
ख्वाजा अहमद अब्बास एक साहित्यकार, पत्रकार, फिल्म निर्देशक और निर्माता थे. अपने रचनाकाल में उन्होंने 70 से अधिक किताबें लिखीं और 40 से अधिक फिल्मों में निर्माता-निर्देशक के तौर पर अपना योगदान दिया. बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को फिल्मों में पहला ब्रेक देने वाले ख्वाजा अहमद अब्बास ही थे. उन्होंने अपनी फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ में अमिताभ बच्चन को साइन किया था.
ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को पानीपत के मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के परिवार में हुआ था. राजकमल प्रकाशन से ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानियों और साक्षात्कार पर एक किताब प्रकाशित हुई है- ‘मुझे कुछ कहना है‘. इस पुस्तक में कहानी और अन्य रचनाओं का संकलन किया है डॉ. जोया ज़ैदी ने. जोया ज़ैदी भी प्रसिद्ध मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली के वंश से ताल्लुक रखती हैं.
‘मुझे कुछ कहना है’ पुस्तक में ख्वाजा अहमद अब्बास में एक लंबा साक्षात्कार है और इस साक्षात्कार को लिया था उनके दोस्त तथा मशहूर कथाकार कृश्न चंदर ने. प्रस्तुत है इस बातचीत के चुनिंदा अंश-
कृश्न चंदर- अपनी जन्मतिथि याद है? मेरा मतलब साहित्यिक जन्मतिथि से है.
अब्बास- यो तो मैं अपने जन्म से बहुत पहले पैदा हो गया था, लेकिन…
कृश्न चंदर- जन्म से पहले…कैसे?
अब्बास – मेरा अभिप्राय साहित्य, शिक्षा और संस्कृति के उत्तराधिकार से है, जो मेरे पैदा होने से पहले मेरे यहां वर्तमान था. हाली की शायरी में मेरा जन्म हुआ, किताबों-पत्रिकाओं में पला और बढ़ा. तुम मुझे सही मायनों में किताबों का कीड़ा कह सकते हो. ननिहाल हाली का खानदान था. चचा ख़्वाजा गुलाम-उस-सकलैन वकील राजनीति और साहित्य के रसिया थे. हाली के बेटे ख़्वाजा सज्जाद हुसैन, अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के पहले मुस्लिम ग्रेजुएट, मेरे नाना थे. घर की औरतें ‘तहज़ीबे निसवां’ (उर्दू की एक मासिक पत्रिका) में बाक़ायदा लिखती थीं.
कृश्न चंदर- लेकिन सब कुछ उत्तराधिकार ही तो नहीं है. आदमी सब कुछ उत्तराधिकार ही से तो नहीं बनता. उसके विकास में बहुत से तत्त्व काम करते हैं.
अब्बास- मुझे खेलों का मुझे भी बहुत शौक़ था. फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, टेनिस-सब खेल मैंने खेले, लेकिन किसी में सफलता न मिली. इस चीज़ का मुझे बहुत मलाल रहा. अर्से तक यह बात दिल में खटकती रही कि मैं एक बड़ा स्पोर्ट्समैन बनना चाहता था, लेकिन न बन सका. दरअसल मेरा छोटा क़द और मेरा सन्दिग्ध क़िस्म का स्वास्थ्य (मुझे हमेशा नज़ले की शिकायत रही) मेरे मन में एक तरह का हीन भाव पैदा करने का कारण बने और मैंने सोचा कि अगर मैं खेलों के मैदान में सफल नहीं हो सका, तो मुझे जीवन के किसी दूसरे क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी चाहिए. फिर मैंने देखा कि जो लोग अच्छा बोल लेते हैं, अच्छी बहस कर लेते हैं, उनकी बड़ी आवभगत होती है. स्कूल के वाद-विवादों में, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के मुक़ाबलों में मैंने भाषण कला में बड़ी सफलता पाई. और तुम जानते हो, अच्छा बोलने का अच्छे लिखने से कितना गहरा सम्बन्ध है. यही विचार मुझे साहित्य के मैदान में खींच लाया. कई बार सोचता हूं, यदि मैं खेलों के मैदान में सफल हो जाता, तो मर्चेंट या मुश्ताक़ की तरह एक सफल खिलाड़ी होता.
कृश्न चंदर- मेरा वह पहला सवाल तो बीच ही में रह गया. तुम साहित्य-क्षेत्र में कब आए?
अब्बास- उन्नीस सौ पैंतीस में. बम्बई में एक कहानी लिखी थी- ‘अबाबील’ और वह जिसे कहते हैं—एक रात में मशहूर हो जाना. बस, यों समझो कि मैं एक कहानी लिखकर मशहूर हो गया. उसका अनुवाद संसार की लगभग सभी सभ्य भाषाओं में हो चुका है. अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी इत्यादि-इत्यादि. जर्मन भाषा में संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानियों का एक संकलन छपा है. उसमें वह कहानी शामिल की गई. इसी तरह डॉक्टर मुल्कराज आनन्द और इकबाल सिंह ने जो संकलन किया है, उसमें भी वह कहानी शामिल है.
कृश्न चंदर- उस कहानी का विषय क्या है? माफ़ करना, मैंने उसे नहीं पढ़ा.
अब्बास- वह एक जालिम किसान के जीवन से सम्बन्ध रखती है.
कृश्न चंदर- तुम्हें किसानों के जीवन के बारे में क्या मालूम है?
अब्बास- अजीब बात है कि वह कहानी लिखते समय किसानों के बारे में मेरा ज्ञान नहीं के बराबर था. कारण, उनके जीवन सम्बन्धी मेरा व्यक्तिगत अनुभव बहुत कम था. शून्य ही समझो, इसलिए कि मैं आज तक गांव में नहीं रहा. किसानों के जीवन से बिलकुल अनभिज्ञ हूं, परन्तु वह कहानी न केवल राष्ट्रीय दृष्टि से, बल्कि अन्तरराष्ट्रीय साहित्य की दृष्टि से भी बहुत उच्च कोटि की समझी जाती है.
कृश्न चंदर- यह कैसे हो सकता है कि तुम्हें किसानों के जीवन के बारे में कुछ ज्ञान न हो और तुम उनके सम्बन्ध में इतनी अच्छी कहानी लिख सको?
अब्बास – यह तो मैं नहीं कह सकता कि मुझे किसानों के बारे में कुछ भी मालूम न था. व्यक्तिगत रूप से मैंने उन्हें देखा और जाना न था, लेकिन घर के राजनीतिक वाद-विवाद में और बाहर की दुनिया में किसानों की चर्चा अक्सर होती रहती थी. राजनीति और अर्थशास्त्र की पुस्तकें पढ़कर भी उनकी दरिद्रता से परिचित हो चुका था. अलीगढ़ में हर इतवार हम एक ही विचार के कुछ विद्यार्थी ‘सोशल सर्विस’ के बहाने देहात में पहुंच जाया करते थे और वहां किसानों के जीवन का अध्ययन करने का प्रयास करते थे.
कृश्न चंदर- तुमने अपने ननिहाल के बारे में तो सुनाया, लेकिन ददिहाल के बारे में कुछ नहीं बताया.
अब्बास – मेरे दादा किसान थे.
कृश्न चंदर- देखो, अब ‘अबाबील’ पकड़ी गई! कहां जाकर इसने घोंसला बनाया!
अब्बास- अजीब बात है… अब मुझे याद आ रहा है कि मेरे दादा किसान थे. पर वे अपने वंश को आगे बढ़ते, तरक्की करते हुए देखना चाहते थे. लेकिन खेती में नहीं, व्यापार में. उन दिनों, तुम जानते हो, खासतौर पर मुसलमान व्यापार में बहुत पीछे थे. मेरे दादा ने कपड़े की दुकान खोली, पर उन्हें व्यापार नहीं फला. कुछ ही दिनों में दादा के दोस्त और रिश्तेदार दुकान का सारा कपड़ा उधार ले गए और उन्हें दुकान बंद कर देनी पड़ी. फिर उन्होंने अपने लड़कों की शिक्षा पर ध्यान दिया. जमीन की पैदावार से तो वे अपने बच्चों को पढ़ा नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने जमीन का एक-तिहाई टुकड़ा बेचा और अपने एक लड़के को पढ़ाया. फिर दुकान बेची और दूसरे लड़के को पढ़ाया. बेटे पढ़ गए और जमीन खत्म हो गई. इसलिए जब मेरे दादा मरे, तो मेरे पिता को उत्तराधिकार में एक टुकड़ा भी न मिला.
कृश्न चंदर- तुमने कभी प्रेम किया है?
अब्बास- हां.
कृश्न चंदर- शादी से पहले या शादी के बाद? डरो नहीं… तुम्हारी बीवी यहां मौजूद नहीं, इसलिए साफ-साफ बता सकते हो.
अब्बास- बीवी से मैं डरता नहीं, न मेरी बीवी मुझसे डरती है. हम दोनों एक- दूसरे के बहुत गहरे दोस्त और साथी हैं. वह मेरे सारे भेद जानती है. उसे मेरे उस प्रेम का भी पता है, जो शादी से बहुत पहले की बात है. असल में उस प्रेम की असफलता ने ही मुझसे ‘अबाबील’ के बाद दो और कहानियां लिखवाईं- ‘फैसला’ और ‘एक ‘लड़की’. और ये दोनों कहानियां ‘ग़मे-जानां’ के दो विभिन्न पहलुओं का खाका खींचती हैं. ‘फैसला’ में मैं बहुत भावुक हो गया हूं, लेकिन ‘एक लड़की’ में उस प्रेम को हास्य द्वारा जीतने और उस पर काबू पाने की कोशिश करता हूं.
कृश्न चंदर- यानी जिन्दगी प्रेम पर भी हावी है?
अब्बास- कुछ समझ लो. परन्तु मेरा यह प्रेम बड़ा अजीब-सा प्रेम था. वह बेहद हसीन थी. साहित्यिक अभिरूचि रखती थी. हम लोग घंटों पास बैठे बातें करते रहते. पर तुम विश्वास न करोगे, मैंने उसे कभी हाथ से भी नहीं हुआ. कभी प्रेम का एक शब्द भी मुंह पर नहीं लाया.
कृश्न चंदर- फिर शादी क्यों न हो सकी?
अब्बास- शायद उसके खानदानवाले न चाहते थे. और मेरे खानदानवाले तो बहुत ही खिलाफ थे. लेकिन इस विरोध से भी ज्यादा दिलचस्प पहलू यह है कि अपने प्रेम की असफलता का बोझ सीने पर लिये हुए जब मैं आखिरी बार उससे मिलकर घर लौट रहा था, तो रास्ते में मौत के एक अजीब से एहसास ने मुझे घेर लिया. मेरा दम घुटने लगा और मुझे महसूस हुआ कि मैं अभी-अभी रास्ते ही में मर जाऊंगा. लेकिन जब मैं रेलवे स्टेशन पर पहुंचा और लोगों की भीड़-भाड़ देखी, तो स्टेशन की उस चहल-पहल में मेरा वह मूड खत्म हो गया. उसकी शादी के आठ-दस वर्ष बाद फिर उससे अचानक मेरी भेंट हो गई तो उससे बिछुड़ते समय फिर बड़ी तीव्रता से मुझे ऐसा लगा मानो मेरा दम घुटा जा रहा है, सांस रुकी जा रही है! या तो मेरा सीना फट जाएगा या हृदय की गति रुक जाएगी. यह अजीब तरह की शारीरिक अनुभूति थी, जो फिर उसके घर से बाजार तक आते आते रास्ते की चहल-पहल में आप से आप खो गई. इसी अनुभूति को मैंने एक अप्रकाशित उपन्यास में यो बयान किया है.
कृश्न चंदर- प्रेम कहानियों के विषय में तुम्हारा क्या खयाल है? क्या प्रेम कहानियों का, जिन्हें कुछ लोग भूल से रूमानी कहानियां कहकर पुकारते हैं, प्रगतिशील साहित्य में कोई स्थान है?
अब्बास- प्रेम जीवन और सामाजिक यथार्थ का एक आवश्यक अंग है. प्रायः प्रेम की कटुता सारे जीवन को कटु बना देती है. यदि उस कटुता को उचित ढंग से दूर न किया जाए तो कभी-कभी बड़े बुरे परिणाम निकलते हैं. इसलिए उपादेय साहित्य में हमेशा प्रेम कहानियों की जगह रहेगी. लेकिन मैं ऐसी रूमानी कहानियों को पसन्द नहीं करता, जिनमें रूमान के परदे में पलायन छिपा हुआ हो.
कृश्न चंदर- कभी-कभी प्रेम की कटुता जीवनभर मजा देती है.
अब्बास- हां, अगर यह तीर तीरे नीम-कश (आधी दूर तक खींचा गया तीर, उर्दू में कवि निगाह को भी नीम कहते हैं) हो.
कृश्न चंदर- और जिगर के पार न हो. इस कटुता की तीव्र भावना की धारा यदि दूसरी ओर मोड़ दी जाए और जीवन पर आक्रमण करने के बदले यह मृत्यु पर बाज़ बनकर झपटे…
अब्बास- तो ठीक है. नहीं तो यह रोग आदमी को फ़ानी (निराशावादी) बना देता है. मुझे इस पर हंगरी की एक कहानी याद आती है. एक आदमी को बड़ी प्यास लगी थी और यह प्यास किसी तरह न बुझती थी. किसी ने कहा, पानी पी लो. परन्तु प्यासे की प्यास किसी तरह न बुझी. फिर किसी ने एक शर्बत बताया, किन्तु प्यास फिर भी न बुझी. फिर किसी ने कहा, शराब पियो, लेकिन प्यासे की प्यास शराब पीकर भी न बुझी. फिर किसी ने कहा, खून पियो. प्यासे ने एक आदमी को क़त्ल किया और उसका खून पिया. उसकी प्यास अब भी न बुझी. आखिर जब उसे फांसी पर चढ़ाया जा रहा था, उस समय फांसी के तख्ते पर एकाएक उसे याद आया कि एक बार जब वह बहुत छोटा-सा था और मां की छाती से लगा दूध पी रहा था, किसी ने उसे ज़ोर से झटककर मां की छाती से अलग कर लिया था और तब से वह प्यासा था मानो उसकी जो ख़ूनी प्यास थी, वह अपने प्रथम रूप में मां के दूध की प्यास थी…
कृश्न चंदर- इसी तरह मैं सोचता हूं कि प्रेम की प्यास भी बड़ी खतरनाक हो सकती है.
अब्बास- यदि मैं इन सारे तत्त्वों को इकट्ठा करूं जिन्होंने मेरी साहित्यिक रुचि को एक रूप दिया, तो मैं उन्हें क्रमानुसार यों रखूंगा- 1. घर का साहित्यिक और सांस्कृतिक वातावरण, 2. राष्ट्र प्रेम की भावना, जो सारे देश में राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में उभरी, 3. अस्वास्थ्य और 4. प्रेम में असफलता.
कृश्न चंदर- बहुत से साहित्यिकार कम या ज्यादा इन्हीं रास्तों से साहित्य क्षेत्र में आए हैं. अच्छा, अब यह बताओ, तुमने प्रेमचंदको कब पढ़ा था?
अब्बास- मैंने प्रेमचंद को बाद में पढ़ा. वास्तव में मैंने प्रेमचंद को कॉलेज में पढ़ा. लेकिन शुरू-शुरू में प्रेमचंद की कहानियों का कोई विशेष प्रभाव मुझ पर नहीं पड़ा. हां, उनकी कहानियों की अपेक्षा उनके उपन्यासों को मैंने अधिक पसन्द किया था. वह भी बहुत बाद में.
कृश्न चंदर- बाद में प्रेमचंद से तुमने क्या पाया?
अब्बास- बाद में प्रेमचंद को पढ़कर मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं जिन्दगी में पहली बार अपने देहात की जनता से मिल रहा हूं, इसके साथ ही प्रेमचंद के उपन्यासों में मुझे अपने देश के राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रतिबिम्ब और उसकी सफलता का उन्न्वल भविष्य दिखाई दिया.
कृश्न चंदर- टैगोर से प्रभावित हुए?
अब्बास- नहीं. मैं वास्तव में कवियों की अपेक्षा गद्य-लेखकों से अधिक प्रभावित होता हूं. मुझे कुछ ऐसा लगता है कि कवियों में आन्तरिकता जरूरत से अधिक पाई जाती है, इसलिए मैं टैगोर से अधिक प्रभावित नहीं हो सका.
कृश्न चंदर- पश्चिमी लेखकों में किस-किसको चाव से पढ़ा?
अब्बास- हार्डी को, शॉ को, फिर मोपासां को. कथाकारों में- ओ. हेनरी और समरसेट मॉम को, जो वास्तव में मोपासां ही की छाया हैं.
कृश्न चंदर- अमेरिकी लेखकों में?
अब्बास- अमेरिकी लेखकों में ‘डॉस पास्को’ की कला से मैंने सीखा है. स्टाइनबैक और हैमिंग्वे को भी बड़े ध्यान से पढ़ा है, लेकिन विषयवस्तु के विचार से थ्योडार ड्रेगर बहुत अच्छे लगे.
कृश्न चंदर- रूसी साहित्यिकों में से तुम्हें कौन सबसे अधिक पसन्द है?
अब्बास- चेखव और गोर्की.
कृश्न चंदर- और आधुनिक सोवियत लेखकों में?
अब्बास- आधुनिक सोवियत लेखकों में… वास्तव में मैंने नए सोवियत लेखकों को बहुत कम पढ़ा है. और जो पढ़ा है, वह भी मुज्जी (मिसेज़ अब्बास) के उकसाने से, लेकिन मैं नहीं समझता कि नए सोवियत साहित्य में अब कोई भी गोर्की के समान महान है.
कृश्न चंदर- तुम्हारे विचार में क्या साहित्य में राजनीति का दखल होना चाहिए?
अब्बास- इसके बिना साहित्य का निर्माण असम्भव है. हर चीज़ कहानी का विषय हो सकती है— चाहे वह आर्थिक हो या राजनीतिक, भौगोलिक हो या यौनिक. कहानी का विषय कुछ भी हो सकता है, लेकिन शर्त यह है कि पढ़ने में रोचक हो और इनसानियत से खाली न हो.
कृश्न चंदर- और कथानक के बारे में तुम्हारा क्या विचार है?
अब्बास- मैं तकनीक और कथानक के बिना किसी कहानी की कल्पना ही नहीं कर सकता. वास्तव में तकनीक और प्लॉट हर कहानी में होते हैं, लेकिन किसी में गठकर आते हैं और किसी में बड़े भद्दे, ढीले-ढाले और बेडौल मालूम होते हैं. यों समझो कि सामग्री कहानी का शरीर है और तकनीक उसका लिवास. कभी यह लिवास चुस्त फिट मालूम होता है, कभी अनफिट और ढीला-ढाला.
कृश्न चंदर- क्या लेखक का अपना चरित्र और उसका ‘मैं’ तथा उसकी अनुभूतियां और विचार साहित्य में स्थान पाने के अधिकारी हैं?
अब्बास- ‘साहित्य’ साहित्यकार से अलग होकर कैसे पैदा हो सकता है? साहित्य एक साहित्यकार के व्यक्तित्व, उसके विचारों, भावों और अनुभूतियों की सृष्टि होता है और उससे बाहर नहीं जा सकता.
कृश्न चंदर- इसलिए स्पष्ट ही उस ‘साहित्य’ की जोरदार अभिव्यक्ति में, उसके शब्दों के सुन्दर चुनाव में, उसकी कल्पनामयता और प्रवहमानता में उस साहित्यिक का निजत्व झलकेगा. उसके पात्रों के निर्माण और उनके काल्पनिक व्यक्तित्व में उसके अपने व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और अनुभूतियों का प्रतिबिम्ब दिखाई देगा.
अब्बास- हां, यह अनिवार्य है. पर यह भी जरूरी है- खासकर कहानियों और उपन्यासों में- कि यह जीवनी की किस्म का प्रभाव इतना न बढ़ जाए कि हर साहित्यिक कृति लेखक का जीवन-चरित्र मालूम हो. जीवनी को भी साहित्य का दर्जा प्राप्त होता है, किन्तु प्रत्येक साहित्यिक रचना जीवनी नहीं बन सकती. ‘आप बीती’ यदि ‘जग बोती’ भी मालूम हो तो मजा बढ़ जाता है.
कृश्न चंदर- दूसरे शब्दों में, आप अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को उस हद तक उपन्यास और कहानियों का विषय बना सकते हैं, जहां तक वे सामाजिक यथार्थ के अनुकूल हों.
अब्बास- हां, और दूसरी बात यह है कि एक लेखक को अपने पात्रों में अपने आपको व्यक्त करते हुए भी उनसे अलग-थलग रहना चाहिए, जैसे एक डॉक्टर अपने रोगियों से सहानुभूति रखता हुआ भी उनसे अलग रहता है. उसे डॉक्टर रहना चाहिए, स्वयं रोगी न बनना चाहिए. जैसे बहुत-से कथाकार अपने साहित्य में व्यक्त यौन सम्बन्धों में अपनी वासना की भूख मिटाने लगते हैं.
कृश्न चंदर- योनि से रचना और रचना से रचयिता याद आया। ख़ुदा के बारे में तुम्हारा क्या विचार है?
अब्बास- ख़ुदा और शैतान के बारे में मेरी कल्पना उस तरह की नहीं है जिस तरह बहुत-से लोग सोचते हैं. हां, मैं ख़ुदाई और शैतनत, नेकी और बदी, उन्नति और अवनति के सिलसिले में विश्वास रखता हूं. मेरा मन एक ऐसी नैतिक व्यवस्था को पसन्द करता है जिसमें इनसान इनसान के लिए सच्ची खुशी लाए.
कृश्न चंदर- मगर मैं इनसान की उस कल्पना के बारे में पूछ रहा हूं, जो ख़ुदा को अकेला (एको ब्रह्मद्वितीयो नास्ति) मानती है- यानी एक ऐसी अकेली सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक हस्ती जो इस संस्कृति की व्यवस्था और उसके कार्य-कारण के सिलसिले की उत्तरदायी हो सकती हैं.
अब्बास अहमद -असल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हमारा ज्ञान इस सारे ब्रह्मांड और उसके प्राकृतिक परिवर्तनों के बारे में इतना सीमित है कि अभी ऐसी हस्ती का अन्दाजा नहीं किया जा सकता. तुम यों कह सकते हो कि मैं ख़ुदा की हस्ती से इनकार नहीं करता, उसमें सन्देह जरूर करता है. बुद्धिवादी हैं और इनसान ने साइंस के क्षेत्र में खोज करके जो पाया है, उसमें विश्वास रखता हूं.
.
Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 07, 2023, 18:33 IST








