
हाइलाइट्स
गहलोत-पायलट की जोड़ी को कर्नाटक के डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया जैसे एक मंच पर लाना होगा
बीजेपी ‘वोकल फॉर लोकल’ पर देगी जोर, वसुंधरा समेत अन्य नेताओं को मिल सकती है अहम जिम्मेदारी
एच. मलिक
जयपुर. कर्नाटक चुनाव परिणाम की कहानी का राजस्थान तक असर होने वाले हैं. जनता के जनादेश में बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों के लिए संदेश छिपे हैं. यही वजह है कि इस रिजल्ट की रोशनी में दोनों ही दल अपनी नई स्ट्रैटजी बनाने पर जोर दे रहे हैं. नई रणनीति में राज्य स्तर के उन बड़े नेताओं को मौका मिल सकता है, जो अभी हाशिए पर हैं.
कर्नाटक के ‘चुनावी नाटक’ से पर्दा उठने के बाद यह तो तय हो गया है कि विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय महत्व से जुड़े बड़े मुद्दों के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों पर भी फोकस होगा.
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सीएम के लिए शीतयुद्ध पर एकजुटता से मिली जीत
राजस्थान की तरह कर्नाटक कांग्रेस में भी डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चुनाव से पहले ही शीतयुद्ध की स्थिति थी. पार्टी ने मार्च 2020 में डीके शिवकुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर आगे किया, लेकिन सिद्धारमैया को भी पूरी तवज्जो दी. सीएम की चाहत के बावजूद दोनों नेताओं ने एकजुटता के साथ चुनाव प्रचार किया. कार्यकर्ताओं तक भी एकता का मैसेज गया. यह भी बड़ी वजह रही कि कांग्रेस ने कर्नाटक का किला जीत लिया.
गहलोत-पायलट को एक मंच पर लाना बड़ा टास्क
इधर राजस्थान में सीएम कुर्सी को लेकर गहलोत-पायलट की लड़ाई अब सड़कों पर आ चुकी है. अपनी सरकार के खिलाफ अनशन और पदयात्रा के बाद अब पायलट के अगले कदम का इंतजार हो रहा है. ऐसे राजस्थान में चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा टास्क इनके विवाद को खत्म करके कर्नाटक की तरह एकजुट बनाने का है. यदि कांग्रेस कर्नाटक की जीत को प्रदेश में दोहराना चाहती है तो इन दोनों दिग्गजों को एक सम्मानजनक समझौते तक पहुंचाने के सिवा उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. इसके अलावा पार्टी क्षेत्रीय क्षत्रपों को भी चुनाव का चेहरा बना सकती है.
भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का जीरो टॉलरेंस
कर्नाटक का ट्रैंड बताता है कि भ्रष्टाचार पर अब जनता भी जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही है. बीजेपी सरकार में हुए भ्रष्टाचार को कांग्रेस ने मुद्दा बनाया. पूरे चुनाव कैंपेन को ‘40 प्रतिशत कमीशन वाली सरकार’ में बदल दिया. एंटी इंकबैंसी को इससे और ज्यादा हवा मिली. राजस्थान में भी सत्ता के खिलाफ लहर है. हाल ही कराए गए सर्वे में कांग्रेस के 50 प्रतिशत से ज्यादा विधायकों की ग्राउंड पर स्थिति ठीक नहीं मिली. प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने वन-टू-वन में विधायकों को साफ कह दिया था कि अगर टिकट दिया जाता है तो आप जीतेंगे नहीं.ऐसी ही एंटी इंकमैंसी को राजस्थान में रोकने के लिए कांग्रेस का जोर लोक-लुभावन घोषणाओं को तेजी से पूरा करने पर है. इसके साथ ही अगले पांच साल के लिए कांग्रेस कर्नाटक की तरह पांच गारंटियों का वादा कर सकती है.
अब राष्ट्रीय मुद्दों के साथ लोकल पर करेगी फोकस
कर्नाटक ने विधानसभा चुनाव में लोकल मुद्दे और बड़े स्थानीय नेताओं की महत्ता को फिर से साबित किया है. इस चुनाव में बीजेपी का फोकस जहां राष्ट्रीय मुद्दों पर रहा और चुनाव भी पीएम मोदी और अमित शाह जैसे दिग्गज नेताओं पर ही केंद्रित रहा. वहीं कांग्रेस का जोर स्थानीय मुद्दों और राज्यस्तरीय नेताओं पर ज्यादा रहा. इसका चुनाव में उसे काफा फायदा मिला. अभी तक बीजेपी राजस्थान में भी कर्नाटक की नीति पर ही चल रही है. चुनाव सीएम फेस के बजाय पीएम फेस पर लड़ने की रणनीति है. इसी के चलते पीएम की पांच बड़ी सभाएं पिछले 6-7 माह में हो चुकी हैं. भविष्य में भी पीएम चुनाव का बड़ा चेहरा रहेंगे, लेकिन उनके साथ राज्य के नेता लोकल इश्युज को पुरजोर अंदाज में उठाएंगे.
वसुंधरा समेत अन्य नेताओं को जिम्मेदारी!
कर्नाटक में करारी हार से बीजेपी को भी सबक मिला है. इसके चलते स्थानीय मुद्दों के साथ राज्य स्तर के बड़े नेताओं को आगे लाकर उन्हें स्टार प्रचारकों में शामिल किया जाएगा. अभी तक हाशिए पर चल रही पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भी नई रणनीति के तहत अहम जिम्मेदारी मिल सकती है. इसके साथ ही जाट वोटर्स के लिए पूर्व अध्यक्ष सतीश पूनियां और ब्राह्मण वोटर्स के लिए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और पूर्व मंत्री घनश्याम तिवारी समेत कुछ सांसदों को लगाया जा सकता है. राजस्थान में एंटी इंनकंबेसी फेक्टर को भुनाने के लिए गहलोत सरकार, उनके मंत्रियों और विधायकों के करप्शन के मुद्दों को मुखरता से उठा सकती है.
पन्ना प्रमुखों के जरिए घर-घर में दस्तक देंगे
आगामी विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने प्रदेश के बड़े नेताओं को भी पन्ना प्रमुख की सह-जिम्मेदारी देने की तैयारी कर ली है. जनप्रतिनिधियों को अपने चुनाव क्षेत्र में पन्ना प्रमुख का कार्य भी करना होगा. पन्ना प्रमुख बीजेपी संगठन की मजबूत कड़ी हैं, इसके लिए प्रदेश महामंत्री (संगठन) चंद्रशेखर स्वयं इसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं. करीब सात माह बाद होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश में 8-10 स्थानों पर पन्ना प्रमुख सम्मेलन भी आयोजित किए जाएंगे. इनमें राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा सहित पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी व नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़ समेत सभी बड़े नेता शामिल होंगे.
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FIRST PUBLISHED : May 16, 2023, 06:28 IST









