बालू हो जाए खत्‍म तो इससे बनेंगे घर, ढूंढ लिया गया विकल्‍प, मुंबई में तो इस्‍तेमाल भी हो रहा

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घर बनाते समय एक चीज की जो सबसे ज्यादा जरूरत होती है वह है रेत, यानी बालू. शहरों में तो यह कहीं मिलती नहीं, ग्रामीण या जंगली इलाकों से लाया जाता है. कई शहर तो ऐसे हैं जहां इसे सैकड़ों किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है. जरूरत ज्यादा है और उत्पादन न के बराबर. ऐसे में एक न एक दिन इसे खत्म ही हो जाना है. आपने कई बार बिल्डर से सुना होगा कि रेत नहीं मिल रही है, इसलिए काम ठप पड़ा है. यह समस्या बढ़ने ही वाली है क्योंकि रेत की कमी होती जा रही है. ऐसे में सोचिए कि बालू अगर न मिले तो तो घर बनेगा कैसे? हालांकि, चिंता की बात नहीं. इसका विकल्प कल ढूंढ लिया गया है. महाराष्ट्र में तो इसका इस्तेमाल भी किया जा रहा है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के शहरों में घर बनाने और अन्‍य निर्माण के लिए हर साल 6 करोड़ टन रेत की जरूरत होती है. सबसे अच्‍छी रेत नद‍ियों में पाई जाती है. लेकिन ज्‍यादा खनन होने से इकोसिस्‍टम पर सीधा असर होता है. नदियों का तंत्र प्रभावित होता है तथा इससे नदियों की खाद्य-श्रृंखला नष्ट हो जाती है. कई जगह इसी की वजह से बाढ़ तक आती है, तो कई जगह सूखा रह जाता है. सिंचाई पर भी इसका बुरा असर होता है. बालू खनन पर रोक की वजह से भी निर्माण में भी दिक्‍कत आती है.

बेकार सामग्र‍ियों से बालू का सस्‍ता विकल्‍प तैयार किया गया
समस्‍या से निपटने के लिए महाराष्‍ट्र में एक खास तरह का प्रयोग हो रहा है. कुछ बेकार सामग्र‍ियां रीसाइक‍िल करके बालू का सस्‍ता और टिकाऊ विकल्‍प तैयार किया गया है. थर्मल पॉवर प्‍लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐस, या कोयले की राख जमा की जाती है. इससे ही फ्लाई ऐस एग्रीगेट तैयार किया जाता है. मुंबई में लाखों टन फ्लाईऐस पैदा होती है, जिसे नष्‍ट करने का फ‍िलहाल सही विकल्‍प मौजूद नहीं. इससे फ्लाई ऐस का सही इस्‍तेमाल हो जाएगा. इलाके के कई उद्योगों में कोयला जलता है. उससे निकलने वाली राख का भी इस्‍तेमाल किया जा सकता है. डायचे वैले की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे लाइकोर्स नामक एक पदार्थ बनाया जाता है जो रेत की तरह ही मजबूत होता है. जर्मनी में इसका खूब इस्‍तेमाल किया जा रहा है.

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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