
मनमोहन सेजू, बाड़मेर. मां की ममता की गहराई किसी से छिपी नहीं है. उसे बयां करने के लिए न तो हमारे पास वो शब्द हैं और न ही उतनी भावना. कुछ ऐसी ही हैं बिश्नोई समाज की महिलाएं. मां अपने बच्चों को जिस ममता से पालती है, उसी के साथ जानवरों को भी. सरहदी बाड़मेर सहित अन्य जिलों में बिश्नोई समाज की महिलाएं अपना दूध अपने बच्चों की ही तरह हिरण के बच्चों को पिलाती नजर आती है.
कहते है कि मां का दूध बच्चे के लिए अमृत होता है और मां अपने बच्चे के अलावा यह हक किसी को नहीं देती. लेकिन राजस्थान के बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर और जालौर इलाके में एक समुदाय इस बात से आगे वन्यजीवों के प्रति प्रेम की मिसाल बना नजर आता है. इन इलाकों में रहने वाले बिश्नोई समाज की महिलाएं अपना दूध अपने बच्चों की ही तरह हिरण के बच्चों को पिलाती नजर आती है. बिश्नोई समाज के लिए जहां वन्यजीव प्रेम किसी शपथ से कम नहीं होता.
वहीं इन इलाके में आने से पहले शिकारी भी थर-थर कांपते है. यहीं वजह है कि बिश्नोई बाहुल्य इलाकों में वन्यजीव इनके घरों में अठखेलियां करते नजर आते है. कई घरों में तो हिरण, चिंकारा, काला हिरण और अन्य वन्यजीव घर के सदस्यों की तरह आराम से घर में घूमते फिरते मिल जाएंगे.
आपको बता दे कि बिश्नोई समाज वन्यजीव प्रेम को प्रमुख मानता है और वन्यजीवों के संरक्षण और उनके प्रेम का ध्यान रखता है. इस समाज के लोग वन्यजीवों के प्रति गहरी समर्पण का प्रतीक माने जाते है. बिश्नोई समाज की स्थापना भगवान जम्बेश्वर ने की थी, जो 15वीं शताब्दी के बिश्नोई संत थे. इस समाज का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों की संरक्षण करना है.
बिश्नोई समाज के सदस्य वन्यजीवों के प्रति अपार प्रेम और संरक्षण की जिम्मेदारी संभालते हैं. बिश्नोई समुदाय के सदस्यों के लिए वन्यजीवों को हत्या करना और उनको चोट पहुंचाना अपराध की श्रेणी में आता है. यह समाज अपने सदस्यों को वन्यजीवों के प्रेम की शिक्षा देता है और उनके संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाता है.
इसके अलावा, बिश्नोई समाज वन्यजीवों के जीवनाचरण को प्रमोट करने के लिए कई सामाजिक और गैर सरकारी संगठन भी चलाता है. राजस्थान के बाड़मेर, जोधपुर,जैसलमेर और जालौर इलाके में बहुतायत में पाए जाने वाले इस समुदाय सरीखा वन्यजीव प्रेम पूरे विश्व मे कहीं और नजर नहीं आता है.
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FIRST PUBLISHED : May 30, 2023, 09:16 IST








