हाइलाइट्स
15वीं सदी के उत्तार्द्ध में यूरोपीय शिद्दत से भारत तक समुद्री रास्ते के जरिए पहुंचना चाहते थे.
इसके लिए पहले कोलंबस प्रयास कर चुका था लेकिन सफलता वास्को डि गामा को मिली.
उसके 1498 में कालिकट पहुंच कर पूरे यूरोप में तहलका मचा दिया था.
एक समय था जब यूरोप के लोग जमीन के रास्ते ही भारत तक पहुंच सकते थे जो कि एक बहुत ही मुश्किल और समय लेने वाला कार्य था. मध्यकाल में भारत और यूरोप के बीच की कड़ी अरब देशों के लोग बने थे. उस दौर में यूरोप का भारत से सीधा संपर्क नहीं था और यूरोपीय अरबों से भारत के सोने की चिड़िया के होने की कहानियां भर सुनते थे. 15वीं सदी के यूरोप में समुद्र के रास्ते भारत पहुंचने की बेचैनी बढ़ने लगी थी. इसके अलावा यूरोप के लोग भी दुनिया के बाकी हिस्सों कै खोजबीन में निकलने लगे थे. भारत में समुद्र के रास्ते पहुंचने के लिए बहुत सारे प्रयास हुए जिसमें सबसे पहली सफलता पुर्तगाल के वास्को डि गामा को मिली थी.
पहले से बेकरार थे यूरोपीय
वास्को डि गामा यूरोप से भारत के लिए समुद्र का रास्ता खोजते हुए 20 मई 1498 को भारत के कलिकट के तट पर पहुंचा था. दिसचस्प बात यह है कि वास्को डि गामा से पहले कई लोक भारत पहुंचने के प्रयास कर चुके थे और उनके देश के राजा भी उन्हें उनकी खोज में मदद करने के लिए तैयार रहते थे. वास्को डि गामा से पहले कोलंबस ने पश्चिम के रास्ते भारत पहुंचने का प्रयास किया क्योंकि उसका मानना था कि अगर पृथ्वी गोल है तो वह पश्चिम के जरिए भारत तक पहुंच सकता है. लेकिन वह उसी तलाश में अमेरिकी महाद्वीप पहुंच गया था.
पांच जहाजों के साथ
लेकिन वास्को डि गामा ने अफ्रिका के दक्षिणी और से होते हुए पहले अफ्रीका के पूर्वी तट पर और फिर वहां से अरब देशों से होते हुए उनके रास्ते अपनाकर भारत पहुंचने की योजना बनाई थी. वह 1497 में एक बड़े जहाज के साथ चार जहाजों को लेकर 200 से ज्यादा नाविकों को लेकर भारत के लिए यू निकला था.
बहुत लंबा था रास्ता
वास्को डि गामा के लिए यह सफर आसान नहीं बल्कि बहुत कठिनाइयों से भरा था. वह पहले अफ्रीका के पश्चिमी तट से होते हुए दक्षिण अफ्रीका केप ऑफ होप पहुंचा और फिर हिंद महासागर में दाखिल हुआ. हिंद महासागर पहुंचने के बाद उसके बहुत सारे साथी लंबे सफर के कारण बीमार हो गए थे, उनका खाना भी खत्म होने लगा था.
वास्को डि गामा के कालिकट पहुंचने पर उम्मीद के विपरीत उसका स्वागत हुआ था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
लुटेरा बनने की मजबूरी
इस सयम तक वास्को डि गामा और उसके साथियों को पता तक नहीं था कि भारत पहुंचने का रास्ता क्या है. उसने अफ्रीकी महाद्वीप के पूर्वी तटीय इलाकों में पहुंचने के बाद मोजाम्बीक के पास रुकने का फैसला किया, लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें वहां से भगा दिया. और कुछ समय के लिए वास्को डि गामा को सुमद्री लुटेरा बनना पड़ा.
यह भी पढ़ें: Jamsetji Tata Death Anniversary: अफीम के पेशे से शुरु कर छुआ बिजनेस का आसमान
फिर मुश्किल से मिली राह
इस दौरान अरब व्यापारियों के जहाजों को लूटने के बाद वास्को और उसके साथी पहले मोम्बासा फिर मालिंदी पहुंचकर और कुछ जानकारों को पकड़ने के बाद उन्होंने भारत जाने का रास्ता पता लगाया. भारत का रास्ता मिलने के बाद वास्को और उसके साथी सीधे भारत की ओर निकले और 20 मई 1498 को भारत के कालीकट के तट पर पहुंच कर समुद्र के रास्ते से भारत पहुंचने वाले यूरोपीय बने.

वास्को डी गामा की भारत यात्रा ने दुनिया में बहुत सारे बदलाव की नींव रखी थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
तीन महीने रुक कर वापसी
वास्को डि गामा ने मोजाम्बीक की ही तरह भारत में उस समय कालीकट में शासन कर रहे राजा को तोहफे देने का प्रयास किया और इस बार उसका स्वागत हुआ. कालीकट के राजा को व्यापार के लिए राजी करने के बाद वह कालीकट में तीन महीने रुका और पुर्तगाल वापस चला गया. पूरे सफर में उसके केवल 55 साथी ही जिंदा वापस पुर्तगाल पहुंच सके. जहां से 1502 में वे पुर्तगाल की नौसेना के साथ दोबारा भारत आया.
यह भी पढ़ें: Sukhdev Thapar B’day: गांधी जी को लिखे खत ने बताया, कितने बड़े विचारक थे सुखदेव
पुर्तगाल पहुंच पर वास्को डि गामा का बहुत सम्मान हुआ. विश्व इतिहास में इस घटना के बहुत दूरगामी परिणाम हुए थे, सबसे पहले अरब और मूर व्यापारियों के मसाले के व्यापार को धक्का लगा और हिंद महासागर इसके बाद से ही वर्चस्व के लिए अखाड़ा बन गया जिसमें धीरे धीरे यूरोपीय ताकतों ने कब्जा कर लिया. इसके साथ ही यूरोप का एशिया से संपर्क बढ़ा और पूरी दुनिया में व्यापारिक वर्चस्व और औपनिवेशवाद की भूमिका बनाई थी.
.
Tags: Europe, History, History of India, Indian, Research, World
FIRST PUBLISHED : May 20, 2023, 06:58 IST









