नई संसद भवन के उद्घाटन के समय में सेंगोल या राजदंड की विधि विधान से पूजन कर स्थापना की थी. इस अनुष्ठान को तमिलनाडु के अलग अलग मठो से आए संतों ने पूरा किया था जिन्हें अधीनम कहते हैं. अधीनम संतों ने सेंगोल समारोह की पारंपरिक विधि से सम्पन्न किया और स्पीकर के आसन के पास इसकी स्थापना की. आखिर इस खास समारोह के अनुष्ठान के लिए तमिलनाडु के अधीनम संतों को ही क्यों ही बुलाया है, उनका सेंगोल से क्या नाता है और तमिलनाडु में उनकी क्या और किस तरह की हैसियत या प्रभाव है. ऐसे कई सवाल है जो आपस में जुड़ हुए हैं और सेंगोल की स्थापना को समझने के लिए इन सवालों के जवाब जानना भी जरूरी है.
कौन हैं तमिलनाडु के ये ब्राह्मण?
अधीनम तमिलनाडु में बहुत प्रभावशाली वर्ग माना जाता है, जो प्रदेश के गैर ब्राह्मण शैव मठों में रहते हैं . अधीनम का एक अर्थ मठ भी होता है और मठ के पुजारी को भी अधीनम कहते हैं लेकिन उन्हें प्रचलित तौर पर अधीनमकार्थर कहते हैं. तमिलनाडु मं कुल 20 बड़े अधीनम हैं जिनमें हर एक मठ की करोड़ों की सम्पत्ति है.
हर अधीनम की अलग जाति
अधीनम के बारे में एक बात जो कम लोग जानते हैं वे संत तो हैं, लेकिन ब्राह्मण नहीं होते हैं. हर अधीनम की अलग ही जाति और क्षेत्रीय विशेषता है.अलग अलग क्षेत्र के अलग तरह के अधीनम होते हैं. पेरूर और सिरूर के अधीनम प्रमुख गौडार होते हैं पश्चिमी तमिलाडु में ये बड़ी संख्या में हं. तिरुवदुथुरै और मदुरै के अधीनम शिव पैल्लई या मृदुलियार समाज के होते हैं. वहीं चेट्टिनाड के कुंद्राकुडी अधीनम प्रमुख चेट्टियार होते हैं.
अधीनमों का महत्व
इस तरह से अधीनम का जातीय महत्व नही बल्कि सामाजिक महत्व ज्यादा दिखाई देता है. फिर भी इनके हाथों में मठों के अलावा प्राचीन मंदिरों का संचालन है. सदियों से ये शैव दर्शन और तमिल साहित्य को बढ़ावा देते रहे हैं इनकी मदद से दर्लभ ताड़ की पत्तों की पांडलिपियों को खोजने और उन्हें प्रकाशित करवाने में काफी सफलता भी मिली है. इनकी सम्पत्ति और जमीन इन्हें और भी शक्तिशाली बना देती है.
अधीनम संतों ने नए संसंद भवन में सेंगोल की विधि विधान से स्थापना की थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
शैव सम्प्रदाय को समर्पित
अधीनम खुद को शैव सम्प्रदाय को आगे बढ़ाने वालों के तौर पर देखते हैं. वे अपनी पारम्परिक मूल्यों को शिक्षा के जरिए अपने शिष्यों को प्रदान करते हैं और इस तरह से शैव संस्कृति और मत को कायम रखते हैं. वे अपने इलाके के धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों तक ही खुद को सीमित रखते हैं. एक समय में उनका बहुत प्रभाव था.
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राजनीति से दूर
मंदिरों को प्रशासन सरकार के हाथों में आने से अब उनकी उस तरह की आय नहीं होती है जैसी पहले हुआ करती थी. वे खुद को सक्रिय राजनीति से दूर रखते हैं और उनके अनुयायी भी इससे दूर रहते हैं. प्राचीन काल में चोल, चेरा और पांड्या राजाओं का इन्हें संरक्षण मिला करता था. मदुरै के अधिनम को 1300 साल पुराना माना जाता और उसके वर्तमान अधीनमकार्थर 293वें प्रमुख माने जाते हैं.
सेंगोल वह राजदंड है जो पुराने समय में राजाओं के राज्याभिषेक के दौरान उन्हें विधि के शासन के प्रतीक के तौर पर दिया जाता था.
सेंगोल या राजदंड का महत्व
भारतीय संस्कृति में जब भी किसी राजा का राज्याभिषेक होता था तो वह एक बहुत ही पवित्र क्षण माना जाता था और उस अवसर पर राजा को तीन राजकीय चीजें प्रदान की जाती था. मुकुट, शाही तलवार और सेंगोल या राजदंड राजा को दिया जाता था. मुकुट राजा के नेतृत्व, तलवार उसके विरोधियों को रोकने का प्रतीक, और राजदंड विधि के शासन का प्रतीक था जिसस प्रजा के अधिकारों और न्याय की रक्षा हो सके. ये तीनों प्रतीक पीढ़ी दर पीढ़ी राजवंशों में आगे दे दिए जाते थे.
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जब अंग्रेजों ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को सत्ता सौंपी तो तिरुववतुतुरई अधीनम का प्रतिनिधित्व करनने वाले तम्बीरन ने एक सेंगोल उन्हें भूमिके प्रशासन में भूमिका के प्रतीक के तौर पर प्रदान की थी. उस समय उन्होंने ऐसे मंत्र भी पढ़े थे जिसमें विधि के शासन को सौंपने की बात थी. उसी परंपरा को नई संसद के उद्घाटन के दौरान फिर से स्थापित करने का कार्य किया गया है जिसे इस बार भी अधीनम के संतों ने प्रतिष्ठित किया है
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FIRST PUBLISHED : June 04, 2023, 15:54 IST








