
‘ययाति’, ‘तुगलक’, ‘ह्यवदन’ और ‘मंथन’ जैसे नाटकों, ‘निशांत’ और ‘उत्सव’ जैसी फिल्मों तथा ‘मालगड़ी डेज’, ‘टर्निंग प्वाइंट’ जैसे धारावाहिकों के कारण कला प्रेमियों के पसंदीदा रहे गिरीश कर्नाड को 4 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड, पद्मश्री, पद्म भूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना उनकी बहुआयामी प्रतिभा के प्रति आदर व्यक्त करना ही कहा जाएगा. रंगमंच, फिल्म और साहित्य के फलक पर हर रंग में खरे और प्रयोगशील गिरीश कर्नाड ने अपने जीवन को भरपूर जिया. इतनी विविधता के बाद भी वे हर जगह अप्रतिम और अव्वल रहे. उन्होंने वह भी किया जो नहीं करना और वह भी बने जो नहीं बनना था, लेकिन जो किया वह मन से किया, श्रेष्ठ किया.
10 जून 2019 गिरीश कर्नाड की जिंदगी का अंतिम दिन साबित हुआ. इसके पहले वे 2017 में सलमान खान अभिनीत फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ में डॉक्टर शेनॉय के किरदार में नजर आए थे. वर्ष 2012 में ‘एक था टाइगर’ में भी उन्होंने सलमान खान के साथ काम किया था. 81 वर्ष की उम्र में 2019 में मृत्यु के ठीक एक वर्ष पहले वे 5 सितंबर 2018 को पत्रकार-कार्यकर्ता गौरी लंकेश की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान ‘मी टू अर्बन नक्सल’ की तख्ती पहने दिखाई दिए थे. तब वे अस्वस्थ थे और ऑक्सीजन पाइप लगा कर भी कार्यक्रम में आए थे. यह था विचार और कार्य के प्रति उनका समर्पण. उन्होंने जीवन में कई कार्य ऐसे भी किए जो उनके पसंद के नहीं थे, लेकिन जब कार्य करने की पड़े तो ऐसे किए कि दूसरा कोई कर नहीं पाया.
गिरीश कर्नाड ने अपनी आत्मकथा कन्नड़ भाषा में लिखी है, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद गिरीश कर्नाड और श्रीनाथ पेरुअर ने किया है. ‘दिस लाइफ एट प्ले’ शीर्षक वाली इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद ‘यह जीवन खेल में’ मधुबाला जोशी ने किया है. वास्तव में यह पूरा जीवन जी कर गए गिरीश कर्नाड के आधे जीवन की कथा है. इस आत्मकथा में उनकी ठीक आधी उम्र यानी 1980 तक के चार दशक के जीवन का वर्णन है. इस आत्मकथा के ‘उपसंहार’ में उन्होंने लिखा है कि अगर हो सका तो वह बाकी जीवन की कथा भी लिखेंगे. मगर ऐसा हो नहीं सका.
ऐसे ही जीवन ने कई बार दिशाएं बदली हैं. अपने साक्षात्कारों और आत्मकथा में उन्होंने बताया है कि 1958 में उन्होंने गणित और सांख्यिकी से बीए किया. उनकी रूचि कला संकाय में थी, लेकिन वे विदेश जाना चाहते थे और उन्हें पता था कि विदेश जाने के लिए छात्रवृत्ति जितने अंक गणित में ही लाए जा सकते हैं. इसलिए गणित से पढ़ाई की और 1960 में प्रतिष्ठित रोड्स छात्रवृत्ति प्राप्त की. उस वर्ष वे अकेले भारतीय थे, जिन्हें यह छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी.
अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं कि मैं जब छोटा था तब स्केच बनाने का बहुत शौकीन था. जाने-माने लोगों के स्केच बना कर उन्हें भेजकर उन लोगों से ऑटोग्राफ मांगा करते थे. 17 साल की उम्र में आइरिस लेखक सीन ओ कैसी का स्केच बनाकर उन्हें भेजा. बदले में एक पत्र आया, जिसमें उन्होंने लिखा था कि ”मैं यह सब करके अपना समय बर्बाद न करूं बल्कि कुछ ऐसा करूं जिससे एक दिन लोग गिरीश कर्नाड का ऑटोग्राफ मांगे.” इस पत्र के बाद गिरीश कर्नाड ने स्केच बना कर ऑटोग्राफ मांगना बंद कर दिया.
कर्नाटक कॉलेज के विद्यार्थी कविताएं, छोटी कहानियां, लोक कथाएं लिखा करते थे. तब गिरीश कर्नाड ने सोचा था कि उन्हें भी कवि बनना है, लेकिन 1951 में सी. राजगोपालाचारी का लिखा महाभारत पढ़ा तो ‘ययाती’ लिखने का मन हुआ. मात्र 23 वर्ष की उम्र में 1961 में उनका चर्चित कन्नड नाटक ‘ययाति’ प्रकाशित हुआ था. 1964 में ‘तुगलक’ और 1971 में ‘हयवदन’ प्रकाशित हुए. तीनों ही नाटक कन्नड़ ही नहीं भारतीय नाट्य-साहित्य और रंगमंच के इतिहास के शीर्ष नाटक हैं, जिनका मंचन सत्यदेव दुबे और इब्राहिम अलकाजी जैसे निर्देशकों के निर्देशन में हुआ तथा देश के शीर्षस्थ कलाकारों ने अभिनय किया.
गिरीश कर्नाड अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उनके दिमाग में सबसे पहले ययाति और उनकी बहू चित्रलेखा के बीच की बातचीत ने आकार लिया और बाकी का नाटक उसके इर्द-गिर्द आकार लेने लगा. इस दौरान उन्होंने पाया कि जैसे यह नाटक उन्होंने लिखा नहीं है कि बल्कि किरदार उनके आसपास थे और उनकी बातचीत को स्टेनोटाइपिस्ट की तरह उन्होंने कागज पर उतार दिया है. नाटक लिखते समय समर्पण का ऐसा अनुभव फिर कभी महसूस नहीं किया.
वर्ष 1963 में वे ऑक्सफॉर्ड यूनियन के प्रेसिडेंट बने थे. सात साल ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में काम करने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और लिखने को ही पूरा समय देने लगे. मद्रास में थियेटर ग्रुप ‘द मद्रास प्लेयर’ के साथ नाटकों में हिस्सा लिया और इस तरह नाटक लिखने का सफर शुरू हुआ. जब वे फिल्म की ओर मुड़े तो यहां भी श्रेष्ठता के साथ शीर्ष पर ही रहे.
यूआर अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘सम्सकारा’ से 1970 में उन्होंने सिने जगत में प्रवेश किया. फिल्म में अभिनय के लिए उन्हें कन्नड़ सिनेमा के लिए ‘प्रेसिडेंट्स गोल्डन लोटस अवॉर्ड’ भी मिला. 1970 में आई कन्नड फिल्म ‘संस्कार’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. गिरीश कर्नाड इस फिल्म के पटकथा लेखक और अभिनेता थे. वर्ष 1971 में उन्हें फिल्म ‘वंशवृक्ष’ के लिए श्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला. यह फिल्म गिरीश कर्नाड और प्रख्यात रंगकर्मी बव कारंत ने निर्देशित की थी.
1970 के ही दशक में गिरीश कर्नाड ने हिंदी सिनेमा में अपने यश को सिद्ध किया. श्याम बेनेगल की ‘निशांत’ और ‘मंथन’ तथा बासु चटर्जी की ‘स्वामी’ में उनका अभिनय मील का पत्थर सिद्ध हुआ. 1986-87 में आरके नारायण के प्रसिद्ध ‘मालगुडी डेज’ पर आधारित टीवी सीरीज से वे घर-घर में पहुंच गए. 1990 में दूरदर्शन की साइंस मैगजीन ‘टर्निंग प्वाइंट’ को होस्ट करते देखना अलग अनुभव था. 1984 में हिंदी फिल्म ‘उत्सव’ का निर्देशन उनका बड़ा कार्य माना जाता है. समीक्षकों ने इस फिल्म की दिल खोलकर प्रशंसा की. उत्सव चौथी शताब्दी के संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिका’ का रूपांतरण था. यह फिल्म लता मंगेशकर और आशा भोंसले के गीत ‘मन क्यूं बहका रे बहका आधी रात को’ के साथ ही निर्देशकीय कौशल के कारण चर्चित हुई थी. ‘पुकार’, ‘इकबाल’, ‘डोर’ से लेकर ‘एक था टाइगर’ जैसी 90 से अधिक हिंदी व कन्नड़ फिल्मों अभिनय करने वाले गिरीश कर्नाड ने अनेक फिल्मों और वृत्त-चित्रों का निर्माण भी किया था.
गिरीश कर्नाड 1974-75 के दौरान पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान के निदेशक रहे और आपातकाल के दौरान ही यह पद छोड़ भी दिया. यह पद छोड़ना विचारों की कट्टरता के प्रति उनके विरोध को दर्शाता है. फिल्म ‘उत्सव’ का निर्देशन अपने आप में कहानी है. 1998 में भारतीय साहित्य का सबसे प्रतिष्ठित ‘भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिलना उनकी साहित्यिक श्रेष्ठता का साक्ष्य है. वे कर्नाटक नाट्य अकादमी के अध्यक्ष (1976-78), संगीत नाटक अकादमी (1988-1993) के पदाधिकारी नेहरू सेंटर, लंदन के निदेशक (2000-2003) रहे थे.
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FIRST PUBLISHED : June 10, 2023, 20:41 IST








