लेकिन सोवियत संघ का खुद चीन की ओर वैचारिक झुकाव था और वह खुद भी क्यूबा के मसले में उलझा हुआ था. इसके बाद भारत ने अपनी ताकत बढ़ाने पर जोर देना शुरू कर दिया और पहले नेहरू, फिर लाल बहादुर शास्त्र और कुछ ही दिन बाद डॉ भाभा की मौत ने हालात बदल दिए.
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75 वैज्ञानिकों की टीम
भाभा की मौत के बाद राजा रमन्ना ने परमाणु कार्यक्रम की कमान सम्भाल ली. परमाणु परीक्षण की दिशा में तेजी 1967 में आई और 1969 तक भारत ने प्लूटोनियम रिएक्टर पर काम करना शुरू कर दिया था और करीब 75 वैज्ञानिकों की टीम परमाणु परीक्षण की तैयारी में लग गई जिसमें विक्रम साराभाई, राजा रमन्ना, जैसे कई बड़े वैज्ञानिक शामिल थे.
इस परीक्षण को भारत ने उस समय आगे नहीं बढ़ाया था और उसके 24 साल बाद परीक्षण किए थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
1971 के युद्ध में विदेशी हस्तक्षेप का प्रयास
1971 में एक बार फिर ऐसा मौका आया कि भारत को दुनिया केबड़े देशों से निराशा मिली.1971 के भारत पाकिस्तान के युद्ध में अमेरिका भारत से नाराज हो गया और उसने भारत को रोकने के लिए अपना सीवीएन 65 नाम का युद्धपोत बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा, लेकिन उससे पहले ही सोवियत संघ की मदद भारत तक पहुंच गई, बांगलादेश आजाद हो गया और अमेरिका कुछ ज्यादा नहीं कर सका.
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इस युद्ध के बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के परमाणु परीक्षण कार्यक्रम में तेजी लाने को कहा और अंततः 18 मई 1974 को भारत ने पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया. इस पर अमेरिका और कनाडा ने भारत पर पाबंदियां भी लगाईं जिन्होंने शुरू में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में भारत की मदद की थी. लेकिन उस दौर में एक के बाद एक लंबे समय से भारत के लिए असहयोग ने क्रमशः भारत को अपना खुद का परमाणु परीक्षण करने के लिए प्रेरित किया.
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Tags: History, Research, USA, World
FIRST PUBLISHED : May 18, 2023, 06:57 IST








