
सफल रचना वही है जो पाठक को एक ठहरकर सोचने पर मजबूर कर दे. विपिन चौधरी ऐसी ही लेखिका हैं जिनका लिखा हुआ पाठक रुककर, ठहरकर पढ़ता है और सोचता है. वे लिखती हैं- “मैं अपने एकांत को रेगिस्तान में रोप दूर तक पसरे रेत में इंतजार करूंगी, मेरा प्रेम कविता की शक्ल में होगा.” विपिन चौधरी का प्रेम तो कविता की शक्ल में है ही, उनकी हर कविता भी एक रूप लिए हुए है. वह रूप है एक मजदूर का, पहचान की तलाश करती स्त्री का, बारिश की बूंदों का, खेत में उगी खरपतवार का. पाठक को उनकी हर रचना में एक नया रूप नजर आता है.
विपिन चौधरी लेखक हैं, कवयित्री हैं और अनुवादक हैं. उन्होंने प्रसिद्ध बाल लेखक रस्किन बॉन्ड की पुस्तकों का अनुवाद किया है. वे नियमित रूप से रेडियो नाटक लेखन, रंगमंच और फिल्मी लेखन में भी सक्रिय हैं. ‘अंधेरे के मध्य’, ‘एक बार फिर’ और ‘नीली आंखों में नक्षत्र’ विपिन चौधरी के चर्चित काव्य संग्रह हैं. उन्होंने माया एंजेलो की जीवनी ‘रोज उदित होती हूं’ भी लिखी है. कई पत्रिकाओं का उन्होंने संपादन किया है.
‘संसार तुम्हारी परछाईं’ विपिन चौधरी का चौथा काव्य संग्रह है. विपिन का यह संग्रह सात खण्डों में विभक्त है. हर खण्ड अपने-आप में एक नया विषय, नई चर्चा और नई आभा समेटे हुए है. ‘प्रतिच्छाया’, ‘प्रविष्टि’, ‘संसार तुम्हारी परछाईं’, ‘सवाल मेरी उदासी का’, ‘मौनावलम्बी’, ‘नारा महज नारा है’ और ‘इयत्ता’ नाम से बने इन खण्डों में पाठक एक नई विधा और नई अनुभूति आत्मसात करते हैं. संग्रह की अधिकांश कविताओं के केंद्र में स्त्री है.
पहला खण्ड ‘प्रतिच्छाया’ कुदरत को समर्पित है. इसमें नदी है, पानी है, बारिश है तो जंगल का जादू है. प्रकृति के इर्द-गिर्द घूमती कुल आठ कविताएं हैं. बारिश का हर किसी के जीवन में अलग-अलग महत्व होता है. बारिश को देखकर जहां किसान के चेहरे खिल उठते हैं वहीं महानगरों की जनता के माथे पर लकीरें उमड़ पड़ती हैं. अलग-अलग लोगों के जीवन में बारिश के इस महत्व को विपिन चौधरी ने ‘बारिश’ कविता में बड़ी ही खूबसूरती से दर्शाया है-
इस नये अवतार में धरती का चेहरा जुदा है
जिसके हर स्पन्दन पर देह
नृत्य करती है
इस नई धरा के
कामगारों ने पसीने से भीगी
अपनी बनियानें उतार ली हैं
सारे वियोगी
चाय के प्यालों के साथ
बालकनियों में चुपचाप बैठे
दिख रहे हैं
नहर, पोखर, तालाब ऐसे खिल उठे हैं
जैसे कोई गुम खजाना
वापिस पाकर हर्षित होता
चरवाहे
मवेशियों को लेकर
खुले मैदान में आ चुके हैं
धोबी
घाट पर मैले गट्ठर लेकर बैठ गए हैं
बच्चे छज्जों से
पुराने टायर उतार
गलियों में धींगा मस्ती कर रहे हैं..
बारिश के असर को (सूखा या अतिवृष्टि) समय-समय पर रचनाकार अपनी लेखनी का विषय बनाते रहे हैं. लेकिन बारिश की भी अपनी अलग दुनिया होती है, शायद ही किसी की इस पर नजर पड़ी हो. विपिन चौधरी बारिश की दुनिया को ना केवल देखते-पहचानते हैं, उसे शब्द और आकार भी देते हैं-
हर बारिश में
पुराने को समेटता हुआ
कुछ नया घटता है
काव्य संग्रह के दूसरे खण्ड ‘प्रविष्टि’ में जीवन दर्शन का बोध होता है. यहां जन्म-मृत्यु, सुख-दुख जैसे जीवन से जुड़े तमाम अनुभवों की कविताएं हैं. जीवन की आपा-धापी में हम अपने असल मकसद को भूल जाते हैं और फिर से पाप की गठरी तैयार करने लगते हैं-
पिछले जन्म की
किसी कामना का घड़ा भरने के लिए
इस जीवन में
दाखिल हुई थी
कमाये दुःख के इतने किस्से
कि लगभग भूल ही गई
कि किस कामना के पीछे
इस जन्म तक का सफर तय किया था मैंने
कोई भी परेशानी आने पर हम तुरंत कह उठते हैं- पुराने कर्मों का फल भोग रहे हैं. अध्यात्म में शरीर को किराये का घर कहा गया है और कर्मों को जीवन की परीक्षा, जिसके आधार पर हमारा रिजल्ट यानी सुख-दुख का निर्धारण होता है. विपिन चौधरी इसी बात को अपनी कविता के माध्यम से बड़े ही सुंदर ढंग से कहते हैं-
कुछ दुख
इस नये घर ने नहीं कमाये थे
किराये के पुराने घर से
घरेलू सामानों के साथ
कंधों पर ढोकर इन्हें
लायी थी मैं।
मृत्यु के समय यानी इस शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करने के दौरान हम अपने दुखों को साथ लेकर चलते हैं अगली यात्रा के लिए-
मैं भी किराये का घर बदलते समय
अपने दुख साथ ले आती हूं
उन्हें वहीं नहीं छोड़ आती।
किसी भी क्रिया को होते रहने के लिए स्वतंत्र छोड़ देना शायद हम भूल गए हैं. हर होती हुई क्रिया में अपनी रचनात्मकता डालकर उसका स्वरूप बदल देते हैं. हालांकि, काफी हद तक यह हमारी जरूरतों को पूरा करते रहने के लिए जरूरी भी है. लेकिन सोचा है कुदरत की रचनात्मकता को कभी खुद-ब-खुद होते रहने के लिए भी छोड़ दिया जाए. मनोरथ कविता इसी क्रम का विपिन चौधरी का अनूठा प्रयोग है. निश्चित ही यह हमें सोचने पर मजबूर करता है-
इस बार किसान
अपनी जमीन के एक टुकड़े पर
न बाजरा रोपेगा
न ज्वार, चावल और मूंग
न रबी की फसलों की रोपाई की सोच की जद में है
अबकी दफा
किसान
इस बरस
इस भूखण्ड पर
केचुए जमीन को परत दर परत खोद डालेंगे
जमीन अपने सीने पर उन खरपतवारों को उगते हुए
संतोष से देखेगी
हर बरस जिन्हें किसान और उसका मेहनती परिवार
जड़ समेत उखाड़ता आया है
विपिन चौधरी के इस कविता संग्रह में शायद ही कोई विषय ऐसा रहा हो जिसको उन्होंने न छूआ हो. मेहनतकश कामगारों पर तमाम कहानी-कविता लिखी गई हैं, लेकिन जिस मर्म तक विपिन गए हैं, वह अभी तक अनछुआ रहा है. एक मजदूर जो सिर्फ और सिर्फ काम तथा शोषण के लिए बना है, उसका न तो परिवार है, ना सोचने-समझने के लिए दिमाग. एक मजदूर की तस्वीर जो विपिन ने अपने शब्दों में उकेरी है, वह पाठक को ठहरकर सोचने को मजबूर करती है. इसकी बानगी ‘हमारी कामगार तस्वीरें’ में देखी जा सकती है-
दो मजबूत हाथ
दो बलिष्ठ पांव
बस इतना ही
और हमारी तस्वीरें हुईं मुकम्मल
बीच में सिर होता है न बच्चे
और सिर के भीतर दिमाग
बस, वही नहीं चाहिए यहां
यही दिमाग तो बेलगाम हरकतें करता है
सारी गड़बड़ इसकी हरकतों से पैदा होती है
ऐसे ही तो चित्रित होती आयीं हैं
देश-दुनिया के मजदूरों की तस्वीरें
धड़ विहीन सिर के
और सुनो,
इनमें रंग मत भरना
हम मजदूरों की पहुंच भी ऐसी ही तो है
नीचे से नीचे
गहराई में
ऊपर से ऊपर अनन्त ऊंचाई में।
‘नारा महज नारा है’ खण्ड की कविताएं कामगारों पर समर्पित हैं. कामगारों के दुख से बाहर निकलते हैं तो ‘इयत्ता’ में स्त्रियों के दुख भरे अथाह सागर में डूब जाते हैं. हम भले ही खुद को आधुनिक समाज का सभ्य नागरिक कहें लेकिन सच तो यही है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री आज भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष करती नजर आती है-
यहां तो लिपस्टिक और नेलपॉलिश के भी शेड्स और नंबर हैं
रागों के नाम हैं
रंगों की अलग पहचान है
सड़कों के, चौराहों के,
देश और देशों को अलग करने वाली विभाजन रेखाओं के भी नाम हैं
सिर्फ हम ही हैं
जो वाकई पहचान के संकट से गुजर रही हैं
और संकट भी ऐसा कि
इस संकट के हल की चाबियां
हमारे ही बगलगीरों ने कहीं गुमा दी हैं
इस खण्ड में एक बच्ची से लेकर बहू और वृद्धा तक के सफर को समेटा गया है. इस सफर में एक महिला की वेदना को उकेरा गया है. निश्चित ही इस कविता संग्रह की प्रत्येक कविता पढ़ने और मनन करने लायक है.
समकालीन कवियों पर कविताएं लिखना साहित्य की परंपरा रहा है. इस परंपरा का निर्वाह करते हुए विपिन चौधरी ने इस संग्रह में प्रसिद्ध कवयित्री सविता सिंह पर 15 कविताएं लिखी हैं. विपिन के नए कविता संग्रह के बारे में सविता सिंह लिखती हैं- विपिन चौधरी की कविताएं लगातार बाहर-भीतर यात्रा करती हुई एक ऐसी आंतरिकडता की खोज निकालती हैं जो स्त्री का अपना निजी उचाट भी है
पुस्तकः संसार तुम्हारी परछाईं (कविता संग्रह)
लेखकः विपिन चौधरी
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन
मूल्यः 225 रुपये
ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें News18 हिंदी| आज की ताजा खबर, लाइव न्यूज अपडेट, पढ़ें सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट News18 हिंदी|
Tags: Books, Hindi Literature, Hindi poetry, Literature
FIRST PUBLISHED : May 12, 2023, 20:43 IST








