क्या हैं धोनी के वो 10 मंत्रा, जो मैनेजमेंट और लीडरशिप के हिट गुर हैं

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हाइलाइट्स

धोनी मैदान पर कभी आपा नहीं खोते, चीखते चिल्लाते नहीं बस शांति के साथ सहयोगियों को सुझाव देते हैं
कुछ कप्तानों और कोच की तरह मीटिंग्स में बहुत समय बर्बाद नहीं करते, टीम में उन्होंने विकेंद्रीकरण किया हुआ है

41 साल के महेंद्र सिंह धोनी किसी भी पैमाने पर एक आदर्श और सफल लीडर हैं. कोई बड़ी सफलता उन्हें आवेग और अति उत्साह में नहीं लाती, वह शांत बने रहते हैं. खुद आगे बढ़कर क्रेडिट लूटने की बजाए टीम के साथियों को आगे कर देते हैं. धोनी को कप्तान के तौर पर जिन्होंने भी करीब से देखा है, वो मानते हैं कि वह एक ऐसे कप्तान हैं, जिन्होंने लीडरशिप के गुर खुद गढ़े हैं. अहमदाबाद में जब आईपीएल फाइनल जीतने के बाद चेन्नई सुपर किंग्स के ट्राफी लेने की बात आई तो धोनी ने अंबाति रायुडू और रवींद्र जडेजा को आगे खड़ा कर दिया. पूरी टीम को आगे कर ख़ुद पीछे गुम हो गए.

टीम जब जीत का जश्न मना रही थी तो वह शांत पीछे खड़े थे. बड़ी सफलताएं उन्हें और कूल कर देती हैं. बस चेहरे पर एक सयंम और चिरपरिचित स्माइल बिखर जाती है. आईपीएल फाइनल या उससे पहले मैच देखते हुए कमेंटेटर्स ने अक्सर उनकी लीडरशिप की जिस तरह तारीफ की, वो एक तरह से लीडरशिप और मैनेजमेंट के गुर भी देते हैं. जानना चाहिए कि उनके वो मंत्रा क्या हैं, जो एक सफल टीम बनाते हैं.

1. सकारात्मक सोच

अभी तक के उनके सारे मैचों पर अगर नजर दौड़ाएं तो एक बात साफ है कि चाहे वो टीम इंडिया के कप्तान रहे हो या फिर चेन्नई सुपर किंग्स की कप्तानी करते रहे हों, हर परिस्थिति में उनकी टीम की जीत का प्रतिशत ज्यादा रहा है. कम स्कोर वाले मैचों में भी वो कूल बने रहे. परिस्थितियों के लिहाज से रणनीतियां बदलीं.

आईपीएल के मौजूदा सीजन में भी बहुत उतार चढ़ाव आए. लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया कि इस बार शायद चेन्नई सुपर किंग्स फाइनल में भी नहीं पहुंचे. आखिरी ओवरों में उनकी टीम अक्सर चमत्कार करती है. ऐसा तभी होता है जबकि टीम पूरे कांफिडेंस में हो और उसे खुद पर पूरा भरोसा हो. ये तभी होता है जबकि कप्तान हर खिलाड़ी में ये खास किस्म का आत्मविश्वास और कूलनेस भर देता हो.

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2. टैलेंट पूल की समझ-
कमेंटेटर्स ने कई बार कहा कि धोनी ऐसे कप्तान हैं जो खिलाड़ियों को तलाशते ही नहीं हैं बल्कि तराशते भी हैं. वो अक्सर एकदम नए खिलाड़ियों पर भरोसा दिखाते हैं, उसमें आत्मविश्वास पैदा करते हैं और वो शानदार खेल दिखाने लगता है. कई बार उनकी इसलिए आलोचना हुई कि कुछ खिलाडिय़ों को लेकर वो अडियल हो जाते हैं. समय के साथ उन्होंने साबित कर दिया कि उन्हें खिलाडिय़ों की योग्यता की पहचान है. उसी हिसाब से अपनी रणनीति और मैचों में वो खिलाडिय़ों को फिट करते हैं या मौका देते हैं.

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धोनी अपने खिलाड़ियों पर पूरा भरोसा दिखाते हैं और उनका बेहतरीन भी सामने ले आते हैं, जो काम वर्ल्ड क्रिकेट में बहुत कम कप्तान कर पाते हैं.

3. कूल रहो
ये हमेशा से उनका मूलमंत्र रहा है कि मैदान के बाहर और अंदर तनाव और दबाव को कभी हावी मत होने दो. टीम इंडिया मैदान पर उनकी कप्तानी के दौरान रिलैक्स नजर आती थी. वह कभी चीखते चिल्लाते नहीं बल्कि अपनी बात शांति से कहते हैं. उनका मानना है कि चीख चिल्लाहट से टीम के खिलाड़ियों की लय बिगड़ती है और कई बार वह हड़बड़ा या घबड़ा जाते हैं.

4. टीम का विकेंद्रीकरण यानि अधिकार बांटा है
वर्ष 2011 में मुंबई के वर्ल्ड कप फाइनल मैच से एक दिन पहले धोनी जब मीडिया से मिलने आये तो उन्होंने एक गौरतलब बात कही कि उन्होंने टीम के अलग अलग विभागों का विकेंद्रीकरण किया हुआ है. हर विभाग का अपना एक बॉस है. जो रणनीतियां तय करता है और फिर उनके साथ डिस्कस करता है.  लिहाजा वो टीम के हर डिपाटमेंट के साथ इनवाल्व भी होते हैं और उन्हें पर्याप्त स्पेस भी देते हैं.

5. खराब प्रदर्शन करने वालों के साथ खड़े रहो
ये उनका हमेशा का फंडा है. हालांकि इसकी भी आलोचनाएं हो चुकी हैं लेकिन उनके बारे में माना जाता रहा है कि वो ऐसे कप्तान हैं जो सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी के साथ खड़े रहते हैं और उसे मौका देते हैं, उसका उत्साह बढ़ाते हैं.

धोनी ने ये भी दिखाया है कि मेंटल पॉवर बड़ी चीज है. अगर आपका दिमाग मजबूत है तो उम्र आप पर हावी नहीं होती. इस आईपीएल में उन्होंने 41 साल का होने के बाद भी विकेट के पीछे ही खूब फुर्ती नहीं दिखाई बल्कि बैंटिंग में चमक दिखाई. कहीं भी ये नजर नहीं आया कि बढ़ती उम्र कहीं से भी उनकी सोच या खेल या फिटनेस पर हावी हो रही है.

6. धैर्य का मतलब यथास्थितिवादी होना नहीं
आतुरता, बेताबी तुरत फुरत रिजल्ट जैसे शब्द शायद उनकी डिक्शनरी में हैं नहीं. वो धैर्य के साथ मैदान में रणनीति के क्रियान्वयन का इंतजार करते हैं. दबाव के क्षणों में खिलाडिय़ों को आपा नहीं खोने के लिए कहते हैं. हालांकि उनके आलोचक कहते हैं कि उन्हें खुद हालात बदलने की पहल करने वाला कप्तान बनना चाहिए.

7. हमेशा सीखो
इसमें कोई शक नहीं कि वो हमेशा सीखते हैं, मेहनत उनका मूलमंत्र है. वो अपनी जमीन हमेशा पकड़े रहते हैं. उनके सीखने और मेहनत करने की प्रवृत्ति उनकी टीम को ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करती है. इस उम्र में भी वह जिस तरह लगातार विकेट के पीछे एक्टिव दिखते हैं, वैसा बहुत कम खिलाड़ियों के बूते की बात है.

एक लीडर की सबसे बड़ी खासियत होती है कि वो सही समय पर सही फैसला ले सके. इस मामले में भी धोनी कामयाब रहे हैं. ऐसा नहीं कि उन्हें असफलताएं नहीं मिली हैं लेकिन उन्होंने फैसले लेने में कभी कोताही नहीं बरती है.

8. सटीक फैसला लेने वाले
सही मौके पर हमेशा तुरंत सही फैसला करते हैं. शायद ये इस बात का परिणाम है इस खेल के वह बड़े थिंकर और रणनीतिकार हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह इसमें डूब चुके हैं. मैदान पर धोनी का बर्ताव बहुत कूल, सहयोगात्मक और सकारात्मक होता है. उन्होंने बहुत से खिलाड़ियों को मैदान पर अपने एटीट्यूड को बदलकर खेलना सीखा दिया है.

मैदान पर धोनी का बर्ताव बहुत कूल, सहयोगात्मक और सकारात्मक होता है. उन्होंने बहुत से खिलाड़ियों को मैदान पर अपने एटीट्यूड को बदलकर खेलना सीखा दिया है.

9. प्रेरित करने वाले
फिनिशर के तौर पर धोनी जिस तरह बैटिंग करते हैं और टीम को 90 फीसदी मामलों में जीत तक पहुंचाते हैं, उससे वो अपने खिलाड़ियों को भी प्रेरित करते हैं कि वो भी अच्छा खेल दिखाएं.

10. मेंटल पॉवर 
इस बार आईपीएल में जब धोनी खेलने के लिए उतरे तो लोगों का अनुमान था कि 41 साल की उम्र में वह शायद ही अपनी चमक बिखेर पाएं. लेकिन हर किसी ने माना कि उम्र का कोई असर उनके खेल पर नहीं है बल्कि वह पिछले कुछ सालों से ज्यादा फिट और बेहतर खेल दिखाने वाले साबित हुए. कहा जाता है कि उम्र को खुद पर अगर हावी नहीं होने देंगे तो हावी नहीं होगी, क्योंकि उम्र का असर दिमाग से ज्यादा होता है.

Tags: Captain Dhoni, Csk, Dhoni fitness, IPL 2023, Mahendra Singh Dhoni, Ms dhoni

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Author: Up Head Line

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