
नरेश पारीक/ चूरू.मन के हारे हार है मन के जीते जीत, कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत. कबीर दास जी के इस दोहे का अर्थ है कि जीवन में जय पराजय केवल मन की भावनाएं हैं. यदि मनुष्य मन में हार गया निराश हो गया तो पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है. कुछ ऐसा ही उदाहरण चूरू में देखने को मिला है. जहां कोरोना कॉल में लगे लॉक डाउन में इस युवा की जॉब चली गई.लेकिन उदास और निराश न होकर चूरू के लोकेश शर्मा ने कुछ नया करने की ठानी और यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म की सहायता ले केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट )बनाने का काम शुरू किया. 35 वर्षीय लोकेश शर्मा का कहनाकि वह ऑटो मोबाइल सेक्टर में थे और लॉक डाउन में जॉब चली गई और नई जॉब की तलाश शुरू की लेकिन जॉब नहीं मिली.स्वयं का व्यापार शुरू करने के लिए पूंजी नहीं थी जिसके बाद मन में केंचुआ खाद बनाने का आईडिया आया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म की सहायता ले केंचुआ से जैविक खाद बनाने की विधि सीखी.
10 हजार रुपए में शुरू किया काम
लोकेश ने बतायाकि उनके पास व्यवसाय में इन्वेस्ट करने के लिए अधिक पैसे नहीं थे.ऐसे में महज 10 हजार रुपए से उन्होंने केंचुआ खाद बनाने का काम शुरू किया और 10 हजार रुपए के केंचुए खरीदकर लाए. शर्मा बताते है किउन्होंने दो बेड में केंचुआ खाद बनानी शुरू की थी और आज 16 बेड में वह केंचुआ खाद तैयार कर रहे है. शर्मा बताते है किइसके लिए वह गौशालाओं से गोबर खरीदते हैऔर गोबर को 15 दिन तक ठंडा करने के लिए छोड़ते है ताकि उसकी मीथेन गैस बाहर निकल सके और उसके बाद उसमें केंचुए छोड़े जाते हैं.
ऐसे होती है केंचुआ खाद तैयार
केंचुआ खाद बनाने के लिए तीन फुट चौड़ाई, 10 से 12 फुट लंबाई और दो से ढाई फुट गहराई का गड्ढा खोदकर उसमें अपशिष्ट गोबर भरते है. फिर उसमें केंचुए छोड़ते है. गड्डे की फर्श को कंकरीट से पक्का करते है. जल निकासी के लिए पिट में एक छिद्र बनाया जाता है. दो गड्ढों का निर्माण एक साथ किया जाता है. बीच में दीवार रखते हैऔर उसमें छिद्र छोड़ देते है, ताकि आसानी से केंचुए एक से दूसरे गड्ढे में जा सकें. एक माह बाद उस ढेर को लोहे के पंजे की सहायता से पलटते हैं. पिट में नमी बनाए रखने के लिए प्रतिदिन पानी का छिड़काव भी करते हैं. इस तरह 45 से 60 दिन में वर्मी कम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती है.
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FIRST PUBLISHED : June 02, 2023, 20:43 IST








