
सौरव पाल/मथुरा. धर्मनगरी वृंदावन एक ऐसी जगह है, जहां सभी भक्ति भाव से भगवान के दर्शन करने आते है. भगवान के मंदिर में किसी के साथ कोई भेद भाव भी नही होता. यहां आकार बड़े से बड़ा करोड़पति इंसान भी कृष्ण भक्ति में सभी मोह-माया से दूर हो जाता है. ऐसे एक शख्स थे बंगाल के ज़मीदार कृष्ण चंद्र, जिन्होंने कृष्ण भक्ति में अपना घर बार छोड़ दिया और वृंदावन आकर लालाबाबू के नाम से प्रसिद्ध मंदिर के स्थापना की.
वैसे तो इस मंदिर का नाम श्री कृष्ण चंद्रमा जी है लेकिन यह लालाबाबू के नाम से प्रसिद्ध है. इस मंदिर का निर्माण ब्रिटिश काल में सन् 1810 में बंगाल के मुर्शिदाबाद के संपन्न और सबसे बड़े जमींदार घराने से ताल्लुक रखने वाले कृष्ण चंद्र ने की थी. कृष्ण चंद्र बंगाल के जमींदार घराने से ताल्लुक रखते थे. धन से संपन्न होने के बावजूद भी उनका मन वैराग्य और कृष्ण भक्ति की तरफ बेहद आकर्षित था. बचपन से ही वह कृष्ण भक्ति में रुचि रखते थे. फिर करीब 30 वर्ष की उम्र में अपनी करोड़ों की जायदाद को पीछे छोड़ वो वृंदावन में आ गये और यहां के पेड़ों के नीचे बैठ कर भजन करने लगे.उस समय इस मंदिर को बनाने का खर्च करीब 25 लाख रूपए आया था.
बंगाली समाज का गौरव है मंदिर
मंदिर के महंत बाबा गोपाल दास महाराज ने बताया कि यह मंदिर बंगाली समाज के लोगों का गौरव भी माना जाता है. लेकिन आज इस मंदिर के बारे में काफी कम लोगों को पता है. माना जाता है की जब लाला बाबू ने इस मंदिर के विग्रह की स्थापना की थी तो उन्होंने प्रण लिया था की जब तक भगवान की सांसे नही चलती तब तक में इन्हे भोग नहीं लगाऊंगा और फिर उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर यहां स्थापित विग्रह की सांसे चलने लगी.
मंदिर के बाहर है कृष्ण चंद्र जी की समाधि
यह मंदिर रंग नाथ मंदिर के पीछे और गोदा विहार मंदिर के बिल्कुल नजदीक है. यह मंदिर करीब 60 फुट ऊंचा है और मंदिर के पुराने होने का एहसास इसकी दीवारें और खंबे बयां करते है. मंदिर के बाहर ही मंदिर के संस्थापक कृष्ण चंद्र जी की समाधि भी है.
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FIRST PUBLISHED : June 04, 2023, 19:05 IST








