
देश की सबसे कठिन परीक्षा के जो परिणाम आए हैं, उसमें लड़कियों ने लाजवाब कर दिया है. इस बात पर इतनी चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि भारतीय समाज अपने मूल चरित्र में पुरुष प्रधान है. अर्थ से लेकर पैतृक संपत्ति तक में लड़की का हक सुनिश्चित नहीं है. ऐसे में अपने दम पर अपनी पहचान कायम करने का प्रयास जो लड़कियों के द्वारा किया जा रहा है, उससे सामाजिक सोच और परिवार व्यवस्था में बदलाव आ रहा है.
इसके पहले हम लोग 12वीं बोर्ड की परीक्षा और फिर मेडिकल और इंजीनियरिंग की परीक्षा में यही जलवा देखते रहे हैं. लड़कियां टॉप कर रही हैं. सबसे अधिक नंबर लाने के साथ उनका प्रदर्शन, उनकी सोच, मेहनत सब दिखने लगती है. यह उपलब्धि यहीं तक सीमित नहीं है. शिक्षा और शोध के साथ कई ऐसे खेल हैं, जहाँ भारत विश्व स्तर पर लगभग नहीं था, वहां लड़कियां आगे निकल गयी हैं. यही भारत का असली विकास है. यह विकास केवल गिने-चुने क्षेत्रों में नहीं बल्कि बहुत से क्षेत्रों में है और सुखद यह है कि उसमें निरंतर वृद्धि हो रही है.
इस बार जो बेटियां भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा में सफल हुई हैं वह देश के विकास की राह तय करेंगी, उसे दिशा देंगी. विकास को सफलता की तरफ ले जाएंगी. ऐसा होना देश की आधी आबादी को दिशा देना है और उनको अपने महत्व को सझने और खुद पर गर्व करना सीखने के लिए प्रेरित करने वाली बात भी है. मीडिया में छपी रपट के मुताबिक 2018 में जहाँ 24% लड़कियां थीं वहीं 2022 उनका प्रतिशत बढ़कर 34% हो गया है. सबसे रोचक यह है कि इस बढ़ोत्तरी में एक निरंतरता है- जैसे 2019 में 24%, 2020 में 29%, 2021 में 26% रहा है.
जब हम भागीदारी की बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे हिस्सा दे रहे हों. हमें अब पूरकता की बात करनी चाहिए. इसलिए कि लिंग के आधार पर किसी की सामर्थ्य नहीं बदलती. इस बार के परिणाम से यह बात और पुख्ता होती है. अब यह सोच बन रही है कि ‘जो पढ़ता है उसे पढ़ाओ’. तो यह सामाजिक बदलाव के लिए सुखद संकेत है.
लंबे संघर्ष के बाद बदली है स्थिति
वैसे आप को बताता चलूँ कि यह बिसात इसी परीक्षा में नहीं बिछी है. इसके पीछे एक लम्बा संघर्ष है. 21वीं सदी के पहले दशक में बोर्ड का परिणाम आप देखें तो समझ आएगा कि लड़कियों ने चमक बिखेरना शुरू कर दिया था. लेकिन संख्या में कमी थी क्योंकि परिवार और समाज की संरचना में उनके महत्व को कम आँका जा रहा था. दूसरे दशक से परिणाम देखिये. निरंतर बढ़ता गया है. यह परिवार के सहयोग और सामाजिक जागरूकता का परिणाम है. ऐसे ही पिछले 20 वर्ष का सिविल सेवा का परिणाम देखिये. उसमें लड़कियों की सफलता का प्रतिशत 20% के आसपास होता था.
आप यह कह सकते हैं कि 21 वीं सदी के प्रारंभ से ही नींव मजबूत होने लगी थी. तकनीक के विकास और सहयोक के साथ वह नींव और अधिक मजबूत हुई है. जैसे इस बार के सिविल सेवा के परिणाम में ऐसी भी लड़कियां हैं जो कहीं कोचिंग नहीं ले रही थीं. अभी जब उनसे आगे बात-चीत होगी तो यह बात जरूर निकल कर आएगी कि किस प्रकार तकनीक ने उनकी मदद की. यह बात मैं इसलिए भी कह पा रहा हूँ कि दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले बहुत से बच्चों को धनाभाव या फिर रोजगार के साथ पढ़ाई के कारण समयाभाव की स्थिति में तकनीक मदद करती रही है.
दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कुछ विद्यालय तो केवल लड़कियों के हैं. लेकिन कुछ सहशिक्षा विद्यालयों में कुछ ऐसे भी हैं जहाँ लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है और संख्या कम प्रतिशत वाले कोर्स में नहीं बल्कि गणित, फिजिक्स, अर्थशास्त्र और अंग्रेजी जैसे विषय हैं. सामाजिक विज्ञान और साहित्य में भी संख्या अधिक है. यह अधिकता 12वीं के प्रतिशत के आधार पर होने वाले दाखिले तक सीमित नहीं थी बल्कि नयी शिक्षा नीति के तहत होने वाली प्रवेश परीक्षा में भी कायम है. ऐसे में इस परिवर्तन का श्रेय सामाजिक बदलावों को देना उचित ही है.
स्त्रियां रही हैं अधिक कुशल प्रशासक
अब एक अंतिम बात. देश के विकास में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा रोड़ा है. उससे लड़ने में स्त्रियों की क्षमता बहुत अधिक है. आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ अधिक कुशल प्रशासक रही हैं. समस्यायों का सामना करना हो या फिर किसी तरह के तनाव को दूर करना हो, जिम्मेदारी के पदों पर स्त्रियों का योगदान पुरुषों से अधिक संतुलित रहा है है.
यह 34% आगे बढ़ते रहे, इसके लिए चयनित प्रतिभागियों के लिए अधिक चुनौती है अपने को हर स्तर पर साबित करना. क्योंकि समाज ने जिस विश्वास और सहयोग के साथ स्त्रियों पर भरोसा करना करना शुरू किया है, उसका आगे का रास्ता वर्तमान में सेवारत लोगों के प्रयास से होकर गुजरेगा. साथ ही देश में होने वाले बहुविध परिवर्तनों को दिश और गति देने का जिम्मा उन कन्धों पर होगा जो आगे आ गए हैं और जिनके और अधिक आगे जाने की सम्भावना विद्यमान है.
समय गतिमान है. उसमें परिवर्तन होता रहता है. तमाम चुनौतियों से लड़ते हुए स्त्री-शिक्षा अब लगभग भेद-भाव मुक्त है. कम से कम सरकारी स्तर पर किसी तरह का कोई भेद-भाव नहीं दीखता. ऐसे में समाज को पहल करते रहना होगा, ताकि बदलाव का परिणाम कहीं लिंग-भेद का शिकार ना हो. यदि देश और समाज को अधिक संवेदनशील और उदार बनाना है तो स्त्रियों को पूरक मानना होगा. उनके महत्व और योगदान को कमतर आंकना अपने समाज और देश को संकट में डालना है. स्त्रियों की उपस्थित से समाज में असहिष्णुता बढ़ेगी. समाज अधिक संतुलित होगा. नयी पीढ़ी सही रस्ते पर जाए, इसके लिए स्त्रियों को सम्मान और अधिकार देना जरुरी है ताकि हम राष्ट्र को और बेहतर बना सकें.
.
Tags: Job and career, Upsc exam, UPSC results
FIRST PUBLISHED : May 25, 2023, 20:06 IST








