अरुणाचल प्रदेश के चर्चित हिंदी कवि तारो सिंदिक की कविताएं- ‘देव-दानव बनने की होड़ में, तू इन्सान का आईना बनना’

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फेसबुक पर प्यार

प्रणय रस से सरावोर
युगल तस्वीरों की
बाढ़-सी जो
आन पढ़ी है
आशा यह है
दिलों के मध्य
कहीं कोई खाई न हो
जिसमें हर दूसरे दिन
प्रदर्शित प्रेम
गिरते-लड़खड़ाते जाएं
यह भी न हो
कि दुनिया को दिखाते
अपनी ही आंखों में
धूल झोंक दें
प्रार्थना यही
इश्क के दीवनों से
रिश्तों की जड़ें
कभी शुष्क न पड़ने दें
प्रेम के पल्लव
त्वरित न जड़ने दें
पुष्प फल का सफर
साथ तय करने दें
फिर क्या जताना
क्या दिखाना
बस सुरक्षित रहे
प्रेम
कहीं दो गहरे कोनों में।
—

तबादला

कितनी बातें शेष कहने को
कितने जज्बात बयां होने को
तूफान सा घुमड़ता
लहरों सी उमड़तीं
बहाने हजारों आंख ढूंढे
अश्कों को छलकने से कैसे रोकें
जिस अंचल के आंचल ‘मैं’
‘काम्बा’ तूने कितना दिया
‘तुझको’ मैंने कितना जिया
इसका हिसाब कोई क्या करे
समझे वही जो तुझको धरें
पर आज स्वप्न जैसे चल रहा
एक दशक एक पल-सा लग रहा

कितने अतृप्त बच्चे-बच्चियां
पीछे छोड़े मैं जा रहा हूं
सह कर्मियों का दुलार लिये
मैं हँसते-रोते जा रहा हूं
एक ह्रदयवासी मित्र रत्न से
बिछुड़ता सा जा रहा हूं
जिनके साथ बीते-बिताए
मीठी-नमकीन स्मृतियों का संसार
अपने साथ लिए जा रहा हूं।

एक दशक का सफर
और एक कठोर निर्णय
नहीं कारण अन्य कुछ भी
सबकी तरह विवश मैं भी
ठहरे हुए बासी पानी सा
नहीं अटकना अवरुद्ध मुझे भी
निरंतर बहना, जीवन का सार
जीवन हेतु धारा बनना मुझे भी।
—

सपनों के सौदागर

इन मस्तानी आंखों में
दीवाने दिलों में
एक पागल प्रेमी सा
हमने भी पाल रखे थे
सपनों का खूबसूरत जहां

कितनी रातें दिन करके
नींद उनको हवाले करके
श्रम के हवन कुण्ड में
सुख और चैन भस्म करके
हम चले थे दौड़ लगाने
अपने हिस्से का सपना सच करने
किसी बुजुर्ग उम्मीदों पर खरा उतरने

पर नहीं…
हम फिर शिकार हुए
एक खतरनाक काली साजिश के
हम सपने पालते रहें
और वे पेशेवर हाथ
हमारे सपनों का
गला घोंटते रहें
पंख उजाड़ते रहें
किसी होटल के तंग कमरे में
उसका कत्ल करते रहें

न जाने कब से
हमारे सपनों की कब्र पर
खड़ी करते रहें वे
मक्कारी की इमारतें
और परिजनों की किस्मत की लकीरें
खींचते रहें
हमारे मृत सपनों के रक्त से

हमारे सपनों के सौदागर
गुमनामी के बाजारों में
करते रहें नीलाम
लगाकर उनकी मोटी बोलियां

पर अब
लाज और भय से लिपटे
देख रही
हराम की नींव पर पड़ी दरारे
जो दूर…
बहुत दूर तक दरकेंगी।
—

अंतिम दिन, प्रथम दिन

बस एक रात की दहलीज
तुम खड़ी हो उस पार
और हम इस पार
कदम भर बढ़ाने की
देरी और दूरी

इस पार
हमारे पीछे
कितने किस्से-कहानियां
हँसती-रुलाती
उठती-गिरती
और हर वर्तमान
अतीत में बदलती
रात के अंधेरे में
दिन का उजाले में
बनती मिटती गयी
इस पार
मुझे-आपको
बनाते-बिगाड़ते
कितने दिन जुड़ गये
समय के पतझड़ में

उस पार
तुम बाहें फैलाए
वसंत सा खिलता
हरित यौवन बिखेरता
जमीन तैयार रखना
हर्ष और उल्लास की
फसलें लहलहाने
उम्मीदों का सूरज बन
उग-उग आना
मानस के हर प्रभात में
देव और दानव बनने की होड़ में
तू इन्सान का आईना बनना।

बस एक रात की दहलीज
तुम खड़ी हो उस पार
और हम इस पार
कदम भर बढ़ाने की
देरी और दूरी है।
—

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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