
सोनिया मिश्रा,रुद्रप्रयाग. उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में मंदाकिनी नदी के तट पर अगस्त्यमुनि शहर और मंदिर बसा है.जो सभी हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है. और आज भी केदारनाथ जाने वाले श्रद्धालु मुनि जी महाराज के दर्शन किए बिना केदारघाटी में प्रवेश नहीं करते हैं. साथ ही इस मंदिर का संबंध बद्रीनाथ धाम से भी है. कैसे? वह इस रिपोर्ट में हम आपको बताते हैं.
बद्रीनाथ धाम से जुड़ी मंदिर की कहानी
मंदिर के पुजारी योगेश बेंजवाल बताते हैं कि यह क्षेत्र पहले ग्रामसभा नागकोट के अंतर्गत आता था, लेकिन ऋषि अगस्त्य के कारण पूरे क्षेत्र का नाम अगस्त्यमुनि पड़ा. मंदिर की मान्यता के बारे में वह बताते हैं कि त्रेता युग में जब भगवान श्री राम ने रावण का संहार किया था तो उस समय रावण ने आतापी वातापी नामक दो दैत्यों को कुबेर पर नजर रखने के लिए उत्तर भारत में स्थापित किया.यहांके नजदीकी गांवसिल्ला के नजदीक भगवान शिव का पूजनीय स्थल है जहां 12 कोटि के नाग ब्राह्मण समुदाय के लोग पूजा करते थे भगवान शंकर की पूजा के समय आतापि छोटा रूप लेकर भोग में प्रवेश कर लेता है और जो भी ब्राह्मण भोग ग्रहण करते वह उनके भोग में प्रवेश कर लेता. और उसके बाद उनका पेट फाड़कर वापस बाहर आ जाता. इससे कई ब्राह्मणों के वंश नष्ट हो गए.
जब ऋषि अगस्त्य को इस बारे में जानकारी मिली तो अगस्त्य ऋषि ने भी भोग ग्रहण किया और आतापि उनके पेट में ही भस्म हो गया. जिसे देख वातापि गुस्से से बौखला गया. और ऋषि पर हमला करने लगा. और अगस्त्य ऋषि ने तलवार से उसका वध कर दिया. लेकिन वातापि रक्तबीज राक्षस था उसकी जितनी बूंदें जमीन पर पड़ती थी उतने ही नए राक्षस पैदा हो जाते थे. इसी तरह ऋषि 1 दिन तक युद्ध करते रहे लेकिन युद्ध था की समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था. उसके बाद ऋषि ने कोपमंडल और वीरभद्र को उत्पन्न किया. इन दोनों ने सारा रक्त इकट्ठा कर पी लिया लेकिन फिर भी एक दैत्य भागने में सफल रहा. और इस दैत्य ने बद्रीनारायण में शरण ली. अगस्त्य ऋषि ने मंदिर के बाहर शील के रूप में दैत्य के प्रकट होने की प्रतीक्षा की लेकिन न ही दैत्य दोबारा प्रकट हुआ और न ही अगस्त्य ऋषि वहां से गए.
साथ ही वह दूसरी मान्यता के बारे में बताते हैं कि एक समय विध्यांचल पर्वत ने अहंकार वश विराट रूप धारण कर सूर्य और चंद्रमा की गति बाधित कर दी थी. जिससे सभी देवी देवता नाराज होकर अगस्त्य ऋषि के पास गए जिन्हें विध्यांचल पर्वत अपने गुरु मानते थे.विध्यांचल उन्हें प्रणाम करने के लिए जैसे ही झुके तो ऋषि अगस्त्य ने कहा कि उन्हें उत्तर भारत की यात्रा के लिए दिन और रात की आवश्यकता है ताकि वे दिन को यात्रा करें और रात्रि में विश्राम. लेकिन अगस्त्य ऋषि उत्तर भारत में ही रहने लगे जिस कारण विध्यांचल पर्वत हमेशा ही झुका रहा.
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FIRST PUBLISHED : May 30, 2023, 21:33 IST








