
कृष्ण कुमार/ नागौर. भारत में सूफी संतो का काफी महत्व है. ऐसे में सन 1189 ईसवी में हज़रत सैयद सैफुद्दीन जीलानी अब्दुल वहाब जीलानीख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के साथ भारत आए थे. कुछ समय अजमेर में रहने के बाद वह नागौर आ गए थे. जहां हिंदुस्तान में क़ादिरिया संप्रदाय के जन्मदाता कहलाने वाले सैय्यद सैफ़उद्दीन अब्दुल वहाब जीलानी की नागौर में सबसे बड़ी दरगाह है. ख़ास बात यह है कि यह दरगाह करीब 800 वर्ष से पुरानी है.
सैयद सैफुद्दीन जीलानी जिन्हें ‘क़ुत्बुल हिन्द’और भारत के बड़े पीर साहब भी कहा जाता है. इनकी नागौर में भारत की कादरी संप्रदाय की सबसे बड़ी दरगाह है. यह दरगाह 800 वर्ष से भी अधिक पुरानी है. जिसे बड़े पीर साहब दरगाह के नाम से जाना जाता है. इस दरगाह में मुख्य मजारहजरत सैय्यद अब्दुल कादिर जिलानी गौसे आज़मके सबसे बड़े पुत्रक़ुत्बुल ए हिन्द हजरत सैय्यद सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जिलानी की है. अब्दुल वहाब जिलानी के पिता को गोस – ए- आजम भी कहा जाता है. जिनकी मजार ईराक के शहर बगदाद में है.
कादरी संप्रदाय के मुख्य प्रवर्तक हजरत गोस-ए-आजम है. जिन्हें बड़े पीर साहब कहा जाता है. क्योंकि यह तमाम सूफी संतो के बड़े गुरु है और भारत में कादरी संप्रदाय के जन्मदाता सैय्यद सैफद्दीन अब्दुल वहाब जिलानी है. इनकी पैदाइश बगदाद में 2 जुलाई 1128 ईस्वीं अनुसार दो शाबान पांच सौ बाईस हिजरी को बग़दाद में हुई थी. इनका स्वर्गवास 25 शवाल 603 हिजरी को नागौर मेहुआ था और इन्हें नागौर मेंही दफनाया गया. जहां आज बड़े पीर साहब की दरगाह बनी हुई है.
सैय्यद सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जिलानी 585 हिजरी के मुताबिक 1189 ईस्वीं को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के साथ बगदाद से भारत आए.नागौर स्थित इस बड़े पीर साहब की दरगाह मैं सैय्यद सैफुद्दीन अब्दुल वहाब जिलानी के मजार के अलावा इनके बाकी वंशजो मज़ार भी यहीं है.यह दरगाह बड़े पीर साहब कादरिया संंप्रदाय की भारत में सबसे बड़ी दरगाह है विश्व में इसका दूसरा स्थान है. पहला स्थान इनके पिता गौस -ए-आजम की दरगाह है. जो बगदाद में स्थित है.बड़े पीर साहब की दरगाह में इस वक्त मौजूदा सज्जदा नशीन (गादीपति) सैय्यद सदाकत अली जिलानी है.जो इस्लान धर्म के आखरी पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब की 38 वीं पीढ़ी मैं आते हैं और हज़रत गौसे आज़म की 25 वीं पीढ़ी से हैं.
बता दें कि तत्कालीन भारत सरकार ने नागौर मैं स्थित इस बड़े पीर साहब की दरगाह पर 2 लाख रुपये की अनुदान राशि देकरशोध भी करवाया है. ये शोध हमदर्द यूनिवर्सिटी नई दिल्ली के डीन डॉक्टर प्रोफेसर गुलाम याहया अंजुम ने किया हैं. 1999 मैं इस शोध की पुस्तक उर्दू भाषा मे ओर 2016 मैं हिंदी मैं प्रकाशित हो चुकी हैं.








