
नोस्टाल्जिया भी एक गजब तरह का एहसास है, कभी ये सुगंध से आता है, कभी किसी मौसम से, कभी हवा के छूने भरे से, तो कभी किसी भोजन के स्वाद से. पुरानी किताबों की महक भी नोस्टाल्जिया में ले जाती है और कभी-कभी कुछ कविताएं भी, जिन्हें पढ़ते हुए कोई मौसम, कोई स्वाद, कोई रंग, कोई गंध एक साथ चले आते हैं. इन्हें पढ़ते हुए आप उसी पुरानी दुनिया में वापिस लौट जाते हैं, जहां इन्हें तोतली ज़बान में बोलना सीखा था. बचपन की यादें खूबसूरत होती हैं, जिनकी छाप मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर ताउम्र बनी रहती है.
बाल कविता ‘अम्मा ज़रा देख तो ऊपर…, उठो लाल अब आंखे खोलो… और हठ कर बैठा चांद एक दिन…’ ये कविताएं उन सभी लोगों को याद होंगी, जिन्होंने साल 2000 से पहले अपनी टीनएज देखी. ऐसी नजाने कितनी मांएं हैं जिन्होंने अपने बच्चों को यही कविता सुना कर सुबह जगाया है या फिर दूध-भात की कटोरी लिए बच्चों के पीछे दौड़ी हैं. ये वो कविताएं हैं, जिन्हें जिन बच्चों ने अपनी कक्षा एक के सिलेबस में पढ़ा और कभी नहीं भूले… बादल का गरजना आज भी ‘वर्षा’ कविता की पंक्तियां दोहराता है… रात में चांद आज भी उसी पुराने कुर्ते की ज़िद कर बैठता है. इतनी सुंदर कविताओं को बच्चों की किताबों से 90 के दशक में ही खत्म कर दिया गया था.
ये कविताएं स्कूलों के पाठ्यक्रम से क्यों हटा दी गईं? क्यों नहीं हैं अब बच्चों के सिलेबस का हिस्सा? वजह तो नहीं पता, लेकिन हटने के बाद भी ये आज तक याद आती हैं. सिलेबस में कविताओं का आना और जाना दूसरे तरह की राजनीति है, लेकिन कवि तो इन सभी तरह की राजनीतियों से दूर रहने वाला प्राणी है. कवि को किताब में जगह मिले न मिले या पाठ्यक्रम में भी जगह न मिले, लेकिन वो अपने आप वहां पहुंच जाता है जहां उसे पहुंचना होता है और अपने शब्दों की ऐसी रौशनी बिखेरता है, कि उसके प्रकाश से आसपास के लोग भी सदियों तक जगमगाते हैं.
आइए पढ़ते हैं रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की वो तीन बाल कविताएं जिन्हें कई साल पहले बच्चों से दूर कर दिया गया, लेकिन दशकों तक पाठ्यक्रम का हिस्सा रहीं-
1)
वर्षा
अम्मा, ज़रा देख तो ऊपर
चले आ रहे हैं बादल
गरज रहे हैं, बरस रहे हैं
दीख रहा है जल ही जल
हवा चल रही क्या पुरवाई,
झूम रही डाली-डाली
ऊपर काली घटा घिरी है,
नीचे फैली हरियाली
भीग रहे हैं खेत, बाग़, वन,
भीग रहे हैं घर-आंगन
बाहर निकलूं, मैं भी भीगूं,
चाह रहा है मेरा मन
-रामधारी सिंह “दिनकर”
2)
चांद का कुर्ता
हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
“सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का.”
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, “अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने.
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं.
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा.
घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है.
अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएं,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?”
-रामधारी सिंह “दिनकर”
3)
जागो प्यारे
उठो लाल अब आंखे खोलो
पानी लाई हूं मुंह धो लो
बीती रात कमल दल फूले
उनके ऊपर भंवरे डोले
चिड़िया चहक उठी पेड़ पर
बहने लगी हवा अति सुंदर
नभ में न्यारी लाली छाई
धरती ने प्यारी छवि पाई
भोर हुआ सूरज उग आया
जल में पड़ी सुनहरी छाया
ऐसा सुंदर समय न खोओ
मेरे प्यारे अब मत सोओ
-अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
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Tags: Books, Hindi Literature, Hindi poetry, Literature, School syllabus
FIRST PUBLISHED : May 31, 2023, 18:27 IST








