
नकुल कुमार/पूर्वी चम्पारण. बदलते समय के साथ पूर्वी चंपारण जिले के किसान भी परंपरागत खेती से इतर बड़े पैमाने पर अन्य तरह के पौधों की खेती भी करने लगे हैं. ऐसे ही एक किसान हैं ढे़कहां के रहने वाले किसान मनोज कुमार कुशवाहा. उन्होंने दो एकड़ में गेंदा फूल की खेती की है. जबकि अन्य प्लॉट में सब्जी की खेती करते हैं. किसान कहते हैं कि यह चौर की जमीन है. बाढ़ के दिनों में इस पर चार से छह फीट पानी लगा रहता है. खेत परती रह जाती थी. ऐसे में वे हर साल इस जमीन पर एक सीजन फूल एवं सब्जी की खेती करवाते हैं.
दूसरों को फूल की खेती करते देख हुए प्रेरित
मनोज कहते हैं कि अक्सर अपने गांव से कुछ ही दूरी पर स्थित पतौरा में लोगों को फूल की खेती करते हुए देखते थे. मंडी जाने पर फूल की खरीद-बिक्री होते देखते थे. मंडी में ही उन्होंने देखा कि फूल बाहर से भी बड़े पैमाने पर आता है, जो कि महंगी होती है. छानबीन करने पर पता चला कि इस इलाके में फूल की बिक्री ज्यादा है. इससे अच्छा इनकम हो जाता है. इसके बाद उन्होंने भी फूल की खेती करने की तैयारी शुरू. वे कहते हैं कि गेंदे का पौधा लगाने से पहले खेत को परंपरागत खेती की तरह ही जोतकर तैयार किया जाता है. इसके बाद कोलकाता से मंगाए गए पौधे को लगाया जाता है.
60 दिन बाद हर चौथे दिन 10 हजार प्रति कट्ठा की आमदनी
वे कहते हैं कि पौधा लगाने के 50 दिन बाद पौधे पर मिट्टी चढ़ाई जाती है. इसके सातवें दिन से पौधा फूल देने लगता है. फिर हर चौथे दिन फूल की तुड़ाई होती है. जिससे प्रति कट्टा 10,000 की आमदनी होती है. वे बताते हैं कि उन्होंने दो एकड़ में गेंदा की खेती की है. इस खेत में खरपतवार हटाने से लेकर मिट्टी चढ़ाने, पानी पटाने, तोड़ने, फूल की लरी बनाने तक में स्थानीय लेबर को काम देते हैं. गेंदा फूल की खेती से न सिर्फ उनका भरण पोषण हो रहा है बल्कि लगभग 20 परिवार उनसे प्रत्यक्ष रूप से जुड़कर आर्थिक रूप से लाभान्वित हो रहे हैं.
काला धब्बा से बचाव के लिए स्प्रे
किसान बताते हैं कि गेंदा की खेती में काला धब्बा बीमारी की संभावना रहती है. इसके लिए समय-समय पर फूल पर ध्यान देना होता है. अस्वस्थ फूल को तोड़ कर हटाना होता है. वहीं काला धब्बा से बचाव के लिए स्प्रे करना होता है.
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FIRST PUBLISHED : May 30, 2023, 13:18 IST








