Bhicaji Balsara: अमेरिका में 20वीं सदी के दौरान नस्लभेद का दौर था. उस माहौल में भीकाजी बलसारा पहले ऐसे भारतीय बने, जिन्होंने अमेरिका की नागरिकता हासिल की. हालांकि, बंबई के कॉटन व्यापारी बलसारा को इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. उन्होंने बिना डरे और बिना झुके ये लड़ाई लड़ी और सफलता हासिल की. अमेरिका में 1900 की शुरुआत में सिर्फ आजाद श्वेत लोगों को ही यूएस की नागरिकता दी जाती थी. लोगों को अमेरिका की नागरिकता 1790 के नैचुरलाइजेशन एक्ट के तहत मिलती थी. अमेरिका की नागरिकता लेने के लिए लोगों को साबित करना पड़ता था कि वो आजाद और श्वेत हैं.
भीकाजी बलसारा ने इस कानून के तहत पहली लड़ाई साल 1906 में न्यूयॉर्क के सर्किट कोर्ट में लड़ी. बलसारा ने दलील दी कि आर्यन श्वेत थे, जिनमें कोकेशियन और इंडो-यूरोपीयन भी शामिल हैं. बाद में बलसारा की इस दलील का उन भारतीयों ने भी कोर्ट में इस्तेमाल किया, जो अमेरिका की नैचुरलाइज्ड सिटिजनशिप चाहते थे. बलसारा की दलील पर कोर्ट ने कहा कि अगर इस आधार पर उनको अमेरिका की नागरिकता दी जाती है तो इससे अरब, हिंदू और अफगानों के लिए भी नैचुरलाइजेशन का रास्ता खुल जाएगा. कोर्ट ने उनके आवेदन को खारिज कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि बलसारा अमेरिका की नागरिकता के लिए उच्च अदालत में अपील कर सकते हैं.
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कैसे मिली बलसारा को अमेरिका की नागरिकता
बलसारा को एक पारसी के तौर पर फारसी संप्रदाय का शुद्ध सदस्य माना जाता था. इसलिए उन्हें स्वतंत्र श्वेत व्यक्ति भी माना जाता था. बलसारा को 1910 में न्यूयॉर्क के दक्षिणी जिले के जज एमिल हेनरी लैकोम्बे ने इस उम्मीद के साथ अमेरिका की नागरिकता दे दी कि यूएसए के वकील उनके फैसले को चुनौती देंगे. साथ ही कानून की आधिकारिक व्याख्या के लिए अपील करेंगे. अमेरिकी अटॉर्नी ने लैकोम्बे की इच्छाओं का पालन किया और 1910 में इस मामले को सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स में ले गए. सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स ने सहमति जताई कि पारसियों को श्वेत के रूप में वर्गीकृत किया गया है. इसी फैसले के आधार पर बाद में एक अन्य संघीय अदालत ने एके मजूमदार को अमेरिका की नागरिकता दी थी.

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने 1923 में कहा कि भारतीय अमेरिकी नागरिकता के लिए अयोग्य थे, क्योंकि वे स्वतंत्र श्वेत व्यक्ति नहीं थे.
…तो अवैध तरीके से घुसने लगे पंजाबी अप्रवासी
बलसारा के पक्ष में आया ये फैसला अमेरिकी अटॉर्नी जनरल चार्ल्स जे. बोनापार्ट की 1907 की घोषणा के विपरीत थे. इसमें उन्होंने कहा था कि किसी भी कानून के तहत ब्रिटिश भारत के मूल निवासियों को श्वेत नहीं माना जा सकता है. साल 1917 के आप्रवासन अधिनियम के बाद अमेरिका में भारतीयों का आप्रवासन कम हो गया. हालांकि, पंजाबी अप्रवासी मैक्सिको सीमा के जरिये अमेरिका में घुसते रहे. कैलिफोर्निया की इंपीरियल वैली में पंजाबियों की बड़ी आबादी थी, जिन्होंने इन अप्रवासियों की मदद की. सिख अप्रवासी पंजाबी आबादी के साथ आसानी से घुल मिल गए. भारतीय स्वतंत्रता के लिए अभियान चलाने वाले कैलिफोर्निया के समूह गदर पार्टी ने मैक्सिको की सीमा के जरिये लोगों को अवैध तरीके से अमेरिका में घुसने में मदद की.
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीयों को क्यों बताया अयोग्य
गदर पार्टी ने अवैध तरीके से लोगों को अमेरिका में घुसने में मदद करने के एवज में मिले पैसे का इस्तेमाल पार्टी की गतिविधियों को चलाने में किया. एक अनुमान के मुताबिक, 1920 और 1935 के बीच करी 2,000 भारतीय अप्रवासी अवैध रूप से अमेरिका में दाखिल हुए. साल 1920 तक भारतीय मूल के अमेरिकियों की जनसंख्या करीब 6,400 थी. अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने 1923 में संयुक्त राज्य अमेरिका बनाम भगत सिंह थिंड के मामले में फैसला सुनाया कि भारतीय नागरिकता के लिए अयोग्य थे, क्योंकि वे स्वतंत्र श्वेत व्यक्ति नहीं थे. अदालत ने यह भी तर्क दिया कि हमारे लोगों का महान समूह भारतीयों के साथ घुलने-मिलने को तैयार नहीं होगा.
श्वेत व्यक्ति का सुप्रीम कोर्ट ने क्या बताया अर्थ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नस्ल की लोकप्रिय समझ के आधार पर श्वेत व्यक्ति शब्द का तकनीकी अर्थ कॉकेशियन के बजाय उत्तरी या पश्चिमी यूरोपीय वंश के लोग है. इस निर्णय के बाद 50 से ज्यादा भारतीयों के नागरिकता के लिए लंबित आवेदन रद्द कर दिए गए. इसके बाद एक भारतीय सखाराम गणेश पंडित ने अप्राकृतिकरण के खिलाफ लड़ाई लड़ी. वह पेशे से एक वकील थे और उन्होंने एक श्वेत अमेरिकी से शादी की थी. उन्होंने 1927 में अपनी नागरिकता वापस हासिल कर ली थी. हालांकि, फैसले के बाद किसी अन्य देशीकरण की अनुमति नहीं दी गई, जिसके कारण 1920 और 1940 के बीच करीब 3,000 भारतीयों को अमेरिका छोड़ना पड़ा.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने भारतीय आप्रवासन के लिए दरवाजा खोल दिया.
लगातार सीढ़ी चढ़ रहे भारतीय पहुंचे अमेरिका
उच्च शिक्षा प्राप्त करके भारतीय युवा सामाजिक सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने लगे थे. धन गोपाल मुखर्जी 1910 में यूसी बर्कले आए. उस समय वह महज 20 साल के थे. वह बच्चों की कई किताबों के लेखक थे. उन्हें ‘गे-नेक: द स्टोरी ऑफ ए पिजन’ के लिए 1928 में न्यूबेरी मेडल से सम्मानित किया गया था. येल्लाप्रगडा सुब्बा राव 1922 में अमेरिका आए और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बायोकेमिस्ट बने. उन्होंने कोशिकाओं में ऊर्जा स्रोत के रूप में एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट के काम की खोज की और कैंसर के इलाज के लिए मेथोट्रेक्सेट विकसित किया. गोबिंद बिहारी लाल 1912 में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी पहुंचे थे. वह सैन फ्रांसिस्को एग्जामिनर के विज्ञान संपादक बने. वह पत्रकारिता के लिए पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय अमेरिकी बने.
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बदलती गई अमेरिका में भारतीयों की स्थिति
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने भारतीय आप्रवासन के लिए दरवाजा फिर खोल दिया. साल 1946 के लूस-सेलर अधिनियम के तहत हर साल 100 भारतीयों को अमेरिका में प्रवास की अनुमति दी गई. इसने संयुक्त राज्य अमेरिका बनाम भगत सिंह थिंड मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1923 के फैसले को प्रभावी रूप से पलट दिया. साल 1952 के प्राकृतिककरण अधिनियम ने 1917 के वर्जित क्षेत्र अधिनियम को निरस्त कर दिया. इसे मैककारन-वाल्टर अधिनियम के रूप में भी जाना जाता है. हालांकि, इसमें भी हर साल सिर्फ 2,000 भारतीयों को ही अमेरिका नागरिकता देने की रोक रखी गई. हालात बदले और 1955 में सैन फ्रांसिस्को में 21 होटल उद्यमों में से 14 का संचालन गुजराती हिंदू कर रहे थे. वहीं, 1980 के दशक तक भारतीयों के पास करीब 15,000 मोटल थे, जो अमेरिका के सभी होटलों और मोटलों का लगभग 28 फीसदी था.
फिर हुआ आप्रवासन में नाटकीय बदलाव
साल 1965 से 1990 के मध्य तक भारत से दीर्घकालिक आप्रवासन औसतन 40,000 लोग सालाना का था. साल 1995 के बाद से भारतीय आप्रवासन काफी बढ़ गया, जो साल 2000 में लगभग 90,000 आप्रवासियों के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया. भारत से 21वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका में प्रवास की प्रवृत्ति में अहम बदलाव देखा गया. बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे और हैदराबाद में आईटी सेक्टर में जबरदस्त विकास हुआ. इसके बाद तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु से बड़ी संख्या में लोग अमेरिका गए. अमेरिका की ओर से हर जारी किए जाने वाले सभी एच-1बी वीजा में 80 फीसदी से ज्यादा भारतीयों को ही मिलते हैं.
भारतीय मूल की अमेरिकी कमला हैरिस ने अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति बनकर इतिहास रच डाला.
औसत घरेलू आय में भारतीयों का दबदबा
भारतीय अमेरिकी 1,26,891 डॉलर की औसत घरेलू आय के साथ अमेरिका में सबसे अमीर जातीयता बन गए हैं, जो अमेरिकी औसत 65,316 डॉलर से करीब दोगुना है. साल 2000 के बाद से बड़ी संख्या में भारतीय छात्रों ने उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाना शुरू कर दिया. अनुमान बताते हैं कि किसी भी साल 5,00,000 से ज्यादा भारतीय-अमेरिकी उच्च-शिक्षा संस्थानों में जाते हैं. भारतीय मूल की अमेरिकी कमला हैरिस ने 20 जनवरी 2021 को अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति बनकर इतिहास रच डाला. वह 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन के साथ चल रहे साथी के रूप में उपराष्ट्रपति चुनी गईं. उनके अलावा 20 अन्य भारतीय अमेरिकियों को प्रशासन में प्रमुख पदों पर नामांकित किया गया था.
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Tags: America, Citizenship, Citizenship Act, India US
FIRST PUBLISHED : June 23, 2023, 22:33 IST






