इस खास व्यक्ति की मित्रता के बाद श्रीराम को मिला था वानरों का साथ, जानें अद्भुत कहानी

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धीरेन्द्र शुक्ला / चित्रकूट. चित्रकूट के विंध्य पर्वतों पर बसे वानर और प्रभु राम के मित्र बने सुग्रीव के प्रसंग का वर्णन मिलता है. महंत दिव्य जीवन दास महाराज जी ने बताया कि सीता हरण के बाद एक महत्वपूर्ण प्रसंग आता है. वह प्रसंग है राम-हनुमान मिलन और सुग्रीव के साथ प्रभु राम की मित्रता. सुग्रीव से मित्रता के बाद ही भगवान राम को वानरों का सहयोग मिला था.

उन्होंने बताया कि उत्तर भारत की पर्वतों की श्रृंखलाएं इस बात की गवाही चित्रकूट में दे रही हैं. जिस वक्त माता सीता का हरण हुआ था, तो उनकी खोज के लिए प्रभु राम जंगल में भटक रहे थे. इसी दौरान उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई थी, जिसकी वजह से सारे वानर माता सीता को ढूंढने के लिए निकल पड़े थे. यह चित्रकूट के पर्वतों की गुफाओं में नजर आता है.

राम और लक्ष्मण को देखकर डर गए थे सुग्रीव

महंत बताते हैं कि विंध्य के पर्वत पर ही सुग्रीव की मुलाकात वानर राज केसरी से हुई. केसरी ने सुग्रीव की सहायता के लिए अपने पुत्र हनुमान को उनके पास छोड़ दिया. सुग्रीव ने वहीं अपनी सुरक्षा के लिए एक छोटी-सी सेना गठित की. फिर एक दिन माता सीता को खोजते हुए प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे. जब सुग्रीव ने राम और लक्ष्मण को देखा, तो वह भयभीत हो गए. इतने बलशाली और तेजस्वीवान मनुष्य उन्होंने कभी नहीं देखे थे. वह भागते हुए हनुमान के पास गये और कहा कि हमारी जान को खतरा है. सुग्रीव को लग रहा था कि कहीं यह दोनों उसके भाई बाली के भेजे हुए तो नहीं हैं. सुग्रीव ने हनुमान से कहा कि तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके उनके समक्ष जाओ और उसके हृदय की बात जानकर मुझे इशारे से बताओ, यदि वे बाली के भेजे हुए हैं, तो मैं तुरंत ही यहां से कहीं और भाग जाऊंगा.

प्रभु राम की असलियत जान चरणों में गिरे हनुमान

महंत दिव्य जीवन दास बताते हैं कि प्रभु को पहचानकर हनुमान जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े. उन्होंने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर स्तुति की. इस दौरान हनुमानजी ने कहा- अपने नाथ को पहचान लेने से हृदय में हर्ष हो रहा है. हे स्वामी! मैंने जो पूछा वह पूछना तो न्याय था. वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी के वेष में और मेरी वानरी बुद्धि.. इससे मैं आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थिति के अनुसार मैंने आप से पूछा, परंतु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं? मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूं, इसलिए मैंने अपने स्वामी को नहीं पहचाना. लेकिन आप तो अंतरयामी हैं. ऐसा कहकर हनुमान जी फिर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े.

श्रीराम ने हनुमान को गले लगाकर कही ये बात

राम जी से मिलकर हनुमान ने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया. उनके हृदय में प्रेम छा गया, तब श्री रघुनाथजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया. राम ने हनुमान को हृदय से लगाकर कहा- हे कपि! सुनो, मन में ग्लानि मत मानना. तुम मुझे लक्ष्मण से भी दूने प्रिय हो. सब कोई मुझे समदर्शी (प्रिय-अप्रिय से परे) कहते हैं, पर मुझको सेवक प्रिय है.

बाली को मारने में की सुग्रीव की मदद

हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम को सुग्रीव से मिलाया. राम को सुग्रीव ने अपनी कथा और व्यथा बताई. तब राम ने सुग्रीव के दुख हरण के लिए बाली का वध करने का वचन दिया. दरअसल, सुग्रीव के भाई बाली ने सुग्रीव की पत्नी और संपत्ति हड़पकर उसको राज्य से बाहर निकाल दिया था. यही कारण था, कि प्रभु श्रीराम ने सुग्रीव से अपने बड़े भाई बाली से युद्ध करने को कहा और इसी दौरान श्रीराम ने छुपकर बाली पर तीर चलाकर उसे मार दिया. बाली वध के बाद सुग्रीव किष्किंधा के राजा बने, अपने भाई बाली के पुत्र अंगद को युवराज बनाया और बाद में उन्होंने राम के लिए वानर सेना को गठित किया था.

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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