World environment day : 150 वर्षों से धरती पर नहीं उग रहा यह पेड़, कारण बना विलुप्त हो चुकी यह पक्षी

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आशीष कुमार/पश्चिम चम्पारण. इस सृष्टि में हर वस्तु का कनेक्शन किसी न किसी चीज से होता है. हर एक वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर आश्रित होती है. ऐसे में किसी एक चीज का दोहन उसके साथ-साथ दूसरे वस्तु की विलुप्ति का भी कारण बन जाती है. कुछ ऐसा ही धरती पर सदियों से होता चला आ रहा है. फिलहाल हम आपको ऐसे ही एक सबसे ताजा मामले के बारे में बताने जा रहे हैं, जो 16 वीं शताब्दी के अंत तक विलुप्त करार दे दिया गया तथा इसका असर मॉरीशस में पाए जाने वाले एक विशेष पेड़ तम्बलकोक पर पड़ा. आज यह पेड़ भी धीरे धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंचते जा रही है.

1640 में विलुप्त हुआ डोडो
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वात्सल्य एनजीओ की तरफ से बैरिया प्रखंड के सरैयामन पक्षी विहार में स्कूली छात्रों को विशेष जानकारी देने के लिए प्रकृति की पाठशाला कार्यक्रम का आयोजन किया गया. जिसमें कुछ शिक्षक एवं शिक्षिकाओं सहित कुल 25 स्कूली बच्चों ने भाग लिया. खास बात यह है कि इसका नेतृत्व सरैयामन के प्रभारी डीएफओ प्रद्युम्न गौरव ने किया.

बच्चों को जंगल के इको सिस्टम के बारे में विशेष जानकारी देते हुए डीएफओ प्रद्युम्न गौरव ने धरती से विलुप्त हो चुके डोडो पक्षी की चर्चा की. डीएफओ ने बताया कि अत्यधिक शिकार होने की वजह से सन 1640 में यह पक्षी पूरी तरह से विलुप्त हो गई. चौंकाने वाली बात यह है कि इसका असर मॉरीशस के जंगलों में पाए जाने वाले एक खास पेड़ पर पड़ा.

धरती पर तम्बलकोक के पेड़ का उत्सर्जन हुआ बंद
डीएफओ ने बताया कि तम्बलकोक पेड़ पर हुए रिसर्च में यह पता चला कि वे सभी पेड़ डोडो पक्षी के समकालीन ही हैं. वर्तमान में उत्सर्जित इन पेड़ों की संख्या नगण्य है. ऐसे में रिसर्चर्स ने डोडो एवं तम्बलकोक के पेड़ को एक-दूसरे से लिंक कर स्टडी की. इसके बाद इस बात का खुलासा किया कि इस खास पेड़ के उत्सर्जन में डोडो की अहम भूमिका है.

दरअसल, डोडो का मुख्य आहार तम्बलकोक के पेड़ से मिलने वाले नट थे. इस नट का खोल बेहद कठोर होता था, बावजूद इसके डोडो इसे तोड़कर खाते थे. अपशिष्ट के जमीन पर गिरने के बाद यह शेल अंकुरित होता था, जिससे मॉरीशस की पहचान कहे जाने वाले तम्बलकोक पेड़ का उत्सर्जन होता था. डोडो के विलुप्त हो जाने के बाद अब इस पेड़ का उत्सर्जन भी नगण्य हो चुका है. अनुमान लगाया जा रहा है कि कुछ समय के बाद शायद यह भी विलुप्त की श्रेणी में शामिल हो जाए.

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FIRST PUBLISHED : June 05, 2023, 21:27 IST

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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