उसकी अंगुलियों के पोरों का दबाव जैसे एक कोमल किसलय पर टिकी ओस की बूंद. उसकी छुअन जैसे तेज हवाओं का बांस के मोटे तनों से टकराना, एक मदमाती स्वर का पनपना और सब दिशाओं में गूंजना. उसकी देह जैसे पूस की रात में दूर जलता अलाव.
बिस्तर पर लेटे, हम दोनों निस्तब्ध मौन को महसूसते, एक-दूसरे के बालों में अंगुलियां फिराते, तेज रफ्तार से धड़कती घड़ी के दिल की टक-टक सुनते—जैसे नदी के तेज बहाव के बीच पड़े दो पत्थर. इच्छाएं जैसे गर्म रेत के सूखे कण, हवा में गोल-गोल चक्कर लगाते, बवंडर में घुलते, खोजते पानी की ठंडी नीली सतह. वो तैर जाना चाहता था मुझमें, मेरे शरीर की गोते खाती नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण नदी में. पर मैं उसके आगे बढ़ना नहीं चाहता था. उसने कोशिश की, अपने हाथों का दबाव मेरी जांघों पर बढ़ाया, पर मुझे दिखाई देने लगीं लाल दहकती आंखें. महसूस हुआ शरीर में भरता एक निर्लिप्ति का भाव, जैसे दूर छूटता नदी का तट.
“क्या हुआ अवधेश?” उसकी आवाज बगुले के परों की तरह फड़फड़ाती हुई.
“कुछ भी तो नहीं, नींद आ रही है.” डर का एक खंजर मेरे कलेजे में बेरहमी से घुँप गया. गला आंसुओं से रुंध गया. मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया.
“बताओ तो?” उसकी आवाज में छटपटाहट खत्म हो चुकी थी, उसने मेरी छाती पर अपना सिर रख लिया और तर्जनी के इशारे से चांद दिखाने लगा. “बादलों के बीच ढका चांद कितना सुंदर लग रहा है…शायद आज पूर्णिमा है.”
“वो देखो वहां से अभी अधूरा है. दो-तीन दिन में होगी पूर्णिमा.” मैंने इशारे से उसे दिखाया.
“तुम्हें तो हर चीज में नुक्स निकालने की गंदी आदत है. बाय द वे ये ब्यूटी को देखने का हेटेरोनॉर्मेटिव तरीका है. दैट होल इज ओनली ब्यूटीफुल!”
“मैंने कब कहा अधूरी चीजें सुंदर नहीं होतीं? बल्कि अधूरापन तो ज्यादा आकर्षित करता है.”
“ज़ायगार्निक इफेक्ट!”
“फिर भी पूरा मेरे लिए अधिक सुंदर है. एक भौंडे चेहरे वाले कृष्ण, दूसरे कंटीले नैन-नक्श वाले—तुम बताओ किसके सामने तुरंत सिर झुका लोगे?”
“…दोनों के सामने.”
“लेकिन वो तो श्रद्धा के कारण. ये जो दीवार पर तुमने गोरे, घुंघराले बालों वाले बुद्ध बनाए है, क्या तुम्हें लगता है ये असली बुद्ध से जरा भी मेल खाते होंगे? सुंदरता न हो, तो जीवन कितना बदसूरत हो जाए.”
“वो सब छोड़ो… कल क्यों तुम उठकर अचानक ‘चाचा चाचा’ चिल्लाने लगे थे. फिर घूं–घूं कर रोने लगे थे.”
“क्या…तुमने बताया क्यों नहीं?” मैं एकदम शर्मिंदा. मैंने अपनी आवाज कड़ी कर उसका सिर छाती से हटाया और उसकी ओर पीठ करके मैंने आंखें मींच लीं, “रात बहुत हो गई है, अब तुम भी सो जाओ.”
***
प्लेट गिरने की छनछनाहट से मेरी नींद खुली. बल्ब की तीखी रोशनी से आंखें मिच गईं. पांच बजे थे. आसमान में रात घिरी हुई थी. कोहरे की गाढ़ी परत एक रजाई-सी पूरे शहर को ढके हुई थी. सुशांत अपनी पेंटिंग पर आढ़े-तिरछे स्ट्रोक्स मारने में मशगूल था.
“फिर इतनी जल्दी उठ गए, तुम सोते भी हो या नहीं?” मैंने हथेलियों से अपना सिर दबाते हुए पूछा.
“ये पेंटिंग हमारे विरोध का चिह्न है, इसलिए जल्दी पूरी करनी है.”
सरोजनी नायडू के भाई और बावर्ची के ‘खडूस दादुजी’, जिन्होंने रचा कालजयी बाल गीत ‘रेलगाड़ी’
“एक सूरज बनाए जा रहे हो दस दिनों से. कभी पीला भरते हो, फिर एक लाल का छींटा मारते हो, फिर कहते हो ज्यादा डार्क हो गया, रंग हल्का करने के लिए फिर पीला…अजीब सनकी हो.”
“सनकी तो सनकी सही, लेकिन पेंटिंग बनाना कोई बच्चों का काम नहीं. बड़ा पेशेंस चाहिए होता है.” फिर लाल रंग में अपनी कूची डुबाकर जोड़ा, “समय इसलिए भी बहुत लग रहा है कि सामान पूरा नहीं है. दो दिन से नारंगी रंग की ट्यूब खत्म हो गई है. लाल और पीला मिलाकर काम तो कर रहा हूं पर पीला रंग भी बहुत कम बचा है. बचा-बचाकर डालो तो वो बात नहीं आती.”
“बाजार जाने में इतना भी क्या आलस?”
“आलस नहीं…”
“पेंटिंग वैसे ही अमीरों के शौक है…ऊपर से यह बंबई शहर. कैनवास की जगह प्लाई बोर्ड इस्तेमाल करते हो, घिसे हुए ब्रशों को और-और घिसते जाते हो…ऊपर से मेरी नींद बिगाड़ते हो. शाम को घर का सामान भी लाना है, साथ चलना.”
“तुम्हें पता तो है मैं तुम्हारी नींद खराब नहीं करना चाहता…गिल्टी क्यों फील करवा रहे हो?”
“गिल्टी क्या, इस दड़बेनुमा कमरे में कुछ भी करोगे, जितनी भी आराम से, आवाज तो होगी ही.”
मैं सुड़क-सुड़क कर अपनी चाय पीने लगा तो उसने आंखें तरेरीं. हल्की-सी फुसफुसाहट से उसका कॉन्सेंट्रेशन जाता है, मैं जानता हूं, लेकिन अगर मैं चाय सिप्स में ना पीयूं तो लगता ही नहीं पी है. कहने को यह घर है, पर असलियत में तो केवल एक कमरा है जिसमें एक डबल बेड किसी तरह ठूंस दिया गया है. एक कोने में गैस स्टोव रखा है और दूसरे में बदबूदार गुसलखाना बना है. कभी लगता है, आदमियों की तरह इस शहर ने भी मुखौटा पहन रखा है. यह भी तस्वीरों में अपने हाथी दांत दिखाता है—फटी-फटी आंखों से देखे गूगल पर जुहू चौपाटी के पत्थरों पर बैठे हाथों में हाथ डाले भुट्टा खाते कपल्स, गेटवे ऑफ इंडिया के सामने सेल्फी लेते प्रेमी जोड़े, आलीशान जलसा की छत पर हाथ हिलाते बिग-बी. शहर में कदम रखते ही सभी चित्र बेमानी लगने लगते हैं.
मैंने चुपचाप एक घूंट में चाय पी और सिर को हाथों से दबाता हुआ कंबल ओढ़कर फिर लेट गया. सोचा था कि आधे घंटे में उठकर उसका नाश्ता बना दूंगा पर नींद आ गई. जब उठा तो साढ़े सात बज रहे थे. मैं तुरंत उठकर रसोई में गया. आलू के परांठे बनाने के लिए तवा रखा ही था कि वह तैयार होकर जाने लगा.
“तुमने उठाया क्यों नहीं…पता नहीं कैसे आंख लग गई… दस मिनट रुक जाओ, मैं अभी कुछ बना देता हूं.”
उसने कोई जवाब नहीं दिया, शिराओं में कोई तनाव नहीं, बस एक विद्रूप हँसी उसके होठों पर फैली और हर रोज के बजाए और कसकर उसने मुझे गले लगाया.
“आज तो गैलरी ही जा रहे हो ना?”
“नहीं”
“क्यों”
“तुम्हें क्या मतलब?”
“मुझे क्यों नहीं मतलब…इतनी छुट्टियां लोगे, तो वो निकाल नहीं देंगे.”
“तुम खुद तो चूहे की तरह बिल में छिपे रहना चाहते हो, मैं भी अपनी कम्युनिटी के लिए लड़ना छोड़ दूं?” उसने चीखते हुए कहा.
“थोड़ा धीरे बोलो. उसी बात के पीछे क्यों पड़ गए हो?”
“इंसाफ के लिए लड़ना पड़ता है, बातें बनाने से कुछ नहीं होता.”
“उस ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट के साथ जो हुआ, मैं बिल्कुल उसके खिलाफ हूं. पर लफ्फाड़ेबाजी तभी तक अच्छी लगती है जब पर पेट भरा हुआ हो. तुम दो-चार सौ लोग मिलकर क्या उखाड़ लोगे?”
“तुम जैसे लोगों को फायदे सारे चाहिए, सबसे पहले तुम ही ‘गे प्राइड’ के पोस्टर्स लगा लेते हो स्टेटस पर…कम्युनिटी पर पेस्ट हो तुम.”
“जोर-जोर से न चिल्लाने से यह बिल्कुल साबित नहीं होता कि मैं उस एक्टिविस्ट को इंसाफ नहीं दिलाना चाहता.”
“चिल्लाए बिना बहरा समाज कुछ नहीं सुनता.”
“एक भी दोस्त का नाम बताओ अपनी ‘सो-कॉल्ड कम्युनिटी’ से जो हमें दस दिन के लिए भी मुफ़्त में रख लेगा? मैं तब तक नहीं भागा…आ…आ…बस यही कह रहा हूं कि जोश में होश मत खोओ.” मैं उसकी आंखों-में-आंखें डाल एक सांस में बोलता गया था.
मुझे लगा था कि वो रुक जाएगा, समझेगा आर्ट गैलरी में जाना कितना जरूरी है. वैसे भी वहां से पांच बजे तक फ्री हो ही जाता है. उसके बाद भी तो प्रदर्शन में सम्मिलित हुआ जा सकता है. मैं गले लगाने के लिए थोड़ा आगे हुआ भी, पर भी वो दूर हट गया. फिर दरवाज़ा भाड़ से मारता हुआ चला गया.
महीना ही हुआ था मुझे सुशांत से मिले. ग्राइंडर का भी जोडूं तो छह महीने. कितनी जल्दी लगने लगा कि हम कितने अलग हैं, जैसे विंडचाइम की दो घंटियां जो साथ में रहती हैं, हवा के झोंकों से हुलसी एक साथ मिलकर मधुर ध्वनि पैदा करती हैं, पर दोनों बिल्कुल अलग—उनके आकार, ध्वनि, पिच—सब कुछ बिल्कुल अलग. क्या भिन्नता का यही चुम्बक हमें करीब ले आया था?
मैं छज्जे पर खड़ा होकर देखने लगा. ऊपर फैला साफ-शफ़्फाक आकाश, चौकीदारों की तरह तैनात बिजली के लंबे खंबे. उनसे गुजरतीं मकड़ी के जाले बुनतीं मोटी काली तारें. बीच में एक मक्खी की तरह उलझा सुबह का लाल, लपटदार सूरज. मेरी नजरें टिकी रहीं सामने के डंपिंग ग्राउंड पर—रंग-बिरंगे बिस्कुट-भुजिया के पैकेट, अंडे-केले के छिलके, प्लास्टिक के टूटे ढक्कन. उन पर भिनकती मक्खियां, चरते गाय-डंगर, झोला उठाए घूमते बच्चे जो एक-दूसरे से मुकाबला करते हैं ज्यादा सिक्के, प्लास्टिक और पीतल ढूंढ़ने का. जब थक जाते हैं, तो लड़कियां खोजती हैं खून से सने सैनिटरी पैड जिन्हें वे देखती हैं हसरत भरी निगाहों से. लड़के भी ढूंढते हैं कंडोम, उन पर उंगुलियां फिराते महसूस करते हैं अपने अंदर पनपते पुरुष को. ऐसा ही बच्चा मैं भी हो सकता था—बिना किसी भविष्य वाला—अगर मैं वहां से नहीं भागता.
फिर सोचने लगा, भविष्य की फांस ना होना कितनी अच्छी बात है. हर रोज बस एक दिन हाथ में होना, एक ऐसी स्वच्छंदता जो चाहकर भी हमारे हिस्से में नहीं. इतने बड़े शहर में जहां मुझे कोई नहीं जानता, कोई नहीं पहचानता, वहां भी हम कितना डरकर रहते हैं. पहली तनख्वाह मिली तो पर्दे खरीद कर लाए—मोटे, काले पर्दे. इतने मोटे की रोशनी के सतरें भी आर-पार न होने पाएं.

किंशुक गुप्ता तमाम पत्र-पत्रिकाओं में पुस्तकों, लिंग और कामुकता पर केंद्रित कॉलम लिखते हैं. उन्हें डॉ. अनामिका कविता पुरस्कार (2021), रवि प्रभाकर स्मृति लघुकथा सम्मान (2022) और अखिल भारतीय युवा कथाकार अलंकरण (2022) से सम्मानित किया गया है.
आंखें अभ्यस्त हो सकती है अंधेरे के लिए, पर शरीर सच की मार कैसे सहन करेगा? कभी रविवार को हम दोनों घर पर होते, तो बिना रोशनी के हमें घर से ज्यादा यह बिल लगता—हम दो चपल चूहों के छिपने के लिए खोह. कभी लगती सेल्यूलर जेल की दस जमा छह की कोठरी जिसमें हम न जाने कौन से ज़ुर्म की सजा काट रहे हैं.
डरते हम इसलिए नहीं कि हम ‘गे’ हैं, बल्कि पता चलने पर लोगों के बदले रवैये, उनकी घूरती आंखें, उनके चेहरे पर उभरे उपहास के चिह्नों से हैं. हम ‘गे’ होने में कोई विशिष्टता नहीं खोजना चाहते; ना ही चाहते हैं कि कोई आकर हमसे कहे कि हम तुमसे सिंपैथी रखते हैं; हम बिल्कुल वैसे ही रहना चाहते हैं जैसे बाकी लोग रहते हैं.
***
मोहनीश, सुशांत का पुराना दोस्त, घर आया. मैं नौकरी के सिलसिले में एक-आध बार उससे पहले मिला था. कपड़ों की चार बड़ी मिल के मालिक का बेटा, वह उस तबके से ताल्लुक रखता है जहां पार्टियों में अफीम, चरस, गांजे की दावत होती है जिसे स्नोर्ट करते, लंबी डंडियों वाले गिलासों में इटली-पेरिस की महंगी शराब पकड़े, जवान लड़के-लड़कियां ‘डार्लिंग’ कहते-कहते एक-दूसरे पर बेतहाशा ही झूलने लगते हैं. और रात की मदहोशी में खोए एक-दूसरे के शरीरों पर छिपकलियों जैसे रेंगते हैं.
मैं हैरान था कि सुशांत के ना होने के बावजूद भी वह घर आ गया. मैं नहीं चाहता था कि वो हमारे सीले और बदबूदार दड़बेनुमा घर को देखकर हैरान हो, इसलिए फोन पर टालता रहा था, पर वह नहीं माना था.
वह सहज होकर बिस्तर पर चौंकड़ी मारकर बैठ गया. उसका माथा बिल्कुल नहीं तुनका जब मैंने स्टील के गिलास में उसे पानी दिया. उसने बड़े सलीके से एक घूंट पानी पिया और गिलास वापिस रख दिया. मैंने खिड़की-दरवाजे बंद कर दिए कि कूड़े की दुर्गन्ध किसी तरह से उसके नासापुटों में ना भरे. पर पसीने से तर अपने शरीर की बदबू को कैसे दूर करता? छिड़कने के लिए इत्र भी नहीं था, इसलिए उससे दूर ही सिमटा बैठा रहा.
चौंकड़ी मारकर बैठने से उसका पेट और बढ़ा हुआ लग रही था. जांघें इतनी भारी जैसे किसी किले के मोटे पिलर, हाथ पर बना जगुआर का टैटू, चेहरे पर पिंपल्स, छितरे बाल. वह मुस्कुराया, फिर मुझे अपलक देखने लगा, फिर मुस्कुराया, और कुछ मिनटों तक यही दोहराता रहा.
अल्हड़ बीकानेरी जयंतीः लेता है धरा पे अवतार जाके सदियों में ‘अल्हड़’ सरीखा कोई सन्त मेरे राम जी
“पार्क चलोगे?” जैसे उसने मेरी बेचैनी भांपकर कहा.
मैंने तुरंत हां कर दी. थोड़ी दूर चलकर जब घर ओझल हो गया, मैंने उससे पूछा, “घर किसी काम से आए थे?”
“नहीं…नहीं कुछ खास तो नहीं…” उसने झेंपते हुए कहा जैसे इस सवाल की तैयारी वह पहले से नहीं करके आया था. फिर तुरंत जोड़ दिया, “वो आज पहली हीयरिंग थी ना केस की, पास से गुजरा था तो सोचा सुशांत को बधाई देता चलूं…फिर केवल उसके कारण ही तो यह मुमकिन हुआ है.”
वाक्य के अंत में कटाक्ष था जिसे सुनकर विश्वास हुआ था कि वह मेरे पाले में है. तब भी चेहरे को तटस्थ रखकर मैंने कहा था, “उसकी हिम्मत तो सचमुच काबिल-ए-तारीफ है. कम ही होते हैं उसके जैसे फितूरी.” मैं ‘फितूरी’ बोलते ही सकपकाया था. डर गया था कि कहीं अपने चीथड़ों में हाथ डालने का उसे मौका न दे दूं. तभी बात का रुख मोड़ते हुए पूछा था, “जीत गए क्या…कितनी सज़ा हुई?”
“इंडिया में केस तब तक खत्म नहीं होते, जब तक लोग विक्टिम और अब्यूज़र के नाम अदल-बदल ना दें.” वह मेरी मूर्खता पर हँसा था.
मैं पिल्ले-सा सहमा, आंखे नीचे झुकाए चलता रहा. “फिर बधाई क्यों?”
बच्चों को पुचकारने के लहजे में उसने कहा, “आज हमारे पक्ष ने दलील पेश की थी. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने खुदकुशी को कन्फर्म किया है…साथ ही यह भी कि उस एक्टिविस्ट का वजाइना मांस का लोथड़ा भर था जिस पर अनेक घाव थे. दूसरे गवाह ने यह भी बताया कि ‘सेक्स रिप्लेसमेंट सर्जरी’ के बाद जननांग की जगह ब्लाइंड पाउच होने के कारण उसे पेशाब करने में भी तकलीफ होने लगी थी. डॉक्टर्स के बताए खर्च से लगभग दुगुना लग चुका था जिसके कारण वह परेशान थी.”
“अभी कुछ दिनों पहले उसके पार्टनर ने भी शायद खुदकुशी कर ली?”
“हां… एग्जेक्ट एक हफ्ते बाद।”
मुझे मन-ही-मन सुशांत की सुबह की बात याद हो आई, ‘कम्युनिटी’ शब्द पर उसने कितना जोर डाला था. कहां गई थी वह कम्युनिटी जब वह एक्टिविस्ट आर्थिक मदद की गुहार लगा रही थी? चीखने-चिल्लाने, प्लैकार्ड पकड़े चौराहों पर नारे लगाने, इंस्टाग्राम पर स्टेटस चस्पा कर देने से क्या होता है? रुपयों के बगैर क्या सपोर्ट, क्या हेट?
मोहनीश ने फिर पूछा, “आर्ट गैलरी में उसका काम कैसा चल रहा है?”
कुछ जवाब देते नहीं बना. “ठीक” मैंने बहुत धीरे-से कहा.
सामने मछली मार्किट था. उकड़ूँ बैठीं, साड़ी घुटनों तक चढ़ाए बंगाली औरतें मछलियों पर पानी छिड़कती, अपनी फटी-फटी आवाजों में चिल्ला रही थीं—दो सौ रुपए रोहू, डेढ़ सौ रुपए कटला…
मुझे मछली की गंध से उबकाई आती है. उनकी नीली त्वचा, पीछे का त्रिकोण फिन, धूसर स्कैल्स, और कंचे की गोटियों-सी चमकती काली आंखें देखकर मन कचोटता है. लेकिन सुशांत कुछ दिनों से रुपए कम होने के बावजूद मुझे उकसाने के लिए मछली का कोई व्यंजन लाना नहीं भूलता.
“तुम्हारे घर में तो खूब मछली खाई जाती होगी?”
“हां, पर मुझे फिश बिल्कुल पसंद नहीं. मैं तो दूसरों को भी खाने से रोकता हूं.”
उसका निशाना एकदम सटीक. मैंने भी तपाक से जोड़ा, “शव को कितना अपवित्र मानते हैं, लेकिन जानवर का शव खाने से पहले एक बार भी नहीं सोचते…कितनी बड़ी आयरनी है!”
बात करते-करते पता ही नहीं चला हम कब पार्क पहुंच गए. क्यारियों में लगे नारंगी गेंदे, गुलदाउदी के गुच्छे, सैर करते और दौड़ते लोगों का हुज़ूम. घुसते ही सामने हरे चौकोर जाल से बनी डायनासोर की विशालकाय आकृति, जिसे देखकर मुझे हमेशा अपने छोटे कद की याद हो आती.
हम वहां सबसे पहले हरी बेंच पर बैठ गए. उसने कहा—सब कितने अकेले हैं, बिल्कुल मेरी तरह—हवा के झोंकों से हिलते पत्ते, रात की रानी के मोतिया सफेद गुच्छे, घास के बीच उगती कांग्रेस ग्रास. कितनी तड़पन, कितनी विरक्ति है झींगूरों के स्वर में—सब मानो खोज रहे हों एक ऐसा शरीर जिसके शिखरों पर उनका अधिकार हो, जिसकी चोटियों पर खड़े होकर वे कुछ पा लेने की उपलब्धि महसूस कर सकें, जिसकी घाटियों में बैठकर अपने हिस्से की धूप सेक सकें.
मुझे समझ नहीं आया कि उसने वो सब मुझसे क्यों कहा. प्रकृति की विराटता और अपने अस्तित्व की नगण्यता मुझे हर बार की तरह कृतज्ञता के भाव से भर रही थी. उस सच की विराटता के सामने शब्द बड़े बौने, अदना-से लग रहे थे. लेकिन बहुत समय तक उत्तर की अपेक्षा में वह मुझे निहारता रहा, वैसे ही अपलक दृष्टि से, जैसे एक नवजात हैरानी से दुनिया देखता है.
“तुम कहां अकेले हो? मां-बाप के साथ एक आलीशान बंगले में रहते हो, जिन्हें तुम्हारी सेक्सुअलिटी से कोई एतराज नहीं. अकेले तो मैं और सुशांत हैं. डरे-सहमे, सुराखों में छिपते-छिपाते, चोरों की तरह भागते-दौड़ते, हर समय दम साधे यही सोचते हुए कि सामाजिक पुलिस के घनघनाते सायरन अब बजे या तब.”
“मां-बाप से अलग रहना कितना अच्छा है. कितनी आज़ादी… पैरंट्स की इजाजत के बिना मेरा कोई दोस्त तक घर में नहीं आ सकता, ब्वॉयफ्रेंड तो बहुत दूर की बात है.”
“क्यों?”
“वो चाहते हैं कि मेरा पार्टनर भी किसी रईस खानदान से हो.”
उस पल लगा हम दोनों विदेश में छिटके भारतीय और पाकिस्तानी हैं, जिन्हें एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़े रहना है. उसने मेरा हाथ सचमुच बड़े अधिकार से पकड़ लिया, और छुड़ाने के एक नदारद प्रयास के बाद, मैंने भी उसकी पकड़ स्वीकार कर ली.
उसके स्पर्श की निश्छल कोमलता ने मेरे अंदर की बर्फ़ की चट्टान को पिघला दिया था.
“क्यों रोने लगे?”
“मैं भागकर आया हूं, अपने चाचा के एक लाख रुपए चुराकर.”
मैं और कुछ बोल नहीं पाया. लगा, जैसे नहीं बोलने से उन इस्पाती यादों से आहत होने से बच जाऊंगा. लेकिन मेरा शरीर उस छुअन की गलाज़त को याद रखे हुए था. कैसे मेरे चाचा का शरीर एक गर्म इलस्तरी, वो हर रात अपनी दाढ़ी की सींखें मेरे गाल में गोदता, फिर मुझ पर ऐसे टूट पड़ता जैसे कुत्ते मरे हुए कबूतरों को अपने जबड़ों में फंसाए घूमते हैं. हर रात मेरे सपनों में आते कसाई की दुकान पर उलटे टंगे बकरे और मैं डरा-सहमा करवटें बदलता रहता.
उसने मुझे छाती से ऐसे चिपकाया जैसे भुट्टे को हल्के-हरे छिलके. हम दोनों की उंगुलियों में एक अजीब-सी हरकत थी. शरीर में गुदगुदाहट थी. प्यार जो किन्हीं त्रस्त लोगों के बीच पनप जाता है, उसकी अनुभूति थी. ऊपर का हरा पत्ता तोड़कर, उसने आते वक्त खरीदी स्ट्रॉबेरी मेरे मुंह में डाली. कितनी खुरदुरी सतह, अंदर बेतहाशा खटास. कितना अजीब फल है, अमीर बंबइयों का. जिसमें ज़रा भी मिठास नहीं. खटास से मेरी आंखें मिंच गई थीं जब उसने अपनी मांसल, कलाबाजी खाती जीभ से मेरी मुंह में भर गई खटास को सोंख लिया.
तभी चौकीदार के पास आते पैरों की आवाज, उसके डंडों की ठक-ठक सुन हम दोनों बेतहाशा भागे. शहर वैसे ही पीले नियोन बल्बों की रोशनी में भीगा भाग रहा था. ऑफिस से आदमी बैग उठाए अपने घरों को जा रहे थे जिनके सपनों में आदमी के शरीर हैं, पर जिनकी पत्नियां खाने की मेज़ पर अपने रोते बच्चों के साथ उनका इंतजार कर रही हैं. मुझे पहली बार शहर बेचारा लगा, उन आदमियों और उनके स्टेबल जीवन से कोई ईर्ष्या नहीं हुई. सब कुछ होने के बावजूद उनके पास वो एहसास नहीं, वो अतीन्द्रिय, ईश्वरीय एहसास, जिसको हम दोनों ने भोगा. प्यार में होना शहर को नए रूप में देखना है, जैसे निस्पंद शरीर में अचानक हरारत होना. कुछ क्षणों के लिए शहर जीता-जागता महसूस होता है. सागर की उफनती लहरें एक सांकेतिक भाषा में बात करती हुई लगती हैं. एक विचित्र बांकपन हवा पर तारी हो जाता है.
घर पहुंचा तो रात गहरा गई थी. सुशांत ने मेरा बनाया खाना नहीं खाया था. मुझे टूटकर भूख लगी थी. मैंने उसके हिस्से का खाना भी खा लिया और उसके बगल में जाकर लेट गया. उसे बताना चाहता था कि मेरे मन की गांठें खुल गई हैं. बीता कल याद करने से मुक्ति मिल गई है, पर वो गहरी नींद में सोया हुआ था. मैंने सोचा उस पर क्यों कभी उतना विश्वास नहीं कर पाया, क्यों एक महीने इतना करीब होने के बावजूद उसे अपना शरीर नहीं सौंप पाया—वो, जिसका शरीर इतना आकर्षक है—बादामी कजरारी आंखें, तीखी नाक, सुगढ़ होंठ, लंबा कद, गठा शरीर—जैसे प्राकृतिक सौंदर्य से लिप्त एक घना, अनछुआ जंगल जहां सूरज की कतरनें तक भी नहीं पहुंचतीं. शरीर कितना बड़ा साधन है, शरीर के छरहरेपन के बाद ही मन के सौंदर्य को देखा जा सकता है, फिर क्यों मुझे तारों की परछत्ती के नीचे अपनी छाती पर तैरते मोहनीश के मछली जैसे हाथ इतने अच्छे लगे?
***
मोहनीश ने दो दिन बाद फिर घर आने के लिए पूछा तो लाख चाहने पर भी मैं उसे मना नहीं कर पाया. वो चुपचाप बैठा रहा, मैं भी असहज होकर दूर बैठा रहा. हम दोनों एक-दूसरे को बिना कुछ कहे चुपचाप देखते रहे. शायद इतना कुछ कह देना चाहते थे कि कुछ भी नहीं कह पा रहे थे.
मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया, “इसके बाद हम कभी नहीं मिलेंगे.”
“किसी बात से नाराज हो क्या?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं. मुझे हमेशा एक सपना आता है जिसमें मैं रोलरकॉस्टर में बैठा हुआ हूं और वो अचानक नीचे गिरने लगता है. शरीर पसीन से भीगा होता है, दिल मुंह में आने को होता है…मैं साथ हाथ बढ़ाकर किसी को ढूंढ़ता हूं पर कोई होता नहीं…सुशांत तक भी नहीं…कल पहली बार मैंने तुम्हें अपने साथ पाया. मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल वैसा महसूस किया जैसा मुराकामी का नायक कल्पना करता है—विश्व की सीमा के परे एक दूसरा विश्व है जहां शून्यता और सघनता एक- दूसरे में मिल जाते हैं, जहां अतीत और भविष्य एक लूप बना लेते हैं. लेकिन तुम्हारे पैरेंट्स मेरे लिए कभी नहीं मानेंगे. तुम्हारे साथ होने के भ्रम से मैं कब तक अपने को बहलाऊंगा?”
“जीवन भ्रम में ही गुजारना पड़ता है. यथार्थ इतना बंजर है कि जीवन की कोंपल वहां फूट तक नहीं पाती.”
वो जाने लगा तो उसने मुझसे मेरी शर्ट मांगी. कहने लगा उसे मेरे पसीने की गंध अच्छी लगती है. मैं कुछ देर यूं ही खड़ा रहा, फिर उसने बड़े हक से सबसे ऊपर का बटन खोल दिया और हमने शर्ट अदल-बदल लीं.
पहनने से पहले उसने एक बार शर्ट को सूंघा और ट्रॉफी की तरह ऊंचा उठाकर कहने लगा, “ये उस पल के नाम जब हमारे बीच प्यार पनपा था जिसके रौंदे जाने की नियति के बावजूद भी हमने उसे भोगा.” उस दिन उसको अपनी शर्ट पहन जाता देख ऐसा लगा जैसे मेरा एक अंश छिटककर मुझसे दूर जा रहा है.
मैं उसकी शर्ट हमेशा के लिए पहने रहना चाहता था, एहसास की बुझती लौ को अंत तक आंखों में भरे रखना चाहता था, पर सुशांत उस दिन घर जल्दी आ गया.
उसने शर्ट देखी तो हम दोनों चुप खड़े रहे—उसके दिमाग में हजारों सवाल, मेरे दिमाग में उतने ही बहाने उमड़ते-घुमड़ते रहे. बड़े मन से लाई हुई रोहू उसने डस्टबिन में डाल दी और उसके आंसू पलकों को भिगोते कोनों से टपकने लगे. मैं उसे कहना चाहता था कि मैं उससे ही प्यार करता हूं. ये शर्ट तो बस एक अवशेष है, बच्चे का एक टूटा हुआ दांत, जिसे मैं अपने कलेजे की मिट्टी के नीचे, बहुत नीचे दबा दूंगा, ताकि कोई टूथ फेयरी आए और किसी दूसरे के लिए प्रेम की ऐसी गहन अनुभूति ले जाए. लेकिन शब्द अनजान गुफा में छिपे हुए थे. मैं चुपचाप उसकी पीठ सहलाता रहा.
शायद इसी विश्वास के कारण वह रात में मेरे नजदीक खिसक आया, पजामे का नाड़ा खोल दिया, और मेरे शरीर पर अपने प्रेम की विजय पताका लहरा दी. मैंने आंखें बंद रखीं, जैसे वो करता रहा, जैसे-जैसे मुड़ने के लिए कहता गया, मैं उसकी बात मानता गया, पर हमारे बीच संसर्ग नहीं, कुछ ऐसा घटा था जैसे कुएं के मुहाने पर रगड़ खाती रस्सी. मोहनीश और मेरा शरीर जैसे एक-दूसरे पर उलटकर रखी दो नाव, दोनों एक दूसरे के पूरी तरह खोखल में समा जाने वाली, लेकिन सुशांत और मैं तेल की सतह पर फिसलती पानी की बूंदें.
अगले दिन से सुशांत आर्ट गैलरी भी जाने लगा. बाद में वो अपने प्रदर्शन में शामिल होता था. लेकिन उस महीने के अंत में आर्ट गैलरी से उसे यह कहकर निकाल दिया गया कि ‘नोटोरियस एलिमेंट्स’ का कला से क्या सरोकार हो सकता है?
उसने मुझे बताया तो मेरा चेहरा भी तमतमा गया. न्याय के लिए जद्दोजहद करना कब से नोटोराइटी हो गया? पर यह बात तो बड़ी बाद में दिमाग में आई, उससे पहले तो रुपयों की बात कुलबुलाई. एक लाख में से केवल बीस हजार ही बचे थे. एक महीने, खींचतान के डेढ़ महीने, का ही खर्च चल सकता था.
कुछ दिनों बाद उसने जब अपने ऑयल कलर्स की ट्यूब के लिए उसने रुपए मांगे, तो मैंने बात घुमा दी. घर में मछली आना बंद हो गया. पेंटिंग्स में उसकी अरुचि होने लगी. धीरे-धीरे पेंटिंग्स पर भी धूल जमने लगी. सरकारी कामकाज में निष्क्रियता के कारण धीरे-धीरे प्रदर्शन से लोग भी छंटने लगे. नौकरी ढूंढ़ने के लिए इधर-उधर भटकने, फॉर्म भरने, इंतजार करने, इंटरव्यू देने के कारण सुशांत के पास भी ज्यादा समय नहीं बचता, लेकिन जब कभी भी उसे समय मिलता, वह कोर्ट जाना नहीं भूलता.
इसी गहमागहमी के चलते मेरी मोहनीश से भी बात कभी-कभार होने लगी. वो हर दो दिन बाद फोन जरूर करता, लेकिन मैं काम का बहाना लगाकर टाल देता. उससे बात करते हुए हमेशा इस बात के लिए चौकन्ना रहना होता कि मेरी आवाज से जरा-भी परेशानी ना झलके. कितनी बार बस कॉल चलती रहती, और हम एक-दूसरे की सांसों के उतार-चढ़ाव को सुनते रहते.
इतने तनावपूर्ण थे वे दिन की कविता की सौम्यता कहीं दूर छूटती जा रही थी. पर मोहनीश मुझे कविताएं सुनाता, प्रेम कविताएं, रिल्के, फैज़, नेरुदा की—लव इज़ टू शॉर्ट, फॉरगेटिंग इज़ लोंग; हाऊ कैन आई कीप माई सोल इन मी सो दैट इट डजंट टच योर्स—उसकी भारी आवाज जैसे एक रहस्यमई दुनिया, जो मुझे हिप्नोटाइज़ कर हकीकत से बहुत दूर ले जाती.
मैं चाय पी रहा था जब नवी मुंबई के डी.ए.वी. स्कूल के रिसेप्शन से कॉल आया. मेरा इंटरव्यू क्लियर हो चुका था और सातवीं के बच्चों को गणित पढ़ाने के लिए मुझे रख लिया गया था. मुझे हैरानी हुई कि पचास लोगों में मेरा चयन कैसे हो गया. मैंने उनकी वेबसाइट खोलकर देखी तो महेश सिंघानिया, मोहनीश के पिता का नाम, ट्रस्टीज़ लिस्ट में सबसे ऊपर था. शायद मोहनीश ने ही पिता से कहा होगा? लेकिन उसे कैसे पता चला?
मैंने सबसे पहले सुशांत को फोन मिलाया. उसे नौकरी की बात बताई, लेकिन मोहनीश के पिता का कोई जिक्र नहीं किया. उसने बात सुनी और एक हतोत्साहित आवाज में बधाई देकर फोन रख दिया. मन खट्टा हुआ, पर मैंने ज्यादा इस बात को तूल नहीं दिया, यही सोचा वो बिज़ी रहा होगा, या कोई इंटरव्यू सही नहीं हुआ होगा. मोहनीश को बताने पर उसकी आवाज में वही उत्साह था जिसे मैं सुनना चाहता था. मैं उसे टोहता रहा, पर मज़ाल कि उसने जरा भी मुझे अपने पिता की बात की भनक पड़ने दी हो.
सड़े अंडे की बदबू के बावजूद मैं सुशांत के लिए मछली खरीद लाया, मैरीनेट कर, उसे गैस पर भूनकर रात के खाने के लिए उसकी पसंद की शर्ट पहन कर तैयार हो गया. उसने मछली देखी, मेरी शर्ट देखी, और एक फीकी मुस्कान उसके होठों पर तैर गई. वह चुपचाप मछली खाता रहा और मैं उसे निहारता रहा.
“पता है कितनी तनख्वाह मिलेगी?”
“पूरे पचास हजार. अब तुम्हें काम ढूंढ़ने की कोई जरूरत नहीं. आराम से पेंटिंग करो.” मैंने अपने आप ही जवाब दिया.
“और अगर मैं पेंटिंग के बदले कोर्ट जाना चाहूं?” उसने तीखा-सा प्रश्न मुझ पर दागा.
“मैं मना नहीं कर रहा, पर सारा दिन कोर्ट में थकना कहां की समझदारी है? हम एक अच्छे-से घर में रहेंगे, इन कूड़े-कर्कट के ढेरों से दूर. मैं बच्चों को पढ़ाऊंगा, तुम पेंटिंग करना.”
“वो घर तुम्हारा होगा…वहां तुम जैसा चाहोगे, वैसा ही होगा. मैं तो यहीं रहूंगा. तुम्हें जाना है तो जाओ.”
मैंने ध्यान से मछली का हर कांटा निकाल दिया था, पर पता नहीं कैसे कोई कांटा रह गया और उसके गले में तभी चुभ गया. वो खाँसते-खाँसते बेदम हो गया था. आंखें लाल दहकते कोयलों में तब्दील हो गई थीं. मैं फर्स्ट-एड किट से सिलेशिया फटाफट निकाल लाया. नाक में डालने लगा था कि तभी उसने मेरे हाथों से शीशी छीन ली.
थोड़ी देर में कांटा निकला. उसकी चेहरे पर तंज भरी मुस्कान थी.
“तुम मुझे ले जाना ही कहां चाहते हो?”
***
घर पहले ही पसंद कर लिया था. सिक्योरटी डिपॉज़िट, जैसे ही तनख्वाह मिली, भर दिया. जब घर फाइनल हुआ, तब सुशांत को बताया. यह भी कि इस वीकेंड ही शिफ्ट हो जाएंगे, इसलिए वह अपना सामान पैक कर ले. उसे कोई नौकरी नहीं मिली थी. विद्रोह की आग भभक कर लगभग बुझ चुकी थी. वो चिड़चिड़ा हो गया था. दिन भर गुस्से में रहता. बात-बात पर झगड़ने लगता. कोई कुछ भी समझाने की कोशिश करता, उसके लिए कुछ भी करता, तो उसे लगता जैसे उस पर तरस खाया जा रहा है.
शिफ्टिंग से एक दिन पहले तक उसने सामान पैक नहीं किया. मैंने रात में पूछा तो उसने साफ मना कर दिया. मुझे लगा उसने यह सब गुस्से में कहा होगा, या कुछ समय उसकी अकेले रहने की इच्छा होगी जिसके बाद वह आ जाएगा.
सुबह उठा तो देखा वह पेंटिंग में मशगूल था. पास जाकर देखा तो मेरे जन्मदिन पर जो पेंटिंग उसने मुझे गिफ्ट की थी—जिसमें दो लड़के हाथ पकड़े नीले आकाश की ओर बढ़ रहे थे— उस पर एक काला कांटा बना दिया था.
मैं गुस्से से तमतमा गया. इतने दिनों से मेरे किए सभी प्रयास खटाई में पड़ रहे थे. मैंने सारा सामान रिक्शे पर चढ़वाया और कमरे की दीवार पर एक पर्ची पर नए मकान का एड्रेस लिख, बिना उससे कुछ कहे बाहर निकल आया. रिक्शे पर बैठे मैं कूड़े-कर्कट के ढेर पर चढ़े बच्चों को तब तक देखता रहा जब तक वे ओझल नहीं हो गए. एक अतीत पीछे धुंधला होता जा रहा था. भविष्य सामने था, रोशनी से लबरेज़, जिसे कसकर मुझे थामे रखना था.
शाम को नए घर से मोहनीश को फोन मिलाया तो उसकी आवाज में वही बच्चों जैसी किलक. उसने बताया ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट के केस की आखिरी सुनवाई में फैसला उनके हक में हुआ है. डॉक्टरों और अस्पताल को ना केवल भारी जुर्माना देना होगा बल्कि जेल में सजा भी काटनी होगी. कोर्ट ने सरकार को ट्रांसजेंडर बिल को जल्द-से-जल्द पारित करने का भी आदेश दिया है जिसके तहत उन्हें अस्पतालों और अन्य सभी जगहों पर विशेष अधिकार दिए जाएंगे.
सुशांत की इतनी कड़ी मेहनत रंग लाई, मैं बहुत खुश था. वो भी कितना खुश होगा. शुरुआती दिनों के हम दोनों के मुस्कुराते चेहरे आंखों के सामने तैर गए. हालांकि उस खुशी को बांटने वाला हम दोनों के पास कोई नहीं था.
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FIRST PUBLISHED : April 24, 2023, 15:37 IST








