कहानी या कोई किताब लिखने का मतलब तभी है जब वह हमें प्रेरित करे आगे बढ़ने के लिए या कुछ नया गढ़ने के लिए. सफलताओं की कहानी हमेशा प्रेरणा बनती हैं. एक पीढ़ी अपनी नई पीढ़ी को लोगों की सफलताओं की कहानी सुनाते-पढ़ाते हुए नई पीढ़ी में ऊर्जा का संचार करती आई है. खासकर कारोबारी जगत की कहानियां हर किसी को आकर्षित करती हैं.
हिंद पॉकेट बुक्स से ऐसी ही एक बड़ी शानदार किताब छपकर आई है- ‘टाटा स्टोरीजः चालीस कहानियां जो आपको हमेशा प्रेरित करेंगी’. इसके लेखक हैं हरीश भट. बता दें कि हरीश भट टाटा संस के ब्रांड संरक्षक हैं. टाटा समूह से वे पिछले तीन दशकों से जुड़े हुए हैं. उन्होंने टाटा ग्लोबल बेवरेजेज के प्रबंध निदेशक और टाइटन कंपनी लिमिटेड की घड़ियों और आभूषण व्यवसायों के मुख्य ऑपेटिंग ऑफिसर सहित कई अहम भूमिकाएं निभाई हैं.
हरीश भट की यह किताब अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी और प्रकाशित होते ही इस किताब को पाठकों ने हाथोंहाथ लिया. कुछ ही दिनों में टाटा स्टोरीज अंग्रेजी में नेशनल बेस्टसेलर साबित हुई. अब इसका हिंदी अनुवाद हिंद पॉकेट बुक्स से आया है. अंग्रेजी से इसे हिंदी में अनुवाद किया है डॉ. संजीव मिश्र ने. संजीव मिश्र पत्रकारिता जगत का चर्चित नाम हैं. उनकी पुस्तक ‘बवाली कनपुरिया’ काफी चर्चित रही है.
Famous Hindi Books: हिंदी की 5 श्रेष्ठ किताब, जिन्होंने गाड़े कामयाबी के झंडे
हम सभी जानते हैं कि टाटा समूह केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में विशेष स्थान रखता है. इसकी सफलता में एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों ऐसी कहानी हैं जो कामयाबी के सूत्र बताती हैं. टाटा ग्रुप के बनने और उसे एक मुकाम तक पहुंचाने में किन-किन लोगों ने अपना जीवन स्वाह किया है, इस हरीश भट की टाटा स्टोरीज से हमें पता चलता है. इस किताब की मार्फत हरीश भट पाठक को एक ऐसी यात्रा पर ले जाते हैं जो कारोबार करने के सबसे अच्छे तरीकों के बारे में बताते हैं. इस किताब में वैसे तो सभी 40 कहानियां बेहद रोचक हैं, लेकिन सबसे पतली घड़ी की कहानी चौकाने वाली है. घड़ी कैसे बनती है, उसमें किस प्रकार की मशीनरी का इस्तेमाल होता है, घड़ी बनाने में कौन-सा देश सबसे आगे है, घड़ियों के डिजाइनर कौन होते हैं, ऐसी तमाम दिलचस्प जानकारियां से हम यहां रू-ब-रू होते हैं. तो आप भी पढ़ें – ब्रह्मांड की सबसे पतली घड़ी-
प्यार से बीजीडी के नाम से बुलाए जाने वाले बीजी द्वारकानाथ टाटा ग्रुप के पुराने दिग्गज रहे हैं. उन्होंने टाइटन कंपनी में तीन दशक तक काम किया है. घड़ी निर्माण कला में पारंगत, प्रौद्योगिकीविद और एक्सपर्ट फोटोग्राफर बीजीडी का हसोड़पन भी ज़बरदस्त है.
1997 में, बीजीडी और उनके सहयोगी सुब्रमण्य भट ने टाइटन के प्रसिद्ध मैनेजिंग डायरेक्टर जर्क्सेज देसाई से मिलने का फैसला लिया. वे उनके साथ एक चुनौती भरी परियोजना पर चर्चा करना चाहते थे. यह एक ऐसी परियोजना थी, जिस पर किसी अन्य भारतीय कंपनी ने पहले कभी काम नहीं किया था.
वे बंगलौर स्थित टाइटन के हेडक्वार्टर की छठी मंजिल के एक कोने में बने जर्क्सेज देसाई के ऑफिस पहुंचे. बीजीडी ने बिना समय बर्बाद करते हुए अपना प्रस्ताव सामने रखा.
बीजीडी ने जर्क्सेज देसाई से कहा कि ‘हम दुनिया की सबसे पतली घड़ी (स्लीमेस्ट वॉच मूवमेंट) बनाना चाहते हैं.’ इसकी शुरुआत घड़ी के भीतर प्रयोग होने वाले एक उपकरण ‘मूवमेंट’ के उत्पादन से करने का प्रस्ताव रखा गया. ‘मूवमेंट’ हर घड़ी के अंदर लगा एक इंजन होता है, जो घड़ी को चलाने में मदद करता है और सही समय बताता है. उन्होंने कहा, ‘एक ऐसा “मूवमेंट” जो एक क्रेडिट कार्ड जितना पतला हो यानी बस 1.15 मिलीमीटर मोटाई वाला हो और इसमें बैटरी भी शामिल है. एक ‘मूवमेंट’ जो बेहद मजबूत भी हो और खूबसूरत अल्ट्रा-स्लीम कलाई घड़ियों में इस्तेमाल के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए किया जा सके. यह सबकुछ दुनियाभर में कहीं भी पहली बार हो रहा होगा.’
देसाई और बीजीडी दोनों जानते थे कि पतले (स्लिम) ‘मूवमेंट’ बेहद दुर्लभ थे क्योंकि उन्हें डिजाइन करना और मैनुफैक्चर करना, दोनों ही काम चुनौतीपूर्ण हैं. यहां तक कि उस समय जो थोड़े अल्ट्रा-स्लिम यूरोपीय और जापानी मूवमेंट उपलब्ध थे उनका उत्पादन भी बहुत कम संख्या में होता था. ये ‘मूवमेंट’ बहुत महंगे थे और कुछ मामलों में तो उनकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में थी. और इस कारण वे म्यूज़ियम में रखे जाने वाले पीस बन कर रह गए थे.

बीजीडी ने उम्मीदों के साथ देसाई की ओर देखा और कहा, ‘सर, यह हमारे लिए वास्तविक उपलब्धि होगी, वह भी कुछ ऐसी जो विश्वस्तरीय और उससे आगे की हो.’ उन्होंने देखा कि देसाई उनकी ओर बेहद सावधानी से देख रहे थे. उनकी आंखें आश्चर्य से फैल गई थीं और वहां एकदम सन्नाटा छाया हुआ था.
और आखिरकार देसाई बोले. अपने तराशे हुए, नर्म ऑक्सफ़ोर्ड लहजे में कहा ‘गो अहेड’ यानी आगे बढ़ो.
बीजीडी और भट तुरंत देसाई के कमरे से बाहर निकले. उनका दिल खुशी से उछल रहा था. उनका लीडर यह जोखिम उठाने को राज़ी था और ऐसी चीज में निवेश करने को तैयार था, जो पहले कभी नहीं किया गया. वैसे वे लोग एक स्लिम वॉच ‘मूवमेंट’ कुछ साल पहले ही बना चुके थे, जिसके लिए 1996 वे एक पुरस्कार भी जीत चुके थे. अब 1.15 मिलीमीटर मोटाई वाले ‘मूवमेंट’ का निर्माण इसी कड़ी में एक बड़ा कदम होने वाला था.
कुमार विश्वास की सबसे चर्चित प्रेम कविता- ‘एक पगली लड़की के बिन’
तुरंत ही एक बड़ी प्रोजेक्ट टीम बनाई गई. यह तमाम सवालों के जवाब की ढूंढने की शुरुआत थी. सबसे पहला बड़ा सवाल था कि कोई इतना पतला ‘मूवमेंट’ कैसे विकसित कर सकता है, जो समय बताने में भी सटीक हो? उन्हें एक ऐसी ‘स्टेप मोटर’ की जरूरत थी, जो उच्च घूर्णन क्षमता (टॉर्क) वाली हो और जिसमें बिजली की खपत भी कम हो. कंपनी ने एक स्विस कंपनी ऑडेमर के साथ काम करके इस चुनौती का हल निकाला. इसके बाद टीम ने टाइटन के भीतर विकसित एक सर्किट बोर्ड के साथ एक स्विस ‘स्टेप मोटर’ का समन्वय किया जो समान रूप से पतला था. बाद में इसी टीम ने उक्त स्विस ‘स्टेप मोटर’ का तेज़ी से भारतीयकरण किया, वह भी पहले से अच्छे प्रदर्शन के साथ.
फिर लंबी बैटरी लाइफ सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण था. कोई भी बार-बार एक घड़ी की बैटरी नहीं बदलना चाहता. यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी था कि पूरी आंतरिक मशीनरी बहुत कम ऊर्जा के खपत से ही चले. इसके लिए घड़ी के सभी पुर्जों के डिज़ाइन में बिना कोई बड़ी फेरबदल किए बहुत छोटा किया जाना था. यहा, दोबारा एक फिर तकनीकी टीम ने दिन-रात एक करके अपनी प्रयोगशालाओं में काम किया. आखिरकार उन्हें जो मिला वह अद्भुत था. एक चालीस वाट के बल्ब को एक घंटा जलाने के लिए जितनी ऊर्जा की ज़रूरत होती है, उतनी ऊर्जा से यह अल्ट्रा-स्लिम घड़ी पचास साल से ज्यादा चल सकती थी!
वर्ष 2000 तक एक वर्किंग ‘मूवमेंट’ तैयार हो चुका था. शुरुआती प्रस्ताव तो इस अल्ट्रा-स्लिम ‘मूवमेंट’ स्विटज़रलैंड के घड़ी निर्माताओं को बेचने का था. लेकिन स्विटज़रलैंड की कंपनियों ने घड़ियों के लिए भारतीय ‘मूवमेंट’ खरीदने से साफ इनकार कर दिया. बीजीडी एक घटना याद करते हुए बताते हैं कि किस तरह बेसेल अंतरराष्ट्रीय घड़ी मेले में एक प्रसिद्ध घड़ी ब्रांड रेमंड वेइल के एक स्विस प्रतिनिधि ने उन्हें बताया था कि भारतीय ‘मूवमेंट’ उनकी मज़बूत ब्रांड छवि को कमज़ोर कर देगा, इसलिए स्विटजरलैंड की कंपनियां भारतीय ‘मूवमेंट’ के इस्तेमाल पर विचार तक नहीं करेंगी.
बीजीडी इस मीटिंग से बाहर उदास होकर बाहर निकले, लेकिन इस उदासी के साथ भी वे दृढ़निश्चयी थे. उनकी टीम ने भारत में जो विकसित किया था, उस पर उन्हें गर्व था और यही हाल उनके बॉस जर्क्सेज देसाई का था. इसके बाद जब वे वापस आ गए तो देसाई ने फैसला किया कि यदि स्विटजरलैंड के घड़ी निर्माता ‘मूवमेंट’ नहीं खरीदना चाहते हैं तो टाइटन इसका इस्तेमाल स्वयं एक ब्रांडेड बहुत पतली (अल्ट्रा स्लिम) घड़ी को लॉन्च करने के लिए करेगा.
एक बार फिर यह एक साहसी फैसला था. दरअसल इस बारे में ग्राहकों के बीच कोई शोध नहीं किया गया था कि भारतीयों को अपनी कलाई पर अल्ट्रा-स्लिम घड़ी की जरूरत भी है या नहीं. लेकिन साहसी मार्केटर ऐसे ही उठाते हैं. जब उनके पास कोई बदलाव लाने वाला प्रोडक्ट होता है, वे रिसर्च पर विश्वास नहीं करते. बल्कि वे अपने उत्पाद की जरूरत और मांग पैदा करने का काम करते हैं.
हालांकि, जल्द ही देसाई ने इस फैसले के पीछे की वास्तविकता से टीम को अवगत करवा दिया. उन्होंने टीम से कहा, ‘हमारी अल्ट्रा-स्लिम घड़ी भारतीय उपभोक्ताओं द्वारा रोज पहनने के लिए बनाई जाएगी. इसलिए इसे वॉटर रेसिस्टेंट यानि जल प्रतिरोधी होना चाहिए. यह बहुत जरूरी है. ऐसा न हुआ तो यह घड़ी भारतीय में टिक ही नहीं पाएगी.’
एक बार फिर बीजीडी और उनकी टीम में हड़कंप मच गया, अब एक नई चुनौती सामने थी. अब एक पतले ‘मूवमेंट’ के साथ इतनी पतली सतहों वाली घड़ी को जल प्रतिरोधी कैसे बनाया जा सकता है?
इसके लिए जरूरी था कि घड़ी को एक बाहरी आवरण में संवारा जाए, जिसकी सतह बेहद पतली हो लेकिन उसका ढांचा बेहद मजबूत हो. एक बार फिर, बीजीडी ने अपने एक साथी बी.वी. नागराज के साथ घड़ियों की दुनिया के सबसे अनुभवी स्विटजरलैंड के घड़ी निर्माताओं से संपर्क किया. इस बार भी स्विटजरलैंड से ‘न’ में जवाब मिला.
उसका ख़ुदा रूठ कर कहीं चला गया है, पढ़ें तहसीन मुनव्वर की शानदार कहानी ‘खोया पाया’
बीजीडी याद करते हैं कि टीम एक साथ आई और सबने मिलकर यह तय किया कि अगर स्विटजरलैंड मदद नहीं करेगा तो हम खुद अपनी मदद करेंगे. यह तय हुआ था कि वापस अपने देश भारत में, तमिलनाडु के होसुर में स्थित प्यारी टाइटन घड़ी के कारखाने में हम अपनी घड़ी बनाएंगे.
और ये चुनौतियां बेकार नहीं जाने दी गईं. कई बार बदलावों व प्रयोगों के बाद टाइटन ने तीस मीटर गहराई तक जल प्रतिरोधक क्षमता वाली घड़ी और उसका बाहरी आवरण बनाने में सफलता पा ली थी. टीम ने घड़ी में कांच की जगह नीलम के इस्तेमाल का फैसला किया, क्योंकि अति-पतली सतह पर यह बिखरकर अपनी जगह बना लेगा. टीम ने घड़ी के पिछले हिस्से पर ऑल-राउंड फिटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया, ताकि इसे सर्विसिंग या बैटरी बदलने के लिए आसानी से खोला जा सके.
इस बीच परियोजना के प्रमुख प्रदर्शनीय पुर्जा डिजाइनर माइकल फोले घड़ी के सौंदर्यबोध को अंतिम मूर्तरूप देने के लिए जर्क्सेज देसाई के साथ मिलकर काम कर रहे थे. माइकल ने कहा, ‘मैं एक ऐसी घड़ी बनाने की संभावना को लेकर उत्साहित था जो लगभग अदृश्य थी. हम एक ऐसी घड़ी बनाना चाहते थे, जिसके भीतर बहुत पतला ‘मूवमेंट’ समा जाए और जो एकदम सपाट दिखने के बजाय, किनारों से पतली लगे.’
इस आकर्षक डिज़ाइन फिलॉसोफी का जश्न मनाने के लिए इस विशेष घड़ी का नाम रखा गया, ‘टाइटन एज’. घड़ी के लिए एकदम सही नाम. यह घड़ी न सिर्फ किसी वस्तु की पतली धार की तरह दिखती थी बल्कि वह अग्रणी तकनीकी उत्कृष्टता के साथ घड़ी निर्माण की दुनिया का चमत्कार थी.
पूरी घड़ी भीतर के मूवमेंट और बाहर के आवरण सहित महज 3.5 मिलीमीटर पतली थी और सिर्फ 14 ग्राम वजन वाली, बहुत ही हल्की भी थी. यह घड़ी पूरी दुनिया में उपलब्ध सबसे पतली घड़ी थी और शायद सबसे हल्की घडियों में से एक थी.
Bal Kahani: आखिर क्यों अपने-आप ही नाच रहा था पिंटू, पढ़ें प्रकाश मनु की कहानी ‘धमाल पंपाल के जूते’
बीजीडी, जिन्हें बार-बार स्विटजरलैंड के लोगों ने निराश किया था, याद करते हैं कि अगले वर्ष हुए बासेल घड़ी मेले में उनकी कलाई पर ‘टाइटन एज’ थी. वहां वे एक मीडिया आयोजन के दौरान स्वैच ग्रुप के चैयरमैन और स्विटजरलैंड की घड़ियों के पितामह निकोलस हाइक सीनियर से मिले. उन्होंने हाइक को गर्व के साथ टाइटन एज दिखाई. वे घड़ी के पतलेपन को देखकर अवाक् रह गए. उन्होंने बहुत देर तक बीजीडी का हाथ पकड़े रखा और घड़ी को देखते रहे. उन्होंने उसका एक फोटो भी लिया. और फिर, वे बीजीडी के पास आए और कहा, ‘अद्भुत!’
दुनिया की सबसे पतली घड़ी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, घड़ी के निर्माण को लेकर और भी कई दिलचस्प किस्से हैं, इन्हें जानने के लिए आपको किताब पढ़नी होगी.
पुस्तकः टाटा स्टोरीज
लेखकः हरीश भट
अनुवादकः संजीव मिश्र
प्रकाशकः हिंद पॉकेट बुक्स
मूल्यः 299 रुपये
.
Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 19, 2023, 08:00 IST






