Aastha: बद्रीनाथ धाम से कुछ दूरी पर एक ऐसा मंदिर जहां भगवान विष्णु ने रची थी लीला, जानिए इससे जुड़ी एक रोचक कहानी

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सोनिया मिश्रा/चमोली. उत्तराखंड के चमोली जिले में बद्रीनाथ धाम के अलावा बेहद अलग अलग स्थान हैं, जिनसे जुड़े बेहद खास और रोचक किस्से, कहानियां, किवदंतियां हैं. जिनको जानने से धाम के बारे में और अधिक जानकारियां मिल जाती हैं. उन्हीं में से एक है बामणी गांव में स्थित लीलाढुंगी मंदिर. गढ़वाली बोली में ढुंगा पत्थर को कहते हैं यानी वह पत्थर जहां भगवान ने लीला की, वहीं कहलाया लीलाढुंगी. चमोली जिले में बद्रीनाथ धाम से महज 300 मीटर की दूरी पर एक मंदिर स्थित है, जिसे लीलाढुंगी कहते हैं.

पौराणिक कथा के अनुसार, संपूर्ण केदारखण्ड पर भगवान शिव का आधिपत्य था. एक बार जब भगवान नारायण (विष्णु) बद्री धाम में आएं, तो उन्हें बद्रीनाथ धाम बहुत भाया और उनका मन हुआ कि वह यहीं रह जाएं, लेकिन बद्री क्षेत्र में तो कोई स्थान ही खाली नहीं था, इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई. वह बामणी गांव में एक शिला में जाकर (लीलाढुंगी) बाल रूप धारण कर भगवान शिव और माता पार्वती के द्वार के सामने रोने लगे. उस समय माता पार्वती और भगवान शिव बद्रीनाथ मंदिर में स्थित तप्त कुंड में स्नान के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे. पार्वती ने उस रोते हुए नन्हें से बालक को देख उसे अपनी ममता की छांव दी. हालांकि भगवान शिव ने उन्हें मना भी किया लेकिन माता नहीं मानी और बालक को अंदर ले जाकर वहां पर सुलाकर शिवजी के साथ स्नान के लिए चली गईं. उनके जाने के बाद नारायण ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और जब स्नान कर माता और भगवान शिव लौटे, तो अंदर से दरवाजा नहीं खुला तो वे अन्यत्र (केदारनाथ धाम) चले गए लेकिन अपने अंश रूप में वे यहां पर बने रहे. इस क्षेत्र के बारे में केदारखण्ड में भी वर्णित है, हालांकि यह एक मात्र दंतकथा हैं, जो सदियों से चली आ रही है.

क्या है लीलाढुंगी
पूर्व धर्माधिकारी भुवन उनियाल बताते हैं कि भगवान नारायण ने ऋषिगंगा के पास बामणी गांव में एक सुंदर सा पत्थर है जिसे लीलाढुंगी कहते हैं, वहां पर उन्होंने बच्चे का रूप धारण कर उस स्थान पर लीला की थी. जिसके बाद से उस स्थान का नाम लीलाढुंगी कहा जाने लगा. आज भी जब श्रद्धालु बद्रीनाथ धाम में आते हैं, तो बामणी गांव में स्थित लीलाढुंगी के दर्शन करने भी जरूर जाते हैं.

कैसे पहुंचे?

बाय रोड: बद्रीनाथ धाम तक सड़क सुविधा उपलब्ध है और धाम से महज कुछ दूरी पैदल चलकर लीलाढुंगी तक पहुंचा जा सकता है.

बाय एयर: निकटतम गौचर हेलीपैड है. इसके आगे का रास्ता आपको सड़क मार्ग से ही तय करना पड़ेगा.

बाय ट्रेन: निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश/देहरादून हैं. यहां से आप सड़क मार्ग से होते हुए लीलाढुंगी तक पहुंच सकते हैं.

(NOTE: इस खबर में दी गई सभी जानकारियां और तथ्य मान्यताओं के आधार पर हैं. LOCAL 18 किसी भी तथ्य की पुष्टि नहीं करता है.)

Tags: Dharma Aastha, Religion 18

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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