
मुनीर नियाज़ी की शायरी पढ़ते हुए पाठक को मासूमियत, शांति और नर्मता का अहसास होता है. उनकी रचनाओं में विद्रोह, हंगामा या किसी तरह का शोर सुनाई नहीं देता. मुनीर नियाजी के उर्दू में 11 पंजाबी में 8 संकलन प्रकाशित हुए हैं. इनमें ‘तेज हवा और फूल’, ‘पहली बात ही आखिरी थी’, ‘एक दुआ जो मैं भूल गया था’ आदि शामिल हैं. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएं-
जिंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या
दुनिया में खामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या।
हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने,
एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या।
अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिये वहां,
शाम आ गई है लौट के घर जाए हम तो क्या।
दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र,
दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाए हम तो क्या।
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फूल थे बादल भी था, और वो हसीं सूरत भी थी
दिल में लेकिन और ही इक शक्ल की हसरत भी थी।
जो हवा में घर बनाया काश कोई देखता
दस्त में रहते थे पर तामीर की हसरत भी थी।
कह गया मैं सामने उसके जो दिल का मुद्दआ
कुछ तो मौसम भी अजब था, कुछ मेरी हिम्मत भी थी।
अजनबी शहरों में रहते उम्र सारी कट गई
गो ज़रा से फासले पर घर की हर राहत भी थी।
क्या क़यामत है ‘मुनीर’ अब याद भी आते नहीं
वो पुराने आशना जिनसे हमें उल्फत भी थी।
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गम का वो जोर अब मेरे अंदर नहीं रहा
इस उम्र में मैं इतना समर्वर नहीं रहा।
इस घर में जो कशिश थी गई उन दिनों के साथ
इस घर का साया अब मेरे सर पर नहीं रहा।
वो हुस्न-ए-नौबहार अबद शौक़ जिस्म सुन
रहना था उस को साथ मेरे पर नहीं रहा
मुझ में ही कुछ कमी थी कि बेहतर मैं उन से था
मैं शहर में किसी के बराबर नहीं रहा
रहबर को उन के हाल की हो किस तरह ख़बर
लोगों के दरमियां वो आकर नहीं रहा
वापस न जा वहां कि तेरे शहर में ‘मुनिर’
जो जिस जगह पे था वो वहां पर नहीं रहा।
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मुनीर नियाज़ी का असली नाम मुनीर अहमद था. उनका गीत-गज़ल कहने का अंदाज एकदम निराला था. मुशायरों में उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे. मुनीर नियाजी को मार्च 2005 में ‘सितार-ए-इम्तियाज’ सम्मान से सम्मानित किया गया.
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FIRST PUBLISHED : June 05, 2023, 19:02 IST








