
हर साल जब मैं मदर्स डे पर अम्मा को विश करती और उनसे दुआएं लेती, साथ बैठे अब्बा यही कहते कि ये मदर्स डे तो हर साल आता है, लेकिन फादर्स डे नहीं होता क्या? मैं मुस्कुराती और कहती कि अब्बा आप परेशान मत होइए फादर्स डे भी होता है और मैं आपको तब भी विश करूंगीं. जी हां ज़्यादातर पिताओं की यही शिकायत होती है कि बच्चे मां से ज़्यादा क्लोज़ रहते हैं, उनसे नहीं. इस बारे में बाद में बात करेंगे. पहले मैं अपने पिता के साथ देश और दुनिया के पिताओं को मुबारकबाद देती हूं क्योंकि आज फादर्स डे है. हम वो जनरेशन हैं, जो अपने पिता से बहुत नज़दीक या बेतकल्लुफ़ नहीं रही.
एक अजीब सी दूरी हमारी पीढ़ी के बच्चों और उनके पिताओं के बीच रही. लेकिन आजकल के पिता अपने बच्चों के दोस्त बन रहे हैं. पिता से प्यार को लेकर औलादें इतनी बेबाकी नहीं दिखाती, जितनी मां के साथ क्लोज़ होती हैं. पिता परिवार का वो स्तंभ हैं, जिसकी जवानी परिवार को संभालने में खर्च हो जाती है. फादर्स डे पर हम दुनिया के तमाम पिताओं के प्यार और त्याग के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं, क्योंकि अकसर पिता अनदेखी की शिकायत करते आते हैं.
फादर्स डे का इतिहास
हर साल फादर्स डे जून महीने के तीसरे रविवार को मनाया जाता है. और इस साल फादर्स डे 18 जून को मनाया जा रहा है. फादर्स डे मनाने की शुरुआत अमेरिका से हुई है. फादर्स डे को सबसे पहले यूएसए में सोनोरा स्मार्ट डोड ने प्रस्तावित किया.
साल 1909 में एक अमेरिकी लड़की सोनोरा डोड ने पिता के सम्मान के लिए इस दिन का प्रस्ताव रखा. कई स्थानीय पादरियों ने इस विचार को एक्सेप्ट किया. और 19 जून 1910 को सोनोरा स्मार्ट डोड ने स्पोकेन, वाशिंगटन में पहला फादर्स डे समारोह मनाया.
मदर्स डे प्रेरित होकर सोनोरा ने दुनियाभर के पिताओं के लिए एक दिन मनाने की शुरुआत की. जून डोड के पिता का जन्मदिन महीना था. साल 1924 में अमेरिकी राष्ट्रपति केल्विन कूलिज ने इस दिन को सेलिब्रेट करने को अपना समर्थन दिया और 1966 में राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने आधिकारिक तौर पर इसे फादर्स डे के रूप में स्थापित किया. राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने साल 1972 में एक कानून पर हस्ताक्षर किए और जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे के रुप में नामित किया.
फादर्स डे; प्यार जताने का दिन
वैसे तो मां-बाप के प्रति प्यार जताने के लिए कोई दिन मुकर्रर नहीं किया जा सकता है. लेकिन बचपन से लेकर जब तक हम अपने मां बाप के साथ रहते हैं, उन्हें कभी स्पेशल फील नहीं करा पाते हैं. शायद ये हमें ज़रूरी ही नहीं लगता है. मां के साथ परिवार में बच्चे सबसे ज़्यादा वक्त बिताते हैं, लेकिन पिता के साथ अजीब सी दूरी रहती है. हमारी पीढ़ी के लोग सम्मान में पिता से प्यार जताना ही भूल जाते या इतनी हिम्मत नहीं कर पाते हैं. आज की जनरेशन अपने पिता के ज़्यादा नज़दीक है.
पिता भी बच्चों के साथ डिक्टेटर की तरह नहीं बल्कि उनकी तरह ही घुलमिलकर रहते हैं. आज के पिता अपने बच्चों के साथ वक्त बिताते हैं, उनके साथ खेलते हैं, उन्हें घुमाते हैं और उनके दोस्त बनते हैं. आज के बच्चे ज़्यादा खुशनसीब हैं क्योंकि लिहाज़ या शर्म में उनके पिता उनसे दूर नहीं हुए. फादर्स डे पिता के त्याग और समर्पण को नमन करने का दिन है.
पिता से दूरी नहीं, उनसे गले लगिए
आज के बच्चे अपने पिता के ज्यादा नज़दीक हैं. वो उनके दोस्त बने हुए हैं. लेकिन हमारी पीढ़ी जो अब खुद माता-पिता बन चुकी है, वो कभी अपनी ज़िंदगी में अपने पिता के गले नहीं लग पाई. हम लोगों ने कभी अपने पिता के सिर में गोद नहीं रखी है. हम कभी कह ही नहीं पाए कि उनसे कितना प्यार है, वो हमारी ज़िंदगी में क्या एहमियत रखते हैं.
ज़िंदगी की भागमभाग में मां-बाप की ज़िंदगी खप जाती है और औलाद चिड़िया के बच्चे की तरह घोंसले से उड़ जाती है. पिता तमाम उम्र अपने परिवार की परवरिश के लिए अपना सब कुर्बान कर देता है और औलाद उनके गले लगकर लिपटकर रो भी नहीं सकती है. हमारी तहज़ीब ऐसी रही कि हम अपने पिता के नज़दीक शायद चाहकर भी नहीं जा पाए, उनसे कह नहीं पाए कि आई लव यू. पापा को गले लगकर कभी हमने उनसे नही पूछा कि आप थक गए होंगे, आराम कर लीजिए. पिता कभी रूकते नहीं हैं, वो कभी थकते नहीं है. वो बस चलते रहते हैं, लगातार मशीन की तरह. पिता का प्रेम दिखाई नहीं देता है, वो खामोश मोहब्बत से अपने परिवार अपने बच्चे के लिए ज़िंदगी खपा देते हैं. चन्द्रकान्त देवताले ने इस पर एक खूबसूरत कविता लिखी है.
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
तुम्हारी निश्चल आंखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है
ज़रूर दिखाई देती होंगी नसीहतें
नुकीले पत्थरों-सी
दुनिया-भर के पिताओं की लम्बी कतार में
पता नहीं कौन-सा कितना करोड़वाँ नम्बर है मेरा
पर बच्चों के फूलोंवाले बग़ीचे की दुनिया में
तुम अव्वल हो पहली कतार में मेरे लिए
मुझे माफ़ करना मैं अपनी मूर्खता और प्रेम में समझा था
मेरी छाया के तले ही सुरक्षित रंग-बिरंगी दुनिया होगी तुम्हारी
अब जब तुम सचमुच की दुनिया में निकल गई हो
मैं ख़ुश हूं सोचकर
कि मेरी भाषा के अहाते से परे है तुम्हारी परछाई।
प्यार मोहब्बत जताने का कोई दिन नहीं होता है, ये बात भी कही जा सकती है, हां बिल्कुल कोई एक दिन नहीं होता है, लेकिन हम अपनी ज़िंदगी में अपने मां-बाप को इस तरह लेते हैं कि वो तो बस हमारे लिए ही हैं. उनकी ज़िंदगी औलाद के लिए ही है. नहीं उनकी खुद की भी ज़िंदगी है. मैं जब अम्मा को मदर्स डे पर विश करती हूं तो अब्बा की शिकायत बिल्कुल जायज़ है, हमने कभी अब्बा को कहा ही नहीं कि आपका दिन भी होता है. औलादें अपनी मां के सबसे नज़दीक होती है और पिता की ये शिकायत होती है कि बच्चे उनके नज़दीक नहीं है.
इसकी बहुत सारी वजहें भी होती हैं, लेकिन उस पर फिर कभी लिखा जाएगा. फिलहाल हम दुनिया के तमाम पिताओं को सलाम करते हैं, जिनकी वजह से ये दुनिया खूबसूरत है, जिन्होंने अपने परिवार के लिए अपना सबकुछ कुर्बान किया. आपको छोड़ जाते हैं उदय प्रकाश की एक कविता के साथ “बस में पिता”
मैंने बिल्कुल साफ़-साफ़ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता
उनके सफ़ेद गाल, तम्बाकू भरा उनका मुंह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें
उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी
उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज़?
उस बस पर बैठ कर
इस तरह क्यों चले गए पिता?






