
हाइलाइट्स
केरल के कोल्लम में पोरुवझी पेरुवथी मलनाड दुर्योधन मंदिर है.
दुर्योधन को पूजा में तोड्डी चढ़ाई जाती है, जो नारियल के मीठे पानी से बना होता है.
कहा जाता है कि दूर्योधन ने जहां बैठकर शिव साधना की थी, वहीं पर मंदिर बनाया गया है.
महाभारत में दुर्योधन एक विलेन के रूप में जाना जाता है. वह अपने पांडव भाइयों से छल करने वाला, भाभी द्रौपदी को अपमानित करने वाला, संस्कारहीन, कुटिल जैसे अनेक दुर्गुणों वाला व्यक्ति था. कोई भी व्यक्ति दुर्योधन को अपना आदर्श नहीं मानता है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि केरल और उत्तराखंड में दुर्योधन का मंदिर है, जहां पर उसकी पूजा होती है. वहां पर दुर्योधन के कुछ अच्छे गुणों से लोग प्रभवित हुए और मंदिर बनाकर पूजा करने लगे. आइए जानते हैं केरल और उत्तराखंड में स्थित दुर्योधन के मंदिरों के बारे में.
केरल: पोरुवझी पेरुवथी मलनाड दुर्योधन मंदिर
केरल के कोल्लम में पोरुवझी पेरुवथी मलनाड दुर्योधन मंदिर है. इस मंदिर में एक बड़ा सा चबूतरा है, जिसकी पूजा की जाती है. सबसे रोचक बात यह है कि इस मंदिर में दुर्योधन की कोई मूर्ति नहीं है. दुर्योधन को अप्पोपम के नाम से पुकारते हैं. लोगों का मानना है कि अप्पोपम उनकी संकटों से रक्षा करते हैं.
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तोड्डी, शराब, पान, चिकन का लगता है भोग
दुर्योधन को पूजा में तोड्डी चढ़ाई जाती है, जो नारियल के मीठे पानी से बना होता है. यहां पर आने वाले भक्त दुर्योधन को तोड्डी के अलावा शराब, पान, कपड़ा, चिकन, बकरी आदि चढ़ाते हैं.
कैसे बना दुर्योधन मंदिर
बताया जाता है कि पांडवों के अज्ञातवास के समय दुर्योधन उनको खोजते हुए वहां पहुंच गया था. उसे काफी प्यास लगी थी. तब उसने पानी मांगा तो उसे एक महिला ने पानी के बदले तोड्डी पिलाई, जिससे वह काफी खुश हो गया. फिर उसने गांव के खुशहाली के लिए एक पहाड़ पर बैठकर शिव जी की पूजा की. इसके साथ ही गांव वालों को खेती के लिए जमीन भी दी.
कहा जाता है कि दूर्योधन ने जहां पर बैठकर शिव साधना की थी, उसी स्थान पर उसका यह मंदिर बनाया गया. इस मंदिर के पुजारी कुरवा समुदाय के होते हैं. इस समुदाय की महिला ने ही दुर्योधन को तोड्डी पिलाई थी. यह मंदिर 24 घंटे खुला रहता है. मंदिर समिति में सभी समुदाय के सदस्य होते हैं.
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उत्तराखंड: जखोल गांव में दुर्योधन का मंदिर
केरल के अलावा उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के जखोर में दुर्योधन का मंदिर है, जिसे सौर गांव के लोगों ने बनवाया है. वे कौरवों को अपने पूर्वज के रूप में पूजा करते हैं. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, दुर्योधन एक बार उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में हनोल की यात्रा पर आया था. वह प्राकृतिक सुंदरता से प्रभवित हुआ और यहां के देवता महासू से हिमालय के बगल में एक घाटी प्रदान करने की प्रार्थना की.
महासू ने वह घाटी देते हुए कहा कि तुमको हमेशा इस इलाके लोगों की देखभाल करनी होगी. कहा जाता है कि दुर्योधन की मौत पर यहां के लोग इतना रोए कि तमस नामक नदी बन गई, जो आज टोंस कही जाती है.
दुर्योधन के इस गुण के कारण होती है पूजा
लोक मान्यताओं के अनुसार, दुर्योधन की पूजा इसलिए होती है कि वह बड़ा ही शक्तिशाली था, वह युद्ध में अजेय माना जाता था. वह अपनी शक्ति से बारिश कर देता था या उसे रोक देता था. बारिश से फसलों को जीवन मिलता था.
यह भी कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में स्थानीय लोगों के पूर्वजों ने दुर्योधन का साथ दिया था. मृत्यु के बाद दुर्योधन की पूजा करके लोग अपने पूर्वजों का सम्मान करते हैं.
बर्बरीक से मिलती है एक कथा
यहां के दुर्योधन मंदिर को लेकर भुब्रूवाहन की एक कथा है, जो भीम के पौत्र बर्बरीक से मिलती जुलती है. भुब्रूवाहन कौरवों की तरफ से युद्ध करना चाहता था, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसका सिर काटकर एक पेड़ पर रख दिया. वहां से उसने महाभारत का युद्ध देखा. जब कौरव सेना हारती तो भुब्रूवाहन रोता था, उससे ही तमस या टोंस नदी बन गई. इसका पानी कोई नहीं पीता है. भुब्रूवाहन दुर्योधन का प्रशंसक था, इस वजह से स्थानीय लोगों ने दुर्योधन का एक मंदिर बनाया.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news 18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)
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Tags: Dharma Aastha, Mahabharat
FIRST PUBLISHED : May 24, 2023, 12:40 IST








