
प्रदीप साहू/चरखी दादरी: मदद करने वाले की दौलत नहीं नीयत देखी जाती है…मन में अगर किसी के लिए कुछ करने की इच्छा हो तो रास्ते अपने आप बनते जाते हैं. एक ऐसा ही शख्स जिसके पास न तो पैसा है, न ही आय को कोई साधन. इसके बावजूद वह कई सालों से एक अनोखी दीवार बनाकर जरूरतमंदों तक मदद पहुंचा रहा है.
हजारों जरूरतमंदों के लिए यह दीवार किसी तिजोरी से कम नहीं. इस दीवार को ‘खुशियों की दीवार’कहते हैं. इसका जैसा नाम, वैसा ही काम भी है. दादरी के रंगकर्मी संजय रामफल ने इस दीवार को जरूरतमंदों की मदद के लिए बनाया था. इस अनोखी दीवार पर लोग अपने (इस्तेमाल लायक) पुराने कपड़े, जूते या अन्य जरूरत का सामान बांधकर टांग देते हैं या उसके सामने रख देते हैं, ताकि जरूरतमंद लोग इस सामान का दोबारा इस्तेमाल कर सकें.
एकत्रित किए सामान को जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाता है. करीब सात वर्ष पहले दादरी के जिला न्यायालय परिसर में ‘खुशियों की दीवार’ अभियान की शुरुआत की गई थी. साथ ही रंगकर्मी संजय ने एक कपड़ा बैंक भी चला रखा है, जहां से कोई भी जरूरत के कपड़े ले जा सकता है. अब तक हजारों लोगों को जरूरत के मुताबिक कपड़े बांटे जा चुके हैं. संजय अकेले ही टेंपो में एकत्रित सामान को लेकर गरीबों के बीच पहुंचते हैं.
संघर्ष के दिनों में देखी गरीबों की हालत
संजय रामफल ने बताया कि उन्होंने काफी समय मायानगरी मुंबई में संघर्ष किया है. अपने संघर्ष के दौरान उन्होंने वहां गरीबों की हालात देखी, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने जरूरतमंदों के लिए कुछ करने की ठानी. फिर घर वापसी के बाद इस सेवा अभियान को शुरू किया. उनका कहना है कि झुग्गी झोपड़ी, कच्ची बस्ती में रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होती. अच्छे कपड़े खरीदने की बात तो दूर, घर खर्च चलाना उनके लिए मुश्किल होता है. ऐसे लोगों की मदद के लिए कपड़ा बैंक खोलने का विचार मन में आया.
टेंपो देखकर हो जाते हैं खुश
झुग्गी झोपड़ी के लोग संजय का टेंपो देखकर खुश हो जाते हैं. जरूरत का सामान मिलने की खुशी इन लोगों की आंखों में साफ दिखाई देती है. वहां के लोगों ने बताया कि हर वर्ष सर्दी के मौसम में संजय उनके पास टेंपो में जरूरत का सामान लेकर पहुंचते हैं, जिससे उन्हें का काफी मदद मिलती है.
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FIRST PUBLISHED : June 19, 2023, 19:37 IST






