हाइलाइट्स
अन्ना हजारे गांधीवादी समाजसेवी के तौर पर पहचाने जाते हैं.
उन्होंने रालेगांव सिद्धि के लोगों की मदद से ही वहां की तस्वीर बदल दी थी.
गांव को पानी और बिजली के लिए आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसी भी मदद नहीं ली.
भारत की राजनीति में आज गांधी जी की सोच और कार्यों को आगे बढ़ाने वाले बहुत कम लोग रह गए हैं. इनमें प्रमुख नाम अन्ना हजारे का आता है. देश भर में जनलोकपाल आंदोलन के समय मशहूर हुए अन्ना हजारे महाराष्ट्र में बहुत पहले से लोकप्रिय हैं. लेकिन अन्ना हजारे के बारे में जानना क्यों जरूरी है उनसे क्या सीख सकते हैं. क्या वे आज अप्रासंगिक हो गए हैं. ऐसे कई सवाल हैं जो पूछे जा सकते हैं. लेकिन अन्ना को जानने के लिए बाकी बातों के साथ जरूरी है कि यह समझा जाए कि उन्होंने रालेगांव सिद्धि की तस्वीर कैसे बदली. इसके लिए 15 जून को उनके जन्मदिन से अच्छा अवसर कौन सा हो सकता है.
फूल की दुकान पर किया काम
किसन बाबूराव हजारे का जन्म 1937 में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के बिंगर के रालेगांव सिद्धि गांव में हुआ था. पिता बाबूराव हजारे आयुर्वेद आश्रम अकुशल श्रमिक के रूप में काम किया करते थे. वे मां लक्ष्मीबाई के सबसे बड़े बेटे हैं. एक रिश्तेदार की मदद से अन्ना मुंबई में आकर सातवीं कक्षा तक पढ़ सके, इसके बाद उन्हें आगे सहयोग नहीं मिला. फिर दादर रेलवे स्टेशन पर 40 रुपये के वेतन पर फूल बेचने की दुकान में काम करना शुरू किया. बाद में उन्होंने खुद अपनी फूलों की दुकान खोली और दोनों भाइयों को रागेगण से मुंबई बुलाया.
फौज में आना और 1965 के युद्ध की घटना
अन्ना के दादा फौज के लिए भिंगनगर कार्यरत थे. उनकी मृत्यु के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगण सिद्धि में रहने आ गया था. अन्ना 1960 में अपने दादा की तरह फौज में एक ट्रक ड्राइवर के तौर पर भर्ती हुए थे और बाद में सैनिक हो गए थे. 1965 के भारत पाक युद्ध में खेमकरण सीमा पर ट्रक चलाते समय उनके साथियों पर हमला हुआ जिसमें वे अकेले ही बचे थे.
कुछ बड़े फैसले
युद्ध में चमत्कारिक तौर से बचने की घटना ने उन्हें हिलाकर रख दिया. इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्यों के बारे में सोचना शुरू किया और अपना जीवन समाज सेवा को समर्पित करने का फैसला किया. इसी के साथ आजीवन अविवाहित रहने का भी फैसला कर लिया. समाज सेवा की शुरुआत उन्होंने रालेगण सिद्धि के पास एक गांव से की जहां बहुत गरीबी और सुविधाओं की कमी थी.
अन्ना हजारे ने अपने गांव रालेगांव सिद्धि की कायापलट कर के रख दी थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
गांव का कायाकल्प
अन्ना ने देखा कि इस गांव को पहले पानी और बिजली की कमी से निपटने की जरूरत है. पहले उन्होंने नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश के पानी को जमा करने के लिए लोगों को साथ लिया और खुद भी इसी कार्य में लग गए. गांव में जगह जगह पर पेड़ लगाए गए और इसके लिए किसी भी सरकार या बाहरी मदद की उम्मीद तक नहीं की गई. बिजली के लिए गांव में सौर ऊर्जा और गोबर गैस की मदद ली.
यह भी पढ़ें: Ram Prasad Bismil Birthday: लोगों में इतने लोकप्रिय क्यों थे रामप्रसाद बिस्मिल
देश के सर्वोच्च सम्मान भी
अन्ना हजारे ने अपनी जमीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी और स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के बाद जो पैसा उन्हें पेंशन के जरिए मिलता था उसे भी गांव के विकास में लगा दिया. आज भी अन्ना गांव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं. आज गांव ना केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि आसपड़ोस के गांवों के लिए भी यहीं से दूध चारा वगैरह जाता है. इस प्रयास के लिए उन्होंने पद्मश्री और पद्मभूषण सम्मान से नवाजा जा चुका है.
अन्ना हजारे को जनलोकपाल आंदोलन के लिए देशभर में भारी लोकप्रियता मिली थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज
अन्ना हजारे इस मिसाल को कायम करने के बाद नहीं रूके लेकिन उन्होंने एक प्रतिमान स्थापित करने के बाद अपने ध्यान भ्रष्टाचार पर केंद्रित किया. 1991 में उन्होंने महाराष्ट्र की शिवसेना- भाजपा सरकार के कुछ भ्रष्ट मंत्रियों को हटाने की मांग करते हुए भूख हड़ताल की जिसके आगे सरकार को झुकना पड़ा. इसके बाद 1997 में अन्ना ने सूचना के अधिकार अधिनियम के समर्थन में मुंबई में अभियान चलाया और 9 अगस्त 2003 को अनशन पर बैठे. यहां भी सरकार को उनकी बात माननी पड़ी और फिर केंद्र सरकार को अनशन कर संसद को सूचना के अधिकार अधिनियम में संशोधन को मजबूर किया.
यह भी पढ़ें: Birsa Munda Death Anniversary: आदिवासियों के लिए भगवान क्यों हैं बिरसा मुण्डा?
लेकिन 2011 में जब अन्ना ने जन लोकपाल विधेयक के लिए अनशन आरम्भ किया तो देशव्यापी समर्थन तो मिला, अन्ना को अभूतपूर्व लोकप्रियता भी मिली लेकिन इस बार सरकार ने मांगे मानते हुए एक समिति बनाई और जनलोकपाल विधेयक पेश किया लेकिन अन्ना और उनके साथी बिल के मसौदे से सहमत नहीं थे. वादे शर्तों का दौर चलता रहा और अन्ना फिर से अनशन पर अड़े भी रहे, लेकिन अंततः आंदोलन बिना नतीजे के खत्म हो गया और अन्ना अपने गांव लौट गए. लेकिन इससे अन्ना का सम्मान और रुतबा आज भी उतना ही है.
.
Tags: Anna Hazare, India, Indian politics, Politics, Research
FIRST PUBLISHED : June 15, 2023, 06:52 IST






