AI और मशीनों के जमाने में सीवर में उतरने की मजबूरी

Share Now:

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें



हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जमाने में पहुंच गए हैं, जहां कुछ सेकंड में अपनी मनचाही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. हम ऐसे वक्त में हैं, जहां पर झाड़ू लगाने से लेकर रोटी बनाने तक किस्म-किस्म की मशीनें आ रही हैं. घरेलू से लेकर बड़े कारखानों तक में मशीनीकरण ने काम को आसान और सुरक्षित बनाया, (हालांकि रोजगार के मौके कम होने की आलोचना तो खैर है ही) पर ऐसे जमाने में जब कहीं से ऐसी खबरें आती हैं कि किसी गटर को साफ करते हुए जहरीली गैस ने कई लोगों की जान ले ली तो मन में पहला सवाल तो यही आता है कि क्या यह काम सुरक्षित तरीके से नहीं हो सकता था? क्या कोई सस्ती तकनीक अथवा मशीन ईजाद नहीं की जा सकती हैं, जो भारत के हर गांव-कस्बों में आम लोगों को सुलभ हो और उनके होते हुए किसी को मैले (सीवर) में नहीं उतरना पड़े!

कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में फिर एक बड़ा हादसा हुआ. बहोरा रामनगर गांव निवासी नंदू कुशवाहा चौक पड़े शौचालय की टंकी को साफ करने खुद ही उतर गए. टंकी की सफाई के दौरान वे जहरीली गैस की चपेट में आकर बेहोश हो गए. कुछ देर बाद जब परिजनों ने आवाज दी तो कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद एक-एक कर 5 लोग और आपाधापी में टंकी के अंदर घुस गए. टंकी में मौजूद जहरीली गैस ने कोई रहम नहीं किया, नतीजा सभी बेहोश हो गए. आपसपास के लोगों को पता चला तो कड़ी मशक्कत के बाद सभी को टंकी से बाहर निकाला. पर चार लोगों की जान चली गई. बाद में मुख्यमंत्री विवेकाधीन राहत कोष से 4-4 लाख रुपए देने की घोषणा की गई, लेकिन किसी जान की कीमत किसी राशि से भला अदा की जा सकती है? होना तो यह चाहिए कि व्यवस्थाएं ही ऐसी बनें, जिससे ऐसे कामों में किसी की जान का जोखिम न होना पड़े.

[blurb]हमने बचपन में अपने गांव में देखा है कि कैसे कच्चे शौचालयों से मेहतरानी गांव भर का मैला उठाकर अपने सिर या अपने बाजू पर उठाकर सफाई का काम किया करती थीं. उन दृश्यों की अब कल्पना भी करते हैं तो एक अपराधबोध से भर जाते हैं, लेकिन यह सत्य है कि ऐसा होते हुए हमने अपनी आंखों से देखा है. 2011 की जनगणना में देश में 7.4 लाख घर ऐसे बताए गए थे, जहां पर शौचालयों की सफाई मनुष्यों के द्वारा हो रही थी.[/blurb]

बीते दस बारह सालों में हालात और सुधरे होंगे, और उम्मीद करते हैं कि इन सात लाख घरों में अब ऐसा नहीं होता होगा, शौचालयों के निर्माण ने भारत के इस कलंक से बहुत हद तक मुक्ति दिलाई है, लेकिन नए किस्म के शौचालयों का कचरा एक नया संकट बनकर सामने खड़ा हुआ है और यह भी तकरीबन उतना ही भयावह है जितना कि सिर पर मैला उठाना. इस मसले पर एक अलहदा किताब सोपान जोशी ने लिखी है जल थल मल. इस किताब में भारत में मैले को ठिकाने लगाने के अलग-अलग तौर तरीकों को भी सामने लाया गया है.

लेखक कहते हैं कि पहले लोग हाथ से मैला उठाकर सिर पर ढोते थे, अब इन नालियों को साफ करने के लिए लोगों को मैले में खुद उतरना पड़ता है. देश में जब मैला उठाने के लिए तमाम कानून बने हैं तब यह स्थिति गंभीर है, ऐसे में हर साल बीसियों लोगों का हर शहर में अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है. यह इस समय का एक और संकट बनता जा रहा है. सचमुच इस संकट की खबरें हमें हर दो चार महीनों में कहीं न कहीं से पढ़ने को मिल जाया करती हैं.

[blurb]आखिर लोग क्यों यह छोटी सी बात नहीं जानते हैं कि सीवर में जब कचरा अटक जाता है और पानी की निकासी रुक जाती है तो वहां हाइड्रोजन सल्फाइड नाम की गैस बनने लगती है. यह बहुत खतरनाक होती है. सीवर में यदि यह गैस है और कोई भी व्यक्ति या सफाईकर्मी बिना पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के चैंबर में उतर गए तो यह कुछ ही पलों में दम घोटकर आदमी को मार देती है. जाहिर है सीवेज साफ करने के काम को हमारे यहां ठेका मजदूर, दिहाड़ी ही करते हैं. वे न तो अपने लिए ऐसे सुरक्षा के इंतजाम कर पाते हैं और न ही कोई व्यवस्थित काम होने से स्थानीय निकाय ध्यान देते हैं.[/blurb]

यदि आपको कभी इनको देखने का मौका मिला हो तो इनके पास उपकरण के नाम पर एक लंबा सा मोटा तार होता है, जिसके सहारे यह चोक पड़ी नालियों को खोलने का काम करते हैं. जहां कहीं भी चैंबर को खाली करना हो तो भी पर्याप्त व्यवस्थाएं नहीं होती हैं. इसका एक विकल्प मशीनी व्यवस्था है, जो पाइप से खींचकर टैंक को साफ कर देती है, लेकिन यह मशीनें जरूरत के हिसाब से हैं ही नहीं. इसलिए देश में अब भी तकरीबन दस लाख सफाईकर्मी सीवेज से संबंधित सफाई कार्य में लगे हैं.

होना यह चाहिए कि सीवेज की सफाई पर भी सेनेटरी इंस्पेक्टर इससे संबंधित सुरक्षा मानकों का पालन करवाने के लिए पूरा ध्यान रखें और इसके लिए ऐसे जोखिम का काम करवाने वाले लोगों की भी जवाबदेही तय हो. मैला उठाने से संबंधित 2013 में बनाए गए कानून का भी कठोरता से पालन करवाना चाहिए. राष्ट्रीय गरिमा अभियान के एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि 2013 में बनाए गए कानून का पालन पूरी तरफ से नहीं हो पा रहा है.

Source link

Up Head Line
Author: Up Head Line

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें