(मनीष वैद्य/ Manish Vaidya)
“दो बारिशों के बीच कोई जगह ऐसी होती है
जहाँ पिछली सारी बारिशों की स्मृतियों
के अर्थ बदल जाते हैं
उस जगह पिछली बारिश में उगी झाड़ियों
पर फूल खिलने लगते हैं.”
राजेन्द्र धोड़पकर की इन पंक्तियों से गुजरते हुए वरिष्ठ कथाकार अशोक अग्रवाल की किताब ‘संग साथ’ को पढ़ना एक भिन्न तरह का आस्वाद है, जिसे शब्दों में कह पाना कठिन है पर ‘गूंगे के गुड़’ की तरह भीतर महसूस किया जा सकता है. अशोक अग्रवाल ने अपने समय के वरिष्ठ लेखकों, मित्रों और आत्मीयजनों को बेहद अपनेपन लेकिन गहरी निर्वैयक्तिकता के साथ बेबाकी से अपने संस्मरणों में उकेरा है.
‘संग साथ’ में शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, नागार्जुन, त्रिलोचन, लक्ष्मीधर मालवीय, जितेन्द्र कुमार, विनोद कुमार शुक्ल, नवीन सागर, प्रियदर्शी प्रकाश, विश्वेश्वर, ज्ञानेंद्रपति, पंकज सिंह के साथ-साथ छायाकार अशोक माहेश्वरी, सहयोगी अमितेश्वर और सुमन श्रीवास्तव पर भी बेहद संजीदगी से लिखा गया है.
यह देखना सुखद है कि नागार्जुन के प्रिय सहचर वाचस्पति जी पर लिखी आपकी टिप्पणी जिसका स्रोत नागार्जुन ही थे. लेखन ने उनकी आपत्ति के बाद इस किताब में प्रस्तुत संस्मरण से हटा दी है. आज के इस जिद्दी समाज में खुद को संशोधित करने की यह प्रवृत्ति कम ही देखने को मिलती हैं.
इन सबके बारे लिखे जाने का आशय यह नहीं कि उनके यश का उजला कोना ही दिखे, इसमें तो किसी कुएं के पारदर्शी तल की तरह सब कुछ ज्यों का त्यों झांकता है. यश ही नहीं अपयश भी और वह भी बेलौस, बिना किसी लाग-लपेट के. जिंदगी जैसी होती है धूप-छांही, ठीक उसी तरह यह सरस गद्य भी कभी हमें कचोटता है तो कभी गुदगुदाता है और कभी एक अनजान गुस्से से भर देता है. कुछ जगह हम अपनी मान मूर्तियों के त्रासद-अभावपूर्ण जीवन से विचलित से हो उठते हैं. जितेन्द्र कुमार, नवीन सागर और अमितेश्वर के क़िस्से इतनी बारीक डिटेल्स और मार्मिक ढंग से लिखे गए हैं कि पढ़ने के कई दिन बाद तक भी वे भीतर ही कहीं हिलगे रह जाते हैं.
Kazi Nazrul Islam Poetry: कृष्ण भक्ति में डूबकर काज़ी नज़रुल इस्लाम ने रच डाले सैकड़ों भजन
वरिष्ठ कवि विष्णु नागर सही कहते हैं कि व्यक्ति और रचनाकार के रूप में अशोक अग्रवाल अपने गद्य में भी कवि अधिक लगते हैं. इन संस्मरणों से गुजरते हुए लगता है, मानो कोई अनन्तिम कविता पढ़ी जा रही है. इसकी सरसता हमें भीतर तक भीगोती है. शमशेर जी, अज्ञेय, नागार्जुन और त्रिलोचन पर कितनी शिद्दत से लिखा है और गहरे अपनापे से. विनोद कुमार शुक्ल का अपने परिचितों के लिए ‘लाल भाजी’ लाने के लिए सब्जी मंडी में भटकना या जितेन्द्र कुमार के खाने के लिए रेल्वे स्टेशन पर घंटों का इंतज़ार, एक बड़े रचनाकार के भीतरी थाह की पड़ताल करता है. जितेन्द्र कुमार और अमितेश्वर के यायावर, दुर्गम और दुर्धर्ष जीवन को जिस तरह जाना, उसने एक तरह से विचलित कर दिया. इन दोनों से मैं कभी नहीं मिला, पर इस लिखे के ज़रिए मेरे मन में उनके लिए गहरा भाव जागा. कैसे रहे होंगे वे लोग. अब तो इस तरह के विषपायी लोग बनने ही बंद हो गए. कहीं नहीं देखने को मिलते. रचनाकार सिर्फ़ अपने लिखे हुए से बड़ा नहीं होता, वह अपनी आदमियत से बड़ा बनता है. ये क़िस्से हमें यही बताते हैं. एक पूरा दौर इसमें धड़कता है. उस वक़्त का समाज और समय इनमें साफ़-साफ़ पकड़ा जा सकता है. इनमें तब की अच्छाइयाँ हैं, अभाव हैं, तकलीफ़ों के बीच से गहरी आत्मीयता हैं और अदम्य इच्छाएँ हैं. उनके आपस के छोटे-छोटे गिले-शिकवे हैं, टसल हैं और मान-अपमान भी. थोड़ा बहुत जो ऊपर-ऊपर है, उसके नीचे मन की गहराई में पारदर्शी-सी सरल-तरल सदानीरा नदी है, जहाँ सब लिखने-पढ़ने वाले एक-दूसरे से नालबद्ध मिलते नजर आते हैं.
नवीन सागर के लिए तो इसमें इतनी मार्मिकता और साफगोई से लिखा गया है कि पढ़ते हुए अनायास आंखें गीली हो जाती हैं. ‘कुछ-कुछ कहा, बहुत कुछ अनकहा’ शीर्षक में वे लिखते हैं कि नवीन सागर की किस्सागोई का अंदाज़े-बयां सम्मोहक और जादुई था. उसकी स्मृति की पोटली में असंख्य चरित्र धडकते रहते और जिन्हें वह जब चाहता जागृत कर अपने श्रोता को उनकी दुनिया में चहलकदमी कराने ले चलता. किस्सागोई की यह अद्भुत शैली हर किसी को सिद्ध नहीं होती. इन क़िस्सों और चरित्रों को शब्दबद्ध करने का विचार उसके मन में आता रहता और स्थगित होता रहता. जीवन की कशमकश ने उसे वह वांछित अवकाश उपलब्ध नहीं कराया जिसकी उसे प्रतीक्षा रही होगी. एक अन्य संस्मरण में वे कहते हैं- “बेहद उजली और जगमगाते तारों से भरी उस रात साँची के स्तूपों को देखने-घूमने के बाद हम विदिशा की ओर लौट रहे थे. निर्जन सड़क पर नवीन के लहराते हुए स्कूटर के पीछे बैठा मैं नि:शब्द नवीन को सुन रहा था. नवीन के अंतर्लोक में नि:सृत होती अछूती कविताएं, उसके स्वप्न, इच्छाएं और वासनाएं… संगीत लहरियों की तरह बहते हुए शब्द… मैं अछूते वन्य पुष्प-बीज को पुष्पित होते देख रहा था. …निर्जन बंजर प्रांत सहसा महकते फूलों की घाटी में तब्दील हो रहा हो जैसे-हमारी सांसे… हमारी बातें… हमारे शब्द… कभी नष्ट नहीं होंगे… हमारे बाद भी… हमेशा अन्तरिक्ष में विद्यमान रहेंगे … इन्हें इस कोलाहल में कोई सुन पाये या नहीं…”- नवीन ने कहा था. (पृष्ठ 89) मुझे यह सब पढ़ते हुए अशोक जी की कहानी ‘हरा तोता’ याद आती रही, जिसे शायद ऐसे ही किसी भावावेग में कभी रचा गया होगा.
जितेन्द्र कुमार ‘खुद अपना एक दिलचस्प अपयश’ में कहते हैं- “अगर मैं क़िस्सागो हूं तो क्या यह जरूरी है कि मैं किसी ओर का क़िस्सा कहूँ- ज़्यादातर कल्पना से लिखा गया और दूसरों के दिल-दिमाग में एक सर्वद्रष्टा सा झाँककर ? क्या यह ज़रूरी है कि क़िस्सा हमेशा किसी दूसरे का ही अपयश हो ? यदि इस बार यह ज़रूरी नहीं हो तो आइये क़िस्सागोई की प्रचलित चतुराइयों को परे रखकर मैं आज आपको अपना क़िस्सा सुनाऊँ- ख़ुद अपना एक दिलचस्प अपयश, कतई सच्चा और सहज, जैसा आजकल के क़िस्सों में नहीं होता. इस पर विवाद हो सकता है कि मैं आला क़िस्सागो हूं भी या नहीं, पर इसमें विवाद की गुंजाइश नहीं है कि अब मैं एक क़िस्सा कहने जा रहा हूं अपने बारे में- एक ऐसे आदमी के बारे में जिसके अंदर झांकने से वे दूसरे कतराते हैं- खुद अपने अंदर, वे क़िस्सागो जो कवि बनने की फिराक में रहते हैं.”
मृणाल पांडे की सहमति से भूत-प्रेत भगाए, अंधविश्वासों-बाबाओं से मुक्ति दिलाई
यह उनके लिए बड़ी चुनौती थी कि इसमें फिसलन भरे कई रास्ते मौजूद थे, जहाँ से मूल बात छूट सकती थी; बावजूद इसके उनके पांव अतीत के काई घिरे पत्थरों पर भी मजबूती से जम सके हैं. संस्मरण के अंतर्विरोध को साधने का अर्थ है कि उसकी बहिर्मुखता और अंतर्मुखता को साध पाना. किताब में जिन पर लिखा गया है, वे उनके बड़े अज़ीज रहे हैं और उनसे लंबा साबका रहा है; ऐसे में लिखना और भी कठिन हो जाता है. लेकिन इन सबके बावजूद उन्होंने अपने संग-साथ रहने वाले लोगों को बेहतर ढंग से याद किया.
ये संस्मरण आज की पीढ़ी के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं और हमें अपने पुरखों के जीवन संघर्षों, चिंताओं, सपनों, उत्कट इच्छाओं, यायावरी, उनकी चुनौतियों, उनकी बेबसियों, उनके भीतर उमड़ते सवालों, उनकी बेकली, रचनाधर्मिता. कशमकश और उस दौर की स्मृतियों से भली-भांती रूबरू करवाते हैं. ये संस्मरण महज शब्द ही नहीं है, बल्कि इस बहाने उनके जीवन में फ़िर से झांकने और उनकी रचनात्मकता को देखने-समझने का नया नजरिया भी देते हैं, उस दौर को उन्होंने हमारे लिए इसके बहाने एक तरह से जीवंत कर दिया है, इतना कि इन्हें पढ़ते हुए हम आसानी से उन दिनों में आवाजाही कर पाते हैं. एक बात और कि इनसे हम आज के सवालों और चुनौतियों से मुठभेड़ करने के लिए पर्याप्त रोशनी पा सकते हैं.
पुस्तकः संग साथ
लेखकः अशोक अग्रवाल
प्रकाशकः संभावना प्रकाशन
मूल्यः 300 रुपये

.
Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 11, 2023, 11:51 IST









